वित्त, कॉरपोरेट मामलों व सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली के मित्रों व प्रशंसकों की सूची बहुत लंबी है और विशेष रूप से मीडिया जगत में जेटली के शुभचिंतकों की संख्या बहुत है. अरुण जेटली ने लालकृष्ण आडवाणी का अनुसरण करते हुए विभिन्न मुद्दों पर विचार व्यक्त करने के लिए निजी वेबसाइट और ब्लॉग का उपयोग करना शुरू कर दिया है. हाल ही में अरुण जेटली ने भारत में राजनीतिक बहस के अत्यंत विरोधात्मक बनने पर निराशा प्रकट की थी और उनके इस निजी मत को प्रेस में व्यापक रूप से बार-बार दोहराया गया है. जब एक कद्दावर राजनेता द्वारा निजी विचार व्यक्त करने के लिए निजी वेबसाइट व ब्लॉग का उपयोग किया जाए तो यह मीडिया के लिए चिंता का विषय बन जाता है. 
 
मीडिया को अक्सर कद्दावर राजनेताओं द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण बयानों की प्रतीक्षा रहती है ताकि इसमें कुछ ‘मिर्च-मसाला’ जोड़कर दर्शकों के सामने एक ‘सनसनीखेज’ खबर के रूप में पेश किया जा सके. किसी न्यूज चैनल अथवा समाचारपत्र को जितने अधिक लोग देखेंगे या पढ़ेंगे, वो उतने ही अधिक विज्ञापन आकर्षित करेगा और परिणामस्वरूप विज्ञापनों से मोटी कमाई होगी. एक नीरस टिप्पणी को अधिक तीक्ष्ण टिप्पणियों द्वारा दबाए जाने की पूरी संभावना बनी रहती है, जबकि वरिष्ठ नागरिकों के समूह द्वारा मौसम पर की जा रही चर्चा के बजाय राजनीतिक रूप से शक्तिशाली वर्ग के भीतर उत्पन्न लड़ाकू माहौल को सार्वजनिक हित के लिए अधिक अनुकूल माना जाता है. शिष्ट संभाषण के पुराने दिनों की याद करने वालों द्वारा मौखिक प्रतिद्वंदिता में चिन्हित की गई लाल रेखाओं की आजकल लापरवाही के साथ उल्लंघना की जाती है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा भारत के प्रधानमंत्री का वर्णन करने के लिए असामान्य रूप से इस्तेमाल किए गए निंदात्मक शब्द राजनीतिक संभाषण में मर्यादा व शालीनता की घोर उल्लंघना का सुस्पष्ट उदाहरण हैं. जो भी हो, हकीकत ये है कि ऐसी स्थिति के बरकरार रहने की प्रबल संभावनाएं हैं. मोदी सरकार की ‘प्रभावहीनता’ पर निरंतर टीका-टिप्पणी के बावजूद, प्रधानमंत्री के राजनीतिक प्रतिद्वंदी इस तथ्य के प्रति पूरी तरह से सतर्क हैं कि मोदी का शासन परिवर्तनकारी होने की क्षमता रखता है और सात दशकों की नेहरूवादी सर्वसम्मति को खत्म करने का माद्दा रखता है. 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आमतौर पर प्रचार के बिना, प्रशासन की कार्यशैली व प्रक्रिया को बदलने के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने में उन तत्वों को भी मजबूत करने में लगे हुए हैं जो सरदार पटेल के निधन के बाद गुमनामी के अंधेरों में चले गए और भारत के शासन को नेहरू की मजबूत पकड़ में छोड़ गए. अमर्त्य सेन, सुनील खिनानी और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के लिए अन्य प्रचारकों के शब्दों में जवाहरलाल नेहरू एक लोकतंत्रवादी थे और स्वतंत्रता के बाद उन्होंने केवल उन्हीं नीतियों को लागू किया जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से पसंद आर्इं. जवाहरलाल नेहरू ने इन नीतियों को लागू करने से पहले कांग्रेस पार्टी के भीतर प्रचंड बहुमत के साथ विचार-विमर्श करना भी आवश्यक नहीं समझा. आर्थिक व विदेश नीतियों को केवल एक व्यक्ति के पूर्वाग्रहों और झुकावों के अनुसार कार्यान्वित किया गया. इसका परिणाम गंवा दिए गए अवसरों के रूप में सामने आया और विकास दर इतनी कम हो गई कि इस दिन तक भारत के 30 करोड़ से ज्यादा नागरिक हर रोज भूखे पेट सोते हैं. यह आवश्यक रूप से कहना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अभी तक किए गए नीतिगत उपाय अर्थव्यवस्था व शिक्षा के क्षेत्र के बजाय विदेश नीति के क्षेत्र में सबसे नवीनतम रहे हैं. इसके अतिरिक्त, संसदीय चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पार्टी को मिलने वाले स्पष्ट बहुमत ने यह संकेत दिया कि लोगों की मानसिकता और उनकी सोच में एक लाभदायक परिवर्तन हुआ है. अगर भाजपा अपनी गलतियों को दोहराती भी रही और परिणामस्वरूप 2019 में लोकसभा बहुमत गंवा देती है तब भी नरेंद्र मोदी द्वारा लाए गए बदलाव अपरिवर्तनीय हैं. लेकिन अगर नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के लिए दूसरा कार्यकाल जीतने में समर्थ रहते हैं तब उनकी नीतियों व बदलावों की व्यापकता और कार्यान्वन की गति अधिक तेज होगी. क्रांतिकारी परिवर्तन का यही भय देशभर के राजनीतिज्ञों को उनका ध्यान केवल एक व्यक्ति (प्रधानमंत्री) पर केंद्रित करने के लिए प्रेरित कर रहा है. 
 
अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी और कुछ हद तक नीतीश कुमार जिस क्रूरता के साथ सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी की निंदा कर रहे हैं, उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. उन्हें एहसास है कि 2019 के आम चुनावों में मोदी के समर्थकों और उनके विरोधियों के बीच की सीधी टक्कर होगी. केजरीवाल और राहुल गांधी प्रधानमंत्री व उनकी पार्टी के लिए नकारात्मक भावनाएं रखने वाले मतदाताओं को आकर्षित करके खुद को उनका सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक विकल्प साबित करने में लगे हुए हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस प्रकार कुछ संवेदनशील व्यक्ति इस प्रचलन से असहज महसूस कर सकते हैं, हकीकत यह है कि भारतीय राजनीति में अपशब्दों का उपयोग एक आम प्रचलन बनता हुआ दिखाई दे रहा है. सार्वजनिक रिकॉर्ड को देखते हुए यह कहना आवश्यक है कि भाजपा भी इस मौखिक युद्ध में पीछे   नहीं है और उसकी दिशा में छोड़े गए हर अपशब्द के बाण का उसी भाषा में माकूल जवाब दे रही है. हालांकि, यह बात और है कि विपक्षी दल कोे सत्तारूढ़ दल की तुलना में लोगों की कम सहानुभूति मिलती है. 
 
भले ही प्रधानमंत्री के राजनीतिक प्रतिद्वंदी उन पर ‘कुछ खास’ न करने के आरोप लगा रहे हों, वह भी जानते हैं कि सच्चाई इस के सर्वथा विपरीत है. प्रधानमंत्री के अथक प्रयासों के कारण कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल असहज महसूस करने लगे हैं और वे जानते हैं कि अगर नरेंद्र मोदी 2019 में पुन: सत्ता में आ गए तो 2024 में तीसरे कार्यकाल की संभावनाएं बहुत प्रबल बन जाएंगी. इसलिए, विपक्षी दल प्रधानमंत्री को 2019 से पहले ही कमजोर व प्रभावहीन बनाने के हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल शायद भारत को नेहरूवादी सर्वसम्मति से कोसों दूर ले जा सकता है. भारतीय प्रधानमंत्री को विरोधी नेतओं के निंदापूर्ण कटाक्षों के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में इनकी संख्या बढ़ती ही जाएगी. नरेंद्र मोदी की टीम में जो लोग दावा कर रहे हैं कि मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के साथ सुलह-सहयोग का युग संभव है, वह पूरी तरह से गलत हैं. जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने रहेंगे, वह चारों ओर से राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से घिरे रहेंगे.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)