एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी गर्व से खुद को एक अलग राजनीतिक पार्टी के रूप में वर्णित करती थी. मगर बहुत कम समय में भाजपा एक अलग राजनीतिक पार्टी से मतभेदों वाली पार्टी बन गई है. पार्टी के भीतर चल रही लड़ाई शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से सामने आई है, लेकिन यह सर्वविदित है कि पार्टी के कई शीर्ष नेता महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक-दूसरे से सहमत नहीं होते और यह केवल सत्ता ही है जो इन नेताओं को आपस में जोड़ने वाली ताकत बनी हुई है.

संघ परिवार के भीतर सबसे मजबूत नेता बनने के लिए नरेंद्र मोदी के अभूतपूर्व उदय ने सुनिश्चित किया है कि उनके कई शत्रुुओं ने या तो चुप रहने में अथवा खुद को हशिए पर रहने तक सीमित कर लिया है. यहां तक कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे संस्थापक नेताओं को मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा बना दिया गया, जिसका राजनीतिक संदर्भ में अर्थ है जबरन सेवानिवृत्त करना. भाजपा के इन दोनों दिग्गजों ने जब यशवंत सिन्हा और शांता कुमार के साथ मिलकर बिहार चुनावों की हार की जिम्मेदारी तय करने की मांग की तो वर्तमान नेतृत्व भी चौंक गया. उनकी चिंताओं को नजर अंदाज कर दिया गया लेकिन इस चौकड़ी के जवाबी हमले में ज्यादा समय नहीं लगेगा.

भाजपा के भीतर बुनियादी समस्या यह है कि 1990 तक यह पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के निर्विवाद नेतृत्व में एक बड़े परिवार की तरह संचालन करती रही. मगर, वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के मध्य में आडवाणी और उनकी मंडली मजबूत होने लगी. इसका उद्देश्य था आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा को पूरा करना जो आज तक अधूरी रह गई है. वर्ष 2009 में भाजपा के कुलपति को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया लेकिन भाजपा को महज 116 सीटों से ही संतोष करना पड़ा. अन्य शब्दों में कहें तो मतदाताओं ने आडवाणी को सिरे से खारिज कर दिया. जब 2014 लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तब उन्हें खुद को साबित करने का मौका दिया गया.

नरेंद्र मोदी ने अन्य किसी भी राजनीतिज्ञ की तुलना में सबसे ज्यादा मेहनत की और उनके अथक प्रयास रंग लाए. भाजपा न केवल लोकसभा में अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने में सफल रही बल्कि वाजपेयी युग की तुलना में 100 सीटें अधिक सुरक्षित करने में सफल रही. विशाल जनाधार ने नरेंद्र मोदी को उनके सभी वरिष्ठ नेताओं से शीर्ष पर एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित कर दिया जिसके वर्चस्व को चुनौती नहीं दी जा सकती.

सरकार का उच्चतम कार्यालय ग्रहण करने के 18 माह बाद नरेंद्र मोदी आज भी पार्टी के सबसे ऊंचे नेता बने हुए हैं, हालांकि दिल्ली और बिहार में चुनावी पराजय के बाद उनकी प्रतिष्ठा में कुछ कमी जरूर आई है. इसलिए, जो परिस्थितियां पैदा हुर्इं हैं उनमें ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने विभिन्न मुद्दों पर बात करने का फैसला किया है. शत्रुघ्न सिन्हा और आरके सिंह ने बिहार चुनाव अभियान के मध्य में खरी स्पष्टवादिता के साथ खुद को व्यक्त किया. अडवाणी, जोशी, शांता कुमार और यशवंत सिन्हा ने स्पष्ट रूप से पार्टी के कामकाज में अधिक पारदर्शिता का समर्थन किया. तब भी, किसी ने अभी तक मोदी को चुनौती नहीं दी है भले ही उनकी क्रियाओं और निष्क्रियताओं को पार्टी के भीतर एक बड़े वर्ग द्वारा प्रोत्साहित और अनदेखा नहीं किया जाता. चूंकि यह सबको अच्छी तरह से मालूम है कि मोदी को आसानी से निशाना नहीं बनाया जाता, उनके विरोधी मोदी के दो सबसे भरोसेमंद सहयोगियों (अरुण जेटली और अमित शाह) को निशाना बनाने की रणनीति पर अमल कर रहे हैं.  इसलिए, अगर डीडीसीए को घेरे ताजा विवाद में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अरुण जेटली का बचाव किया और उन्हें निर्दोष बताया, तो उन्होंने ऐसा सतर्कता के साथ किया क्योंकि वे जानते हैं कि जेटली पर हमला एक प्रकार से मोदी सरकार की कार्यशैली पर हमले के समान है.

फिलहाल, अरुण जेटली का बचाव करना बेहद जरूरी था ताकि आग को और फैलने से रोका जा सके.  हालही में भाजपा से निष्कासित किए गए कीर्ति आजाद राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. आजाद बिहार के एक प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता भगवत झा आजाद केंद्रीय मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री थे और कीर्ति आजाद ने अपने पिता से ही राजनीतिक शिक्षा प्राप्त की है. वह दरभंगा से तीन बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और दिल्ली जिला क्रिकेट संघ(डीडीसीए) को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. जहां तक राजधानी में क्रिकेट संबंधी मामलों को चलाने की बात है, आजाद और जेटली एक ही कश्ती में सवार नहीं हैं. डीडीसीए में कुशासन संबंधी मुद्दों को उठाने के लिए आजाद को गलत नहीं ठहराया जा सकता. भले ही भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए आजाद ने किसी का नाम नहीं लिया, मगर उनके कार्यों से जाहिर हो जाता है कि वह जेटली को निशाना बनाना चाहते थे. इस तथ्य के बावजूद कि डीडीसीए के साथ उनके साहचर्य से शायद उन्हें कोई लाभ न पहुंचा हो, वित्तमंत्री को ऐसे जाल में फंसाने का विचार है जहां वह वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में फंस जाए. क्रिकेट के माध्यम से आजाद ने जो राह पकड़ी है, वो पूर्व टेस्ट क्रिकेटर को थोड़ी राहत प्रदान करती है लेकिन यह मोदी के विरोधियों को उन्हें घेरने का अवसर प्रदान करती है. अपने निलंबन के मामले को मध्यस्थता के लिए वरष्ठि नेताओं को सौंप कर कीर्ति आजाद अब मार्गदर्शक मंडल को पुनर्जीवित और महत्ता देने का प्रयास कर रहे हैं. इस प्रक्रिया में वह यह संदेश दे रहे हैं कि भाजपा में मार्गदर्शक मंडल भी अपीलीय प्राधिकरण है और वर्तमान नेतृत्व से ऊपर है.