नरेंद्र मोदी के विकास एजेंडे में मौजूदा महानगरीय केंद्रों के साथ-साथ सैकड़ों नई ‘स्मार्ट सिटी’ का निर्णय एक मुख्य मुद्दा है. लेकिन, सरकार द्वारा तैयार की गई स्मार्ट सिटी परियोजना एक पूर्णत: स्पष्ट ढांचे के रूप में जनता तक नहीं पहुंच पाई है. ऐसा करना आवश्यक है ताकि जनता यह मालूम करने में सक्षम हो सके कि यह पहल उनके लिए क्यों आवश्यक है और यह किस प्रकार देश को आगे ले जा सकती है. अगर इस विचार को महज चंद सीसीटीवी कैमरों और बैंकों एवं अस्पतालों के साथ ऑनलाइन क्नेक्टिविटी शुरू करने तक ही सीमित नहीं रखना है तो स्मार्ट सिटी के ऐसे तीन पहलू हैं जिन्हें समझने की आवश्यकता है.
 
सबसे पहले लोगों को ‘स्मार्ट’ शब्द की उचित समझ होनी चाहिए. आप ‘स्मार्ट’ शब्द को किस प्रकार समझते हैं? परिभाषा के अनुसार, स्मार्ट होने का अर्थ है सीमित संसाधनों में अधिक उत्पादन करने में सक्षम होना. स्मार्ट सिटी के संदर्भ में इन संसाधनों को धन, मानव शक्ति और समय का नाम दिया जा सकता है. एक स्मार्ट सिटी इस विचार को शासन, जन सेवाओं और सुरक्षा एवं रक्षा के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र पर लागू करती है. स्मार्ट सिटी परियोजना का उद्देश्य ऐसी शासन-प्रणाली का उन्नयन करना है जिसके साथ स्थानीय नागरिकों को दैनिक आधार पर निपटना पड़ता है. यह जनता को परिवहन, चिकित्सा और संचार से लेकर व्यापार और बैंकिंग तक बेहतर सेवाएं प्रदान करने का प्रयास करती है. और अंत में, यह वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा और हिफाजत को बेहतर बनाती है. संक्षेप में कहें तो स्मार्ट सिटी विकास और सुरक्षा मानकों पर बेहतर परिणामों का उत्पादन करती है. नौकरशाही में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण सरकारी कार्यालयों तक लोगों की अभिगम्यता की समस्या के कारण भारत में स्थानीय स्वशासन आमतौर पर दुर्बल था. आलेखों का कंप्यूटरीकरण, सरकारी विभागों के साथ ऑनलाइन लिंकेज की सुविधा और संबंधित नागरिकों को व्यक्तिगत मामलों की प्रगति की सूचना देने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल स्मार्ट शासन प्रणाली के प्रमुख घटक हैं. 
 
सार्वजनिक सेवाएं शहरी जीवन की गुणवत्ता को परिभाषित करती हैं और सड़क परिवहन, जरूरत के समय अस्पतालों का उपयोग और आवश्यक वस्तुओं के आपूर्ति क्रम का रखरखाव सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाओं में गिनी जाती हैं. इन सेवाओं में दोनों सार्वजनिक और निजी क्षेत्र शामिल हैं और प्रौद्योगिकी उन्नयन को इन दोनों क्षेत्रों को समाविष्ट करना होगा. पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम) बसों और उबेर जैसे निजी टैक्सी सेवा प्रदाताओं को भी स्मार्ट सिटी की जरूरतों को पूरा करने के लिए समान रूप से योग्य बनना होगा. सरकारी अस्पतालों और निजी चिकित्सा प्रतिष्ठानों को लोगों की सेवा करने में प्रौद्योगिकी का व्यावहारिक ज्ञान रखना होगा. स्मार्ट सिटी की समझ में एक बड़ा वैचारिक दोष यह है कि इस तथ्य का पर्याप्त रूप से एहसास नहीं किया गया है कि जब तक एक शहर ‘सुरक्षित और महफूज’ नहीं है, तब तक उस शहर को ‘स्मार्ट सिटी’ नहीं कहा जा सकता. इसलिए, स्मार्ट सिटी परियोजना को पुलिस विभाग को आवश्यक रूप से प्राथमिकता देनी चाहिए जिसकी न केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने में, बल्कि सीमा-पार आतंकवाद के खतरे, बाहरी शत्रु के साथ मिलजुल कर कार्य करने वाले असामाजिक तत्वोें और ड्रग तस्करों से शहर की सुरक्षा करने में भी अहम भूमिका है. मानवीय चूक के कारण शासन प्रणालियों में आई गड़बड़ी से हुए नुकसान से बचाव को ‘सुरक्षा’ कहते हैं, जबकि विदेशी शत्रु के गुप्त कृत्यों से बचाव को ‘रक्षा’ कहते हैं. एक पुलिस कमिश्नर उसके प्रभार अधीन एक बड़े शहर को सुरक्षित और महफूज रखने के लिए किन चीजों का होना आवश्यक समझता है? एक सात सूत्रीय ढांचा उसकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है. सबसे पहले, वाहनों के लिए सड़क ‘अभिगम नियंत्रण’ बिंदुओं की पहचान की जानी चाहिए ताकि इन्हें सीसीटीवी और नंबर प्लेट मान्यता प्रणाली(एएनीपीआर) के कार्यक्षेत्र के तहत लाया जा सके. यह किसी संदिग्ध वाहन के बारे में चेतावनी पर जांच के साथ-साथ सामयिक अनियमित चेकिंग को भी संभव बनाता है. दूसरा, मुख्य मार्गों और संवेदनशील पड़ोसी राज्यों की सड़कों को भी वीडियो सर्विलांस के तहत लाया जाना चाहिए ताकि किसी भी वाहन पर नजर रखी जा सके. तीसरा बिंदु है निर्धारित संवेदनशील संस्थाओं की सुरक्षा जिन्हें ‘आंतरिक सुरक्षा घेरे’ के तहत रखे जाने की आवश्यकता है. इनमें अस्पताल, विश्वविद्यालय, बैंकों सहित सामरिक महत्व वाले उद्योग, भीड़भाड़ वाले पूजनीय स्थल, प्रमुख बाजार परिसर शामिल हैं. सार्वजनिक अथवा निजी क्षेत्र के संबंधित प्रबंधन को पुलिस के साथ आवश्यक रूप से सुरक्षा योजना की समीक्षा करनी चाहिए और इन प्रतिष्ठानों का पुलिस कमिश्नर के कमांड सेंटर एवं मास्टर कंट्रोल के साथ सीधे संपर्क और वीडियो लिंक होना चाहिए. 
 
चौथा, पुलिस गश्ती दलों को विशेष रूप से रात के समय में पर्याप्त गश्त करनी चाहिए और उन्हें किसी भी आकस्मिक घटना का सामना करने के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया को गति प्रदान करने की स्थिति में होना चाहिए. पांचवा, बम निरोधी दस्ते के अलावा तकनीकी रूप से सुसज्जित क्विक रिस्पांस टीमों को यथोचित पुलिस स्टेशनों पर स्थित   होना चाहिए. किसी भी कार्रवाई के दौरान क्विक रिस्पांस टीमों, पुलिस गश्ती दलों और बम निरोधी दस्तों को कंट्रोल सेंटर के साथ सीधे ऑडियो-विजुअल संपर्क में होना चाहिए. छठा बिंदु यह कि स्मार्ट सिटी में अधिसूचना स्क्रीनों को एक नेटवर्क होना चाहिए और प्रमुख परिवहन बसों में भी यह स्क्रीनें लगी होनी चाहिए ताकि कंट्रोल सेंटर द्वारा जारी की गई किसी भी चेतावनी का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जा सके. अंत में, उपरोक्त बिंदुओं से यह स्पष्ट है कि एक ‘सुरक्षित और महफूज’ स्मार्ट सिटी के लिए अत्याधुनिक मास्टर कंट्रोल एवं कमांड सेंटर अत्यावश्यक है. इस में अच्छी तरह से प्रशिक्षित कर्मियों को नियुक्त किया जाना बेहद महत्वपूर्ण है जो किसी भी आपातकालीन स्थिति में अपने कार्य को बखूबी अंजाम दे सकें. 
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)