बुलफाइटिंग (सांड की लड़ाई) एकमात्र ऐसी कला है जिसमें बुलफाइटर की जान जाने का खतरा बना रहता है. इस प्रदर्शन में प्रतिभा की कोटि को बुलफाइटर के सम्मान के लिए छोड़ दिया जाता है. एक राजनीतिक नेता की शक्ति को मित्रों व विरोधियों पर समान रूप से दबाव डालने की उसकी क्षमता से आंका जाता है. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने राज्यसभा पर आश्रित मोदी सरकार को आक्रामक तेवर दिखाते हुए तमिलवासियों की 1500 वर्ष पुरानी सांड की लड़ाई ‘जल्लीकट्टू’ पर से न्यायिक प्रतिबंध हटाने को कहा. जयललिता को तमिलनाडु की जनता का अपार समर्थन प्राप्त है और वह ‘जल्लीकट्टू’ पर से प्रतिबंध उठाने में सफल रहीं. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही मुख्यमंत्री ने मतदाताओं को यह सिद्ध कर दिया है कि उनके पास राज्य एवं केंद्रीय स्तर की राजनीति पर शासन करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख है.

जयललिता ने अनुभव किया कि उनके राज्य में सांड की लड़ाई योद्धाओं का खेल होने के नाते तमिल संस्कृति का एक हिस्सा है. वह यह भी जानती हैं कि तमिलनाडु में पैर जमाने का प्रयास कर रही भाजपा तमिलवासियों का समर्थन प्राप्त करना चाहती है और उन्हें अपने विश्वास में लेना चाहती है. वह यह भी जानती हैं कि नरेंद्र मोदी एक हठी एवं जोखिम लेने वाले प्रधानमंत्री हैं. नरेंद्र मोदी ने महीनों तक इस मुद्दे पर विचार करने के बाद पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के जल्लीकट्टू को अनुमति देने के प्रस्ताव को एकाएक मंजूरी दे दी.

यह जयललिता की लोकप्रियता की शक्ति ही थी जिसने चुनावों की औपचारिक प्रक्रिया के शुरू होने से पहले ही केंद्र को झुकने के लिए विवश कर दिया. जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने के लिए राजग सरकार अन्नाद्रमुक के समर्थन पर निर्भर है. तमिलनाडु की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल इस वर्ष मई माह में समाप्त हो रहा है. केवल तमिलनाडु ही नहीं, असम, केरल, पांडिचेरी और पश्चिम बंगाल में भी इस वर्ष अप्रैल से मई के बीच विधानसभा चुनाव होने हैं.

चाहे राज्य के लिए विशेष आर्थिक पैकेज हो या फिर श्रीलंका की जेल में कैद तमिल मछुआरों की शीघ्र रिहाई, जयललिता संभवत: अकेली ऐसी गैर-भाजपा मुख्यमंत्री हैं जिनकी ज्यादातर मांगों को राजग सरकार ने स्वीकृति दे दी है. एक दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्री और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी जयललिता की चिंताओं को दूर करने के लिए राज्य के आधिकारिक दौरे पर जा चुके हैं. यह शायद श्रेय लेने की राजनीति ही थी जिसने वित्तमंत्री अरुण जेटली से लेकर संसदीय कार्यमंत्री वैंकेया नायडू जैसे मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों को राज्य में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद केंद्र सरकार की ओर से किए जा रहे राहत कार्यों पर निगरानी रखने के लिए चेन्नई जाने के लिए प्रेरित किया. प्रधानमंत्री ने चेन्नई की यात्रा के दौरान 1 हजार करोड़ रुपए के विशेष अनुदान की घोषणा की, लेकिन जयललिता राजनीति की तमाम चालों से भली-भांति परिचित हैं. उनके प्रोत्साहकों का मानना है कि उनकी मौजूदा टीम ने सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन किया है और राज्य सांप्रदायिक दंगों से पूर्णत: मुक्त रहा. अन्नाद्रमुक के किसी भी शीर्ष पदाधिकारी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता का एक भी मामला प्रकाश में नहीं आया है. वहीं दूसरी ओर, करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक के कई शीर्ष नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं यह एक विभाजित परिवार की तरह दिखाई पड़ती है.

चुनाव सत्ता के सिद्धांतों की पृष्टि करते हैं. तमिलनाडु और पड़ोसी राज्य केरल में भी लगभग एक ही समय पर चुनाव होने हैं. प्राचीन तमिल परंपरा को सुरक्षित रखने वाली जयललिता के विपरीत, केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी को स्थानीय धार्मिक संगठन द्वारा आयोजित समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित नहीं किया. गौरतलब है कि इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे. राजग सरकार के सहयोगी और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को भले ही नरेंद्र मोदी के साथ कई बार मुलाकात करने का अवसर दिया जाता हो, लेकिन उन्हें तमिलनाडु की तुलना में कम वित्तीय कृपा प्राप्त होती है. विभिन्न राज्यों की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को मांगों की ऐसी लंबी सूची सौंप दी जाती है मानो सांडों का एक समूह लाल ध्वज की ओर तेजी से अग्रसर हो रहा हो. लेकिन, केंद्र ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की कई मांगों को ठुकरा दिया है. ममता बनर्जी और नीतीश कुमार आर्थिक राहत पैकेजों की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी मांगों पर शून्य प्रतिक्रिया दी जा रही है. यह केवल जयललिता ही हैं जिन्होंने राजग सरकार के साथ किसी प्रकार के राजनीतिक गठबंधन का संकेत दिए बिना भी अपनी शर्तें मनवाने के लिए मोदी सरकार को राजी किया है.

चुनावी विश्लेषक आश्वस्त हैं कि जयललिता को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि राज्य में उन्हें जोरदार चुनौती देने वाला ऐसा कोई राजनीतिक प्रतिद्वंदी नहीं है जो मतदाताओं को उनके चुंबकीय आकर्षण से दूर ले जा सके. इसके अलावा अपने ‘विजन 2020’ की घोषणा के साथ जयललिता ने राज्य के विकास का मानचित्र दिखाया है. उनके विपक्षी हताश और निराश हैं, वे आपस में लड़ रहे हैं.  

ऐसा नहीं है कि हर बुलफाइट में जीत हमेशा बुलफाइटर की ही हो. दोनों दक्षिणी राज्यों की चुनावी प्रतिद्वंदिता में कई समानताएं हैं. बीते 25 वर्ष में दोनों राज्यों में ऐसा मौका नहीं आया जब कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में आई हो. तमिलनाडु में मतदाताओं को करुणानिधि और जयललिता में से एक को चुनना होगा. केरल में भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पुराने दिग्गज वीएस अच्युतानंदन और कांग्रेस के मृदुभाषी ओमान चांडी पिछले 10 वर्ष से बारी-बारी सत्ता में आ रहे हैं.

हो सकता है कि केरल में चांडी इस बार भाग्यशाली न रहें. उन्हें सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ 2011 में 140 सदस्यीय विधानसभा में 72 सीटें जीतकर मुश्किल से बहुमत प्राप्त कर पाई थी. उनकी पार्टी अलग-अलग गुटों में बंट चुकी है. जाति और धर्म आधारित संगठन कांग्रेस के नेतृत्व से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और भाजपा व लेफ्ट की ओर रुख कर रहे हैं. हालांकि कई मोर्चों पर चांडी का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा है, लेकिन कांग्रेस अपनी समाज-व्यवहारिक रणनीति में नाकाम रही है. 91 वर्षीय अच्युतानंदन अभी भी केरल के सबसे लोकप्रिय राजनीतिज्ञ हैं लेकिन पिनाराय विजयन गुट ने पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता को नाकाम कर दिया है और संगठन का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है.

जहां एक ओर लेफ्ट की हार भारतीय माकर््सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे और पार्टी प्रमुख सीताराम येचुरी के संगठनात्मक कौशल पर सवाल उठाएगी, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की जीत गांधी परिवार को प्रोत्साहित करेगी. भाजपा नरेंद्र मोदी सहित अपने अपने शीर्ष नेताओं को चुनावी रणक्षेत्र में उतार कर राज्य में खाता खोलने का प्रयास करेगी.

वर्ष 2016 में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय बाहुबलियों के राजनीतिक परिदृश्य पर उभरकर आने की संभावना जताई जा रही है. यह क्षेत्रीय सूबेदार असम में भाजपा और केरल में कांग्रेस का राजनीतिक भविष्य तय करेंगे. केवल जयललिता ही हैं जो लगातार दूसरी बात सत्ता ग्रहण कर सेंट जॉर्ज फोर्ट में मुस्कुराते हुए प्रवेश करेंगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)