18 अगस्त 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमयी ढंग से लापता होने की पहेली, कांग्रेस पार्टी एवं अब तक केंद्र व पश्चिम बंगाल में सत्ता में रह चुकी विभिन्न सरकारों को परेशान करने के लिए आ गई है. इसकी वास्तव में पृष्टि की जा चुकी है कि उस विशेष दिन में कोई विमान क्रैश नहीं हुआ था और ताईवान से मंचुरिया तक की फ्लाइट जो उस समय सोवियत के कब्जे में था, ने सुरक्षित लैंडिंग की थी. तो जो सवाल उठता है वो ये कि स्वतंत्रता संघर्ष के भारत के महान नायकों में से एक और महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विमान हादसे में शामिल होने से संबंधित काल्पनिक कहानी गढ़ने के लिए कौन जिम्मेदार था?  ऐसी खबरें मिली हैं कि नेता जी को जीवित गिरफ्तार किया गया था और उन्हें रूस की राजधानी मॉस्को ले जाया गया था. वहां उन्हें कुछ समय के लिए कारावास में रखा गया और उसके बाद उन्हें साईबीरिया ले जाया गया जहां कई वर्षों बाद उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांसें लीं. अगर यह सच है तो एक महान क्रांतिकारी एव स्वतंत्रता सेनानी को इतिहास की कथाओं में उसके यथोचित स्थान और स्वतंत्र भारत की तकदीर को आकार देने का मौका देने से वंचित रखने के लिए सरकार एवं विभिन्न दलों के कई शीर्ष नेताओं एवं पदाधिकारियों को सबसे शैतानी साजिश रचने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

नरेंद्र मोदी के पास स्वतंत्रता के बाद जन्मे पहले प्रधानमंत्री होने का फायदा है और बोस परिवार उन्हें एक ऐसे महान नेता के रूप में देखता है जो इस देश के साथ-साथ, इंग्लैंड और रूस में स्वतंत्रता सेनानी से संबंधित फाइलों के विवर्गीकरण द्वारा सच्चाई को उजागर करने में मदद करेगा. किसी भी मामले में इन फाइलों तक लोगों की पहुंच को रोकने से कोई उद्देश्य पूर्ण नहीं होता जिन्हें बहुत लंबे समय पहले ही संग्रह का हिस्सा बन जाना चाहिए था. यह समीक्षा, भगत सिंह, ऊधम सिंह व चंद्रशेखर आजाद जैसे अन्य वीर नायकों से संबंधित फाइलों पर भी लागू होनी चाहिए.

यह विश्वास करना भयानक प्रतीत होता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल या महात्मा गांधी जैसे नेता, एक ऐसे बहादुर स्वतंत्रता सेनानी से छुटकारा पाने के लिए ब्रिटिश शासकों के साथ मिलकर उन्हें गुप्त रूप से अपना सहयोग दे सकते हैं जो अंग्रेजों द्वारा इस देश को छोड़कर जाने के निर्णय के पीछे मुख्य कारण बन गया था. यह एक ऐसा तथ्य है जिसे तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली और अंतिम वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने जाहिर तौर पर स्वीकार किया था. अगर और कुछ के लिए नहीं तो फाइलों का विवर्गीकरण उस समय के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं के नामों को निर्दोष साबित करने में मदद करेगा और अगर दस्तावेजों में जानकारी से किसी प्रकार की मिलीभगत का पता चलता है तो यह उनके नामों को उजागर करने में मदद करेगा, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस को न्याय देना ही होगा जो अनुज धर जैसे विद्वानों द्वारा किए गए गहन अनुसंधानों के माध्यम से उपलब्ध संकेतों के अनुसार अपने निधन से काफी समय पहले तक सोवियत संघ की जेलों में दिन काटते रहे.

सरकार ने महत्वपूर्ण दस्तावेजों के विवर्गीकरण न करने के फैसले की समीक्षा का आदेश देकर अच्छा काम किया है. सरकार को जापानी अभिलेखों तक पहुंचने के लिए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे और प्रधानमंत्री मोदी के बीच अच्छे तालमेल का फायदा उठाना चाहिए. इसके अतिरिक्त टोक्यो के एक मंदिर में पड़ी राख, जिसे नेताजी की राख कहा जाता है, का डीएनए परीक्षण होना चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वास्तव में उस राख का महान क्रांतिकारी से कोई लेना-देना है अथवा नहीं. यह संदेह है कि राख नेताजी की नहीं है और इसलिए इस धारणा के खंडन अथवा पुष्टि किए जाने की जरूरत है.

पैदा हुए कई सवालों में सबसे चिंताजनक सवाल 1949 में मॉस्को की एक जेल में पूर्व राष्ट्रपति एवं तत्कालीन भारतीय राजदूत एस राधाकृष्णन व नेताजी के बीच कथित मुलाकात को लेकर है. पूर्व राष्ट्रपति, अथवा उनके पुत्र एवं प्रख्यात इतिहासकार एस गोयल के लेखनों में  उस मुलाकात का कोई जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन अगर अभिलेख भिन्न प्रकार से सिद्ध करते हैं तो राष्ट्र को विद्वान राष्ट्रपति को अलग तरीके से देखना होगा. उसी प्रकार से ऐसे संकेत मिले हैं कि जनता सरकार और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने नेताजी के लापता होने के पीछे की सच्चाई पता लगाने के लिए किसी तरह के कोई प्रयास नहीं किए. उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया, यह पता लगाए जाने की आवश्यकता है. 

नेताजी के पारिवारिक सदस्य, नेहरू की भूमिका और इंडियन नेशनल आर्मी के पूर्व प्रमुख के करीबियों को खरीदने के उनके कथित प्रयासों  को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं. अधिकांश लोग नेहरू को महान दूरदर्शी के रूप में देखते हैं और उनके जन्म के 125वें वर्ष में, अगर उनका नेताजी के लापता होने के साथ कुछ लेना-देना ही नहीं है तो उनके नाम को आरोपों के साथ लिप्त नहीं किया जाना चाहिए.

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में जिनकी दिलचस्पी रखने वाले अक्सर अचंभित होते हैं कि जबकि लाखों भारतीयों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, केवल उन्हीं लोगों को इतिहास में प्रमुखता मिली जिनका अपनी शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजों के साथ संपर्क था और यह बोस जैसे कई अन्यों की कीमत पर किया गया जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए अपना अलग मार्ग चुनने का फैसला किया. अगर और कुछ के लिए नहीं, कागजातों का विवर्गीकरण हमारे इतिहास के सटीक वर्णन के लिए किया जाना चाहिए.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)