2014 में सत्ता आने के बाद से नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में प्रत्यक्ष द्विविधता देखने को मिली है. यह विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन के बीच का अंतर है.सबसे पहले, यह स्पष्ट रूप से नरेंद्र मोदी हैं जो जोखिम लेते हुए और आलोचनाओं का सामना करते हुए इस प्रक्रिया का संचालन कर रहे हैं. सतर्क मनमोहन सिंह के नेतृत्व में श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और मालदीव के साथ रिश्ते बिगड़ गए थे, जबकि आज इन देशों के साथ संबंधों को न केवल दुरुस्त किया जा रहा है बल्कि यह अतीत की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं.यहां तक कि पाकिस्तान ने भी अपना दृष्टिकोण बदला है और ऐसी आशा की जा रही है कि भारत के प्रति द्वेषपूर्ण रुख अपनाने वाली पाकिस्तानी सेना भी अंतत: इस तथ्य को स्वीकार करेगी कि भारत के साथ अच्छे संबंध ही उनके देश को उस गहरे रसातल से निकाल सकते हैं जिसमें उत्साही नीतियों ने उसे धकेल दिया है. शोचनीय ढंग से, यह अब तुर्की है जो पूर्ण रूप से यूरोपीय देश होने के प्रयास में पाकिस्तान के नक्शेकदम पर चल रहा है. अरबी जगत के जातीय और सांप्रदायिक मतभेदों में अपनी भागीदारी के कारण तुर्की सामाजिक अराजकता की ओर तेजी से कदम बढ़ाने के साथ-साथ उस गृहयुद्ध की दिशा में भी अग्रसर हो रहा है जिसे रेसिप तइब इर्दोगन द्वारा सीरिया में भड़काया गया है.अगर पाकिस्तान बांग्लादेश की नीति का अनुकरण करते हुए भारत के साथ शत्रुता के बजाय भागीदारी की नीति को अपनाए, तो उसकी अर्थव्यवस्था एक बार फिर पटरी पर आ जाएगी और वह देश आर्थिक बदहाली के दौर से निकलने में सक्षम हो सकेगा.
 
आजकल, प्रमुख वैश्विक प्रकाशनों के कार्टूनकार भी प्रमुख वैश्विक राजनेताओं के व्यंग्य चित्र बनाते हुए नरेंद्र मोदी को अपने चित्रों में जोड़ लेते हैं.प्रधानमंत्री मोदी को बराक ओबामा, शी जिनपिंग और एंजला मॉर्कल के साथ चित्रित किया जाता है जो इस बात का संकेत है कि जवाहरलाल नेहरू के बाद नरेंद्र मोदी ऐसे पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की ऊंची मेज के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया गया है.चिरकालिक मोदी आलोचक शायद प्रधानमंत्री के विदेश दौरों को नाटक करार देकर खारिज कर दें, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि 26 मई 2014 के बाद से चाहे अमेरिका हो या चीन, जापान हो या इंग्लैंड, भारत को लेकर ऐसी चहलपहल और संवेग है जो पूंजी के भारी निवेश में परिवर्तित हो सकती है.लेकिन, ऐसा तभी संभव है जब मोदी एजेंडे का आर्थिक भाग उसी ऊर्जाशक्ति और नवीन भावना का प्रदर्शन करे जिसे विदेश नीति में प्रचुरता में देखा जा सकता है.नार्थ ब्लॉक का अधिकारी वर्ग भले ही भिन्न प्रकार का दावा करे, लेकिन सरकार के दायरे से बाहर लोगों को पिछले दोनों बजटों में मोदी के बजाय मनमोहन सिंह की छाप ज्यादा दिखाई दी है.पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपने कार्यकाल के प्रारंभिक 100 दिनों में बड़ी संख्या में आर्थिक सुधारों को लागू किया, लेकिन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने आयातों एवं विदेशी कंपनियों पर लगाए जाने वाले करों में कटौती करके और घरेलू करदाताओं एवं उद्योग के करों को ऊंचा रखकर आर्थिक सुधारों के प्रभाव को कुछ हद तक फीका कर दिया.
 
नार्थ ब्लॉक के बाबुओं की तरह मनमोहन सिंह भी भारतीय करदाताओं की पीड़ा को कम करने के विचार से बेहद घृणा करते हैं और उनके इस पूर्वाग्रह को उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए हर बजट में देखा जा सकता था.जब वह 10 वर्ष तक देश के प्रधानमंत्री रहे, तब भी उनके दृष्टिकोण में किसी प्रकार का बदलाव नहीं आया.यह तो शुक्र है नरसिम्हा राव का जिन्होंने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह को करदाताओं के साथ ‘भद्र और निष्पक्ष’ रूप से व्यवहार करने का आदेश दिया.उनके इस आदेश ने सुनिश्चित किया कि मनमोहन सिंह ने चिदंबरम के प्रतिगामी ‘पुलिस कांस्टेबल’ दृष्टिकोण की शुरुआत नहीं की, जिन्होंने गैर-हिसाबी आमदनी की जांच करने के आड़ में आतंक के ऐसे राज्य की स्थापना की जिसके परिणामस्वरूप भारत के हजारों सबसे अधिक उत्पादक भावी उद्यमियों को सिंगापुर व अन्य विदेशी स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा.वे ऐसे देश में कारोबार करना नहीं चाहते थे जहां उनके साथ अपराधियों की तरह बर्ताव किया जाए क्योंकि चिदंबरम की नजर में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगियों को चुनौती देने वाला हर सफल स्वदेशी उद्योगपति एक अपराधी था. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब मैंने ही उन्हें डेंग जियोपिंग (चीनी क्रांतिकारी और राजनेता) के भारतीय उत्तर के रूप में वर्णित किया था.पीपल्स रिपब्लिकन पार्टी में नेतृत्व की ओर चढ़ाव के दिनों से ही डेंग ने ऐसी विकास दर सुनिश्चित की जो भारत की मौजूदा वर्तमान दर से दोगुनी है.जो लोग आज आत्मतृष्टिपूर्वक और शेघी बघारते हुए उत्कृष्टता के सबूत के रूप में 7 प्रतिशत विकास दर की बातें करते हैं, उन्हें यह जानने की आवश्यकता है कि मोदी मापदंड दोहरे अंकों की विकास दर का आदेश देता है और इससे कुछ भी कम पर्याप्त नहीं है.ऐसा होने के लिए प्रतिबंधों की बहुतायत को समाप्त करने की आवश्यकता है जिनका एकमात्र उद्देश्य रिश्वतखोरी को बढ़ावा देना है.करों में कटौती करना आवश्यक है, ताकि अर्थव्यवस्था का विस्तार हो सके.‘जब तक बिल्ली   चूहे पकड़ रही है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका रंग काला है या सफेद।’ जहां तक काले धन का सवाल है डेंग के इन शब्दों को ऐसे संदर्भ में याद रखना चाहिए जहां काले धन के उत्पादन की उच्च दर बरकरार है, लेकिन कर लगी वस्तुओं पर इसका व्यय बढ़ने के बजाय कम होता जा रहा है.
 
रघुराम राजन और अरविंद सुब्रमण्यम का मानना है कि एक वर्ष के भीतर सारा भारत नकदी के स्थान पर अमेरिकी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करने लगेगा.जन-धन योजनाओं जैसे नवाचार निश्चित रूप से बैंकों और क्रेडिट कार्ड कंपनियों की भूमिका को गति देंगे, लेकिन इसी बीच रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण घरेलू खपत का अनावश्यक अध्यादेशों द्वारा दम नहीं घोंटा जाना चाहिए.उदाहरण के लिए, ऐसे देश में जहां कुल आबादी का 10 फीसदी से भी कम हिस्सा क्रेडिट अथवा डेबिट कार्ड का उपयोग करता है, वहां लेन-देन की श्रृंखला के लिए पैन कार्ड को आवश्यक बनाना. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति के क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से दिखाया है, उन्हें नार्थ ब्लॉक के बाबुओं से आर्थिक नीति की कमान अपने हाथों में लेने की जरूरत है.आगामी बजट में अमेरिका के बजाय भारत के वास्तविक आर्थिक जीवन को प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा न हो पाया तो भाजपा के शासनकाल के शेष 3 वर्ष के प्रदर्शन से लगाई जा रही उम्मीदों पर संदेह की काली परछाई पड़ जाएगी.राजकोषीय समेकन केवल ऐसे माहौल में संभव हो सकता है जहां नीतियों को विकास द्वारा प्रेरित किया जाए और ऐसा होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विदेश नीति की तरह आर्थिक नीति पर भी अपनी निजी छाप छोड़ने की जरूरत है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)