संषर्घग्रस्त सीमावर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के लिए तैयार पीपुल्स डेमोके्रटिक पार्टी(पीडीपी) की 56 वर्षीया अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के लिए भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी क्योंकि दोनों दलों की विचारधाराएं एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं. भाग्य ने उन्हें ऐसे राज्य के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए चुना है जहां अलगाववादियों के साथ-साथ सम्मानवादी राज्य में सर्वोच्चता हासिल करने की लड़ाई में मशगूल हैं. जबकि यह सच है कि महबूबा अपने पिता की विरासत की वास्तविक उत्तराधिकारी हैं, यह भी समान रूप से सही है कि यह मुफ्ती मोहम्मद सईद का ऊंचा राजनीतिक कद ही था जिसने उनके कई आलोचकों को उनसे उचित दूरी बनाने के लिए विवश कर दिया.

वह राज्य के सबसे वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं में से एक थे और राज्य का मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने से पहले कई मुख्यमंत्रियों के साथ काम कर चुके थे. मुफ्ती मोहम्मद सईद को युवावस्था से ही अग्रिम पंक्ति का नेता माना जाता था और जम्मू-कश्मीर पर नजर रखने वाले कई विश्लेषकों का ऐसा मानना है कि अगर इंदिरा गांधी 1974 में शेख अब्दुल्ला के साथ समझौते पर नहीं पहुंची होती तो मुफ्ती मोहम्मद संभवत: मीर कासिम के उत्तराधिकारी बन सकते थे.

समझौते के परिणामों का दिलचस्प पहलू यह था कि शेख अब्दुल्ला कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में 1975 में पहली बार मुख्यमंत्री बने. इससे पहले वह 1948-53 तक जम्मू-कश्मीर के प्रथम प्रधानमंत्री रह चुके थे.  जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक लोककथाओं का एक हिस्सा है कि 1974 में इंदिरा गांधी द्वारा शेख अब्दुल्ला के साथ कश्मीर समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद सईद मीर कासिम इस कदर नाराज थे कि उन्होंने क्रोध में उस समय इंडियन एयरलाइंस में पायलट के तौर पर कार्यरत राजीव गांधी को चंडीगढ़ हवाई अड्डे पर कहा कि कांग्रेस आने वाले 30 वर्ष तक इस राज्य के सत्ता में वापस नहीं आएगी. उनके शब्द बिलकुल सटीक साबित हुए और वर्ष 2005 में अंतत: गुलाम नबी आजाद ने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला. गुलाम नबी का पदोन्नति मुफ्ती मोहम्मद की पीडीपी के साथ 6 वर्ष के शासन के दौरान समान रूप से सत्ता सांझा करने पर हुआ.

मुफ्ती मोहम्मद के निधन के बाद महबूबा के सर्वाधिकार की उम्मीद पहले से ही की जा रही थी क्योंकि उनकी अपनी पार्टी में और भाजपा मे ऐसा कोई भी नहीं है जो मुख्यमंत्री पद पर उनका विरोध करने की स्थिति में हो. भावनाओं का सैलाब उमड़ रहा है और मुफ्ती मोहम्मद ने अपने जीवनकाल के दौरान भी ऐसे संकेत दिए थे कि उनकी पुत्री भविष्य में उनकी उत्तराधिकारी बन सकती है. यहां महबूबा की राजनीतिक पात्रता पर सवाल नहीं उठाया जा रहा क्योंकि यह महबूबा ही हैं जो जमीनी स्तर पर तमाम कार्यों को अंजाम दे रही हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है. समस्या पीडीपी की बनावट के साथ है जिसमें कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के विपरीत अलग-अलग पृष्ठभूमि और विविध विचारों वाले लोग शामिल हैं.

मुफ्ती मोहम्मद अपने ऊंचे राजनीतिक कद के कारण पार्टी के विभिन्न सदस्यों को एकजुट रखने में सक्षम रहे थे अन्यथा पार्टी में आपसी सामंजस्य का कोई सबूत नहीं था. इस बात की प्रबल संभावना है कि जो लोग महबूबा से अलग नजरिया रखते है, वे मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें समर्थन देना जारी रखेंगे और इस  पार्टी की नैया को डगमगाने नहीं देंगे.

राज्य के लिए अलग ध्वज की अनुमति दिए जाने को लेकर भाजपा के भीतर हाल ही में उठ रहे कर्कश स्वरों ने समस्या को और जटिल बना दिया है क्योंकि भाजपा राज्य को विशेष ध्वज प्रदान किए जाने के पक्ष में नहीं है. वास्तव में, 1953 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के प्रधान कारणों में से एक यह था कि इसके संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बलराज मदहोक को दृढ़ विश्वास था कि उस राज्य में दो ध्वज, दो संविधान और दो राज्य प्रमुख नहीं हो सकते जो भारत का अभिन्न अंग है. संघ के दायरों में निर्वाचित सदर-ए-रियासत की मांग के साथ अलग ध्वज पर बहस को सहजता के साथ स्वीकार नहीं किया गया है. संघ परिवार में अधिकांश सदस्यों का मानना है कि इन दो मांगों पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता. 

जब शेख अब्दुल्ला के पोते उमर अब्दुल्ला ने जनवरी 2009 में मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला तब अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी के इस युवा नेता से काफी उम्मीदें लगाई गई थी. उमर आधुनिक होने के साथ-साथ ऊर्जावान भी थे और राज्य के युवा वर्ग के प्रतिनिधि थे. ऐसी आशा की जा रही थी कि वह अपने नवीन दृष्टिकोण के साथ राज्य को घेरे हुए कई जटिल मुद्दों का समाधान करने में सफल रहेंगे. किसी ने भी धाराप्रवाह स्थानीय भाषा बोलने की उनकी असमर्थता का विरोध नहीं किया और न ही कोई यह मानने को तैयार था कि शासन करने की अनुभवहीनता उनकी सफलता में बाधा उत्पन्न कर सकती है. लेकिन उमर अब्दुल्ला ने चुनावों में पराजय के बाद 6 वर्षीय कार्यकाल के अंत में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

हालांकि, कई मौकों पर पिता के संरक्षण का लाभ उठाने वाले उमर अब्दुल्ला के विपरीत महबूबा मुफ्ती को अपने  बूते पर मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारियों का भार वहन करना होगा. एक तथ्य जो उन्हें बढ़त प्रदान करता है वो ये कि 1996 में प्रचलित राजनीति में धकेलने के बाद से उन्होंने जमीनी स्तर पर उल्लेखनीय कार्य किया है. युवा कार्यकर्ताओं के लिए महबूबा पार्टी का चेहरा हैं. भले ही उनके पास सरकार चलाने का प्रशासनिक अनुभव न हो लेकिन वह राजनीतिक मैदान से भली-भांति परिचित हैं. वह अपनी स्थिति सुदृढ़ करना चाहेंगी और कठोर फैसले लेने से कतई संकोच नहीं करेगी.