भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि ‘सेवा परमो धर्मा:’. हम और हमारे नीति नियंता यह दावा करने से कभी नहीं चूकते कि वह इसी ध्येय मंत्र पर काम कर रहे हैं मगर किसकी सेवा? जन सेवा या फिर निज सेवा? ईमानदारी के साथ बगैर किसी पार्टी या व्यक्ति के महिमा मंडन से इतर जब हम तथ्यों को परखते हैं, तब तो यही दिखता है कि सभी का मंत्र एक है ‘निज सेवा परमो धर्मा: कहावत है कि भले लोगों के बीच हुआ विरोध भी हितकर होता है. भाजपा और आप के चुनावी विरोध में कुछ ऐसी ही उम्मीद हम सभी सामान्य जन को थी. विश्वास था कि ये दोनों राजनीतिक दल कांग्रेस से इतर जनहित में कुछ बेहतर करेंगे. दिल्ली में सरकार बनी केंद्र में मोदी की और उनके अधीन दिल्ली में केजरीवाल की. उम्मीद यह थी कि जनहित के मुद्दों पर दोनों सामंजस्य भी बनाएंगे और लोकहित की नीतियों के क्रियान्वयन के लिए समाधान भी खोजेंगे मगर अब तक ऐसा नहीं दिखा है. इन दोनों की तू-तू, मैं-मैं और निजहितों को साधने की साधना देखकर उम्मीदें टूटती जा रही हैं. दोनों राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी समझने के बजाय सिर्फ वायदे करती हैं कि वह सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानती हैं मगर हकीकत में कुछ और ही नजर आता है. 

देश में किसान मर रहे हैं और राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं. गजेंद्र सिंह की मौत भले ही सवालों में हो मगर दिल्ली की यह घटना यह बयां करती है कि किसानों की चिंता किसी को नहीं है. सभी को सिर्फ वोट की चिंता सता रही है. सवाल तो यह भी हैं कि आखिर गजेंद्र की मौत पर केंद्र और राज्य सरकार तमाशबीन क्यों बनी हुई है? आखिर कब आएंगे अच्छे दिन?  विकास का जो पैमाना मोदी सरकार ने दिखाया था, वह लोगों को धरातल पर नजर नहीं आ रहा है. आखिर कब तक जनता को यों ही आश्वासनों और मन की बात से पेट भरना होगा? आखिर कब रुकेगा मौत का यह सिलसिला? सेवा परमो धर्मा: कहने मात्र से काम नहीं चलेगा बल्कि साबित भी करना होगा.  हमारे देश में जन सेवा के लिए लाखों एनजीओ काम करते हैं. हकीकत में करते हैं या नहीं पता नहीं मगर कागजों में जरूर करते हैं. देश का अन्नदाता परेशान है आत्महत्या कर रहा है मगर यह कहीं नजर नहीं आ रहे. कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश में जाकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. वह खुद को गरीब का बेटा बताते नहीं थकते. वह उनके दर्द को महसूस होने की बात भी करते हैं मगर देश की बड़ी आबादी भूखे पेट सोने को मजबूर है. यह बात हकीकत पर आधारित है, लेकिन सरकार इसके लिए क्या कर रही है और क्या योजना है किसी को नहीं पता. सरकार का काम है गरीबों तक अपनी बहुआयामी योजनाओं को पहुंचाना और उसके प्रति जागरूक करना. सवाल तो यह भी है कि क्या यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है?

हमारी और उन एनजीओज की कोई जिम्मेदारी नहीं जो जनसेवा नारायण सेवा कहते नहीं थकते. हमने आबादी को कम करने में क्या योगदान दिया है? हमने शिक्षा के विस्तार में क्या काम किया है? हम उन पीड़ितों की मदद के लिए क्या कर रहे हैं जो मरने को मजबूर हैं? छोटा और शिक्षित परिवार होगा तो उसकी बेहतर देखभाल हो पाएगी. घर के आर्थिक हालात अच्छे होंगे तो समाजिक स्तर भी बढ़ेगा. हमारी सरकार और हम सभी को मिलकर वास्तव में सेवा परमो धर्मा: की नीति परकाम करना होगा न कि निज सेवा के लिए. 
यह एक कड़वी हकीकत है कि किसानों की आत्महत्या एक सामाजिक समस्या बन चुका है. किसानों की आत्महत्या पर नेताओं से लेकर मीडिया तक कुछ इस तरह से पेश आ रहे हैं कि वह इनकी चिंता में घुले जा रहे हैं जबकि दोनों को ही अपनी चिंता है. किसी को टीआरपी की तो किसी को वोट बैंक की. मीडिया अटेंशन के लिए ही शायद युवा किसान को राजनीतिक दल की रैली में जान देनी पड़ी. यह घटना आगे कितनी गंभीर होगी और इसका जमीनी असर क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, पर इंकार नहीं किया जा सकता कि गजेंद्र की आत्महत्या ने नेता-नीति और मीडिया सभी को बाजार में नंगा कर दिया है. यह भी नहीं है कि हमारी खून-पसीने की कमाई से चलने वाले लोकसभा और राज्यसभा अथवा विधानसभाएं कभी एकमत नहीं होतीं.

जब अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने होते हैं तो हमारे यह प्रतिनिधि खामोश एकमत हो जाते हैं मगर जब जनहित की योजनाओं को अमलीजामा पहनाना होता है तो बहस भी करते हैं और लड़ते भी हैं. किसान आत्महत्या कर नहीं रहे हैं, उनको मजबूर किया जा रहा है. हमारे देश में किसी सरकार ने किसानों की परवाह नहीं की. दुर्भाग्य है कि हम किसानों को अन्नदाता कहते हैं मगर वह कभी किसी सरकार की प्राथमिकता हैं. 1937 में फैजपुर, (यूपी) में कांग्रेस के अधिवेशन में प्रस्ताव पास किया गया था कि जमीन पर हक जोतने वाले का होना चाहिए. स्वतंत्रता के बाद यह प्रस्ताव पूरी तरह से भुला दिया गया. अधिकांशत: खेत जोतने वाला खेत का मालिक नहीं होता है. कुछ साल पहले जब अन्ना हजारे के आंदोलन ने आंदोलन का तूफान खड़ा किया था तब हमारे माननीय बचाव की मुद्रा में आ गए थे. तब लगा था कि लोकपाल बेहद जरूरी है, पर हुआ क्या? हारकर अन्ना अपने गांव लौटने को मजबूर हो गए जबकि उनके आंदोलन से पनपे आयोजक सत्ताधीशों की कतार में जा बैठे हैं. क्या नेता सिर्फ यह जुमला दोहराते रहेंगे कि जनता-जनार्दन है या फिर उसको सच में जनार्दन समझा जाएगा. प्रधान सेवक की भूमिका में खड़े होने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी कब समझेंगे कि सेवक का मतलब क्या होता है और अन्नदाता को कब उचित सम्मान देंगे. 

हमारे देश में एक चलन है कि बड़ा नेता हो या अफसर दोनों ही लोकसेवक कहलाते हैं. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खुद को प्रधान सेवक कहकर गर्व का अहसास करवाया था. उन्होंने भी जन सेवा नारायण सेवा के मंत्र को दोहराया था मगर क्या ऐसा हो रहा है?  जब हम इस सवाल का जवाब तलाशते हैं तो इसमें सबसे बड़ा संकट ‘वीआईपी कल्चर’ है जिसके शिकार सभी हैं. हमारी ब्यूरोक्रेसी खुद को मालिक समझती है और चुने गए नुमाइंदे भाग्यविधाता. यही वीआईपी कल्चर हमारे लिए कुष्ठ रोग की तरह है. हम आए दिन किसी न किसी ट्रैफिक सिग्नल पर इसलिए फंस जाते हैं क्योंकि वहां से किसी वीआईपी का काफिला गुजर रहा होता है. उस वक्त आपके हालात चाहे जो भी हों, भले ही आप या आपका कोई रिश्तेदार या मित्र किसी एम्बुलेंस में जीवन और मौत के बीच ही क्यों न लड़ रहा हो मगर वीआईपी का रोड पर पहला हक है क्योंकि व हमारा विशिष्ट ‘लोकसेवक’ हैं. यह हाल सड़क से लेकर एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, सरकारी दफ्तरों और सचिवालयों में लगातार देखने को मिलता है. जिस आम जन की सेवा के लिए ये लोग जो यह तमाम सुविधाएं और लाव लश्कर पाते हैं उसी को मुंह चिढ़ाते हैं क्योंकि इनका मत्र है ‘सेवा परमो धर्मा:’. 

आखिर यह सामंती व्यवस्था ही क्यों है? मंत्रियों और सीनियर अफसरों को मिलने वाले ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ अंग्रेजों की बनाई परंपरा है, जिससे खुद को दूसरों से श्रेष्ठ घोषित कर उनके हुक्मरां बने रहा जाए. यह सत्ता के वर्चस्व का एक भौंडा प्रदर्शन है, जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई की बबार्दी होने के साथ ही राजशाही की कुंठित सोच को बरकरार रहने की तस्दीक भी है. हमें विरासत में दो व्यवस्थाएं मिलीं. एक थी सामंतवादी व दूसरी औपनिवेशिक. एक ने हमारी सोच में ही गुलामी का भाव दिया यानि जिसका साधनों पर कब्जा उसमें ईश्वर का अंश और उसकी बात मानना ही ईश्वर की मर्जी. अंग्रेजों ने औपनिवेशवाद दिया, जिसमें थोड़ा बदलाव करके खुद को श्रेष्ठ साबित करके सत्ता में रहने वालों को साधनों पर कब्जा रखने वालों से भी ऊपर माना गया जो मौजूदा ब्यूरोक्रेसी और पॉलिटिकल सिस्टम में दिखाई देता है. भले ही संविधान के तहत दोनों जनहित में काम करने की शपथ लेते हैं मगर करते अपने हितों की
सेवा हैं.   जय हिंद!

(यह लेखक के  निजी विचार हैं)