इतिहास गवाह है कि आंखें मूंद के किया गया भरोसा हमेशा घातक सिद्ध होता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अवश्य ही उस दिन को कोस रहे होंगे जब उन्हें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के नेतृत्व वाले राजनीतिक प्रतिष्ठान पर भरोसा करने के लिए आश्वस्त किया गया था. एक नवीन कूटनीति को अवसर देते हुए मोदी भारत-पाक शांति वार्ता के ऐतिहासिक सच को भूल गए. पठानकोट स्थित एयरबेस पर हमला करके पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने नए साल के एक रक्तरंजित संदेश में दोनों नेताओं के बीच बढ़ती दोस्ती का कत्ल कर दिया.
 
शरीफ को उनके जन्मदिन की बधाई देने के लिए लाहौर जाने के साहसिक कदम के महज एक हफ्ते बाद किए गए फिदायीन हमलों ने इस कठोर हकीकत को प्रबलित कर दिया कि पाकिस्तान का राजनीतिक मार्ग ऐसे भारत-आलोचकों द्वारा बाधित है, जिनका एकमात्र उद्देश्य उनके विशालकाय पड़ोसी देश का खून बहने देना है. ये देशद्रोही बीते 20 माह में शरीफ और मोदी की चार मुलाकातों को महज सामाजिक आमोद-प्रमोद के रूप में प्रस्तुत करते हैं.वे दिसंबर 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनके और नवाज शरीफ के बीच विचार-विमर्श के प्रयोजन व विषय वस्तु को नजरअंदाज कर देते हैं. पाकिस्तान के समानांतर संस्थापन का प्रभावशाली वर्ग बैंकाक में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच हुई बैठक में लिए गए निर्णयों को रद्दी की टोकरी में फेंके जाने वाले अनावश्यक कागज के टुकड़े समझता है.उन्होंने मैत्री के हर प्रस्ताव का जवाब बंदूकों की गोलियों और ग्रेनेड हमलों से दिया है. यह उन्हें हथियार, महिलाएं और पैसा देने के साथ-साथ लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार को आदेश देने का अधिकार देता है.दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच बढ़ती खुशमिजाजी की अवमानना करते हुए आतंकवादियों ने गत वर्ष भारत के 50 से भी अधिक सुरक्षा कर्मियों को मार गिराया.
 
पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले पर हैरत में पड़ने वाली कोई बात नहीं है.मोदी के लिए उनके हाव-भाव पर ऐसी कुरूप प्रतिक्रिया इससे बुरे समय पर नहीं आ सकती थी.उन्होंने पहले ही अपने मूल मतदाता वर्ग की अवहेलना की है जो पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता नहीं, बल्कि युद्ध चाहता है.उन्होंने अपने मंत्रियों और राजनयिकों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि शांति वार्ता को अतिरिक्त अवसर देने के लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयास करने के लिए तैयार रहना चाहिए.इन सभी संकेतों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि घरेलू और विदेशी वार्ताकारों ने मोदी को आश्वस्त किया था कि नवाज शरीफ एक व्यापक भारत-पाक वार्ता की सफल निरंतरता सुनिश्चित करने में सक्षम हैं.इससे पहले 2004 में चालबाज परवजेश मुशर्रफ ने वाजपेयी को लिखित आश्वासन दिया था कि आतंकवादियों को भारत के खिलाफ पाक नियंत्रित क्षेत्र के किसी भी हिस्से का इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा.यह एक मजाक था क्योंकि विनाशकारी मुंबई हमलों सहित अन्य आतंकी हमलों में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई.राजनयिक सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने बैंकाक में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तानी सेना सभी आतंकवादियों को खदेड़ डालेगी और भारत को क्षति पहुंचाने की उनकी क्षमता को पंगु बना देगी.सुषमा स्वराज के इस्लामाबाद दौरे के दौरान भी इस आश्वासन को दोहराया गया.यह आपसी सामंजस्य का माहौल ही था जिसने नरेंद्र मोदी को लाहौर जाने के लिए प्रोत्साहित किया.
 
पठानकोट संकट ने न केवल भारत-पाक संबंधों की पेचीदा गुत्थी को सुलझाने के मोदी के संकल्प को मंद किया है, बल्कि एक बार फिर से साबित कर दिया है कि शरीफ एक उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं क्योंकि सशस्त्र बलों पर उनका पूरा नियंत्रण व अधिकार नहीं है.उन्हें संसद में भी सुविधापूर्ण राजनीतिक बहुमत प्राप्त नहीं है.उन्हें अभिजात एवं कुलीन वर्ग और बड़े व्यापारिक हितों के प्रतीत के रूप में देखा जाता है.चूंकि, वह भावनात्क रूप से शेष पाकिस्तान के बजाय भारत से सटे पंजाब से नाता रखते हैं, उन्हें लाहौर के अमीर और शक्तिशाली वर्ग के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों से अधिक समर्थन प्राप्त नहीं है.सत्ता में उनके पूर्व कार्यकाल के दौरान सेना द्वारा उन्हें अनायास ही पदच्युत कर दिया गया था क्योंकि उन्हें और उनकी पार्टी को निष्प्रभावी और अमेरिका का गुलाम समझा जाता था.नवाज शरीफ पिछले 4 वर्ष के दौरान पाकिस्तान की कट्टरपंथी ताकतों के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने में विफल रहे हैं.बातचीत का विरोध करने वालों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि जब शरीफ अपने ही देश में जेहादियों पर नकेल नहीं कस पा रहे तो उन पर भारत को क्षति पहुंचाने वाली आतंकी स्थापाना को नष्ट करने का भरोसा कैसे किया जा सकता है?
 
नरेंद्र मोदी के शांति प्रयासों के आगे बढ़ने की डगर कठिन होती जा रही है लेकिन वे हरगिज नहीं चाहेंगे कि उनके द्वारा शुरू की गई बातचीत के क्रम में किसी प्रकार का ठहराव आए.शांति समर्थक और मूर्ख उदारवादी इस बात पर हंगामा मचाएंगे कि वार्ता में किसी भी प्रकार की रुकावट से कट्टरपंथियों के हौसले मजबूत होंगे.मोदी पर पिछले कुछ महीनों से उनकी टीम व पाकिस्तानी नेताओं के अीच हुई   वार्ता की विषय वस्तु और रूपरेखा पर प्रकाश डालने का दबाव भी रहेगा.चूंकि, मोदी अपरंपरागत राजनीति का अभ्यास करते हैं, उन्हें अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के वास्तविक सत्ताधारकों के साथ संपर्क स्थापित करना होगा.अभी तक सभी पूर्ववर्ती भारतीय नेता पाकिस्तान के साथ वार्ता में चंद राजनयिकों और सिविल सेवकों को शामिल करके अनुसारक मध्यस्थता पर डटे रहे हैं.मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि प्रधानमंत्री के लिए शायद पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठान को सहयोगित करने का समय आ गया है.भारत इस हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि पाकिस्तानी सेना ही उस देश की असली निर्णयकर्ता है.अगर मोदी-नीति को सफल होना है तो मोदी को या तो औपचारिक वार्ता प्रक्रिया में पाक सेना को शामिल करना चाहिए अथवा उसके सहयोग न करने की सूरत में उसे बेअसर कर देना चाहिए.आखिरकार, यह भारतीय सेना और निर्दोष नागरिक ही हैं जिन्हें पाक प्रायोजित आतंकवाद का खामियाजा भुगतना पड़ा है.दोनों देशों के वर्दीधारी अधिकारियों की उपस्थिति निश्चित रूप से बेहतर परिणाम देगी.अभी तक केवल शरीफ और मोदी के बीच मुलाकातें हुई हैं.जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय लोगों के जनादेश और सरकार की शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं दूसरी तरफ नवाज शरीफ पाकिस्तान सरकार की शक्ति नहीं, बल्कि महज एक चेहरा हैं.प्रधानमंत्री मोदी को शरीफ पर फिर से भरोसा करने से पहले उनकी विश्वसनीयता और स्पष्टता को सत्यापित करना ही होगा.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)