मुंबई कांग्रेस के मुखपत्र ‘कांग्रेस दर्शन’ में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति पर सवाल खड़े किए गए थे और सोनिया गांधी के पिता को ‘फासीवादी’ के रूप में वर्णित किया गया था. यह विवादास्पद लेख 28 दिसंबर को अपना 130वां स्थापना दिवस मनाने वाली भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के हालात दर्शाता है. इस घरेलू पत्रिका द्वारा उत्पन्न किया गया बड़ा विवाद यह संकेत देता है कि केंद्र व राज्यों में पार्टी के शीर्ष पदाधिकारी न तो कांग्रेस की विचारधारा और न ही इसके इतिहास से परिचित हैं. अगर कांग्रेस के आला पदाधिकारियों को कांग्रेस के इतिहास की उचित जानकारी होती तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पर इस ढंग से हमला करने की हिम्मत किसी में न होती. यह सुस्पष्ट है कि अन्य संगठनों से आए तत्वों ने पार्टी में घुसपैठ की है और इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि कांग्रेस द्वारा उन्हें स्वीकार किया गया है.

 जाहिर है कि कांग्रेस इन दिनों गहरे संकट के दौर से गुजर रही है. गांधी परिवार के करीबी समझे जाने वाले प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर जोया हसन ने एक साक्षात्कार में कांग्रेस के मौजूदा संकट की ओर संकेत किया जब उन्होंने बताया कि सोनिया और राहुल कभी भी जन-साधारण के नेता नहीं थे और पार्टी गत 20 वर्ष में भारत में आए बदलावों के साथ संपर्क में नहीं है. कांग्रेस को वंशवाद राजनीति से आगे देखना होगा हालांकि निकट भविष्य में ऐसा होने की संभावना नहीं है. जोया हसन ने अवलोकन किया कि मौजूदा नेतृत्व संकट के लिए वंशवादी निर्धारण जिम्मेदार है. दोहरे नेतृत्व का मॉडल मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के साथ प्रभावशाली नहीं सिद्ध हो सका, और न ही यह सोनिया और राहुल के साथ सफल हो सकता है. संगठनात्मक उत्थान का कोई भी संकेत देखने को नहीं मिल रहा है.

 कांग्रेस के साथ समस्या यह है कि इसके नेतृत्व का अभी भी यह मानना है कि वह देश का संचालन कर रहा है, जबकि चुनावी प्रमाण संकेत करता है कि पार्टी की पकड़ उन क्षेत्रों पर से भी ढीली हो रही है जहां कभी उसका एकछत्र प्रभुत्व हुआ करता था. अगर कांग्रेस आज भी कुछ क्षेत्रों में अपना आधार बनाए रखने में सक्षम है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि कांग्रेस के कुछ क्षेत्रीय नेता उनके अपने निजी प्रभाव के कारण कांग्रेस के अस्तित्व को बरकरार रखे हुए हैं. लेकिन चूंकि शीर्ष नेतृत्व से संगठन को पुनर्जीवित करने को लेकर कोई ठोस दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं, यह भी ज्यादा से ज्यादा केवल एक अस्थाई उपाय हो सकता है.

 कांग्रेसी आलाकमान द्वारा साधारण पार्टी कार्यकर्ताओं से दूरी बना लेना पार्टी के पतन के पीछे मुख्य कारणों में से एक है और पार्टी नेतृÞत्व के ऐसे उपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण कई कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने दूसरे दलों से नाता जोड़ लिया है. मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष संजय निरुपम मूल रूप से शिव सैनिक हैं और शिव सेना की विचारधारा से प्रेरित हैं. कांग्रेस दर्शन में विवादास्पद लेख के प्रकाशन के बाद उन्होंने अपने विरोधियों पर सार्वजनिक क्षेत्र में घरेलू परिचालित पत्र में जानकारी लीक कर उन्हें निशाना बनाने का आरोप लगाया है. प्रासंगिक सवाल यह है कि मुंबई कांग्रेस के भीतर उनके विरोधी उन्हें निशाना बनाने के लिए इस अवसर का इस्तेमाल क्यों नहीं करेंगे क्योंकि उनके अनुसार संजय निरुपम को कभी भी प्रतिष्ठित पर पर उन्नत नहीं किया जाना चाहिए था.

 केंद्र में मधुसूदन मिस्त्री जैसे नेता भी हैं जो भारतीय जनता पार्टी से कांग्रेस में आए हैं. हैरानी की बात है कि मधुसूदन मिस्त्री को राहुल गांधी के करीबी सहयोगियों में से एक माना जाता है. 45 सांसदों वाली पार्टी में 52 प्रवक्ताओं की लंबी सूची भी दर्शाती है कि किस प्रकार पार्टी के इतिहास और विचारधारा से अनभिज्ञ पदाधिकारी इन दिनों विभिन्न चैनलों पर रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई देते हैं. भले ही चापलूसों से घिरा पार्टी नेतृत्व ऐसी नियुक्तियों के परिणामों को नहीं समझ सकते, साधारण जनता इन चीजों को आसानी से परख सकती है. अन्य दलों से कांग्रेस में प्रवेश करने वाले राजनीतिज्ञ और भी हैं. इनमें आधे से अधिक वह नेता हैं जिन्होंने हाल के बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की. इंदिरा गांधी के राजनीतिक सलाहकार मक्खन लाल फोटेदार ने भी अपनी पुस्तक में बाहरी नेताओं के अतिक्रमण की बात की है और साथ ही उन्होंने यह उल्लेख भी किया है कि इन बाहरी नेताओं को पार्टी नेतृत्व का संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद पार्टी कैडर में उनके प्रवेश को लेकर नाराजगी और असहमति का माहौल था. 2014 संसदीय चुनावों में पराजित होने का प्रधान कारण यह था कि कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने शीर्ष नेतृत्व के असंतोषजनक व्यवहार से खिन्न होकर घर बैठना उचित समझा. सर्वोच्च विडंबना यह थी कि कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने अपनी पार्टी की हार का जश्न उसी जोश के साथ मनाया जिस जोश से भाजपा कार्यकर्ताओं ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी पार्टी की अप्रत्याशित जीत का जश्न मनाया.

 किसी के भी मन में इसको लेकर कोई संदेह नहीं है कि राहुल गांधी संगठन को पटरी पर वापस लाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. हमें प्रोफेसर जोया हसन द्वारा उल्लिखित तथ्य   पर भी गौर फरमाना चाहिए कि राहुल गांधी के संवाद कौशल को ज्यादा से ज्यादा औसत दर्जे का कहा जा सकता है. उन्हें जनसाधारण के स्वीकार्य नेता के रूप में विकसित होना होगा. वह ऐसी चीजों के लिए श्रेय पाने का प्रयास करते हैं जिनका व्यक्तिगत रूप से उनके साथ कुछ लेना देना नहीं है और यह बेहद स्पष्ट है कि उन्हें उचित परामर्श नहीं मिल रहा. सोनिया गांधी पर अपने पुत्र को सफल होते देखने का जुनून सवार है. लेकिन उनका यह जुनून भी कारगर सिद्ध होता दिखाई नहीं दे रहा. सोनिया भले ही इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवारत कांग्रेस अध्यक्ष बन गई हैं, लेकिन वह बीते कुछ वर्षों में पार्टी कैडर को प्रेरित करने में विफल रही हैं. ऐसा काफी हद तक इसलिए है क्योंकि उन्होंने भी स्वयं को ऐसे सलाहकारों से घेर लिया है जिन्होंने उनके व साधारण कार्यकर्ता के बीच दूरी बना दी है. जब तक इस स्थिति को उलट नहीं दिया जाता, कुछ भी उल्लेखनीय प्राप्त नहीं किया जा सकता. पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कुछ कमी आई है. लेकिन कांग्रेस इसका लाभ तब तक नहीं प्राप्त कर सकती जब तक पार्टी नेतृत्व अपनी कार्यशैली में बदलाव नहीं लाता. मौजूदा स्थिति को देखते हुए, कांग्रेसी आलाकमान और जमीनी हकीकतों से उसका अलगाव ही प्रधानमंत्री मोदी के उज्जवल भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)