इतिहास कई बार यादगार लम्हों का संग्रहालय सा प्रतीत होता है. लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काबुल से दिल्ली तक के सफर के बीच में उनके पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ के साथ लाहौर में आकस्मिक भेंट करने जैसे शानदार लम्हे बहुत कम हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस अप्रत्याशित निर्णय ने भारतीय राजनीतिक हलकों में जैसे एक खलबली मचा दी है क्योंकि दोनों देशों के संबंधों के बीच पिछले कु छ महीनों से पूर्ण ठहराव आ गया था. इसके अतिरिक्त नरेंद्र मोदी जैसे दक्षिणपंथी नेता से चिर-प्रतिद्वंदी पड़ोसी राष्ट्र के राज्यप्रमुख के साथ ऐसे व्यक्तिगत मिलनसार व्यवहार की आशा बहुत कम लोगों ने की थी. चूंकि, यह भेंट अनपेक्षित थी, पूरी दुनिया और उपमहाद्वीप में इसका प्रभाव असाधारण रूप से सटीक था. 
 
यह एक ऐसा राजनयिक सहसाघात था, जिसके लिए दोनों पक्षों की ओर से साहस, कल्पना और कौशल के प्रदर्शन की आवश्यकता होती है. अगर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अनिश्चितता की स्थिति में होते तो वह कभी भी टेलीफोन पर भारतीय प्रधानमंत्री को निमंत्रण नहीं देते और अगर प्रधानमंत्री मोदी संकोची होते तो वह कभी भी इस न्योते को स्वीकार न करते. भारत-पाकिस्तान संबंधों की अशांत कथा में एक नया अध्याय केवल एक लेखक द्वारा नहीं लिखा जा सकता. एक अध्याय को आगे बढ़ाने के लिए दोनों लेखकों का एक ही पृष्ठ पर होना आवश्यक है. इस आकस्मिक भेंट का एक परिणाम तत्काल ही सामने आ गया. मुझे यकीन है कि दोनों नेताओं को जनता का समर्थन मिलने पर पूरा भरोसा था, लेकिन हर तरफ से मिल रही जबर्दस्त सकारात्मक प्रतिक्रियाओं की कल्पना तो खुद मोदी और नवाज शरीफ ने भी नहीं की होगी. यह दोनों देशों के लोगों में संस्कृति और नातेदारी के संबंधों की पुनर्खोज की उस गहरी तीव्र इच्छा को दर्शाता है जिसे पिछली सदी के संघर्षों ने उनके भाग्य से छीन लिया था. उपमहाद्वीप के लोग अब युद्ध से थक चुके हैं. शांति के अपार लाभों की समझ राजनीतिज्ञों से ज्यादा नागरिकों को है.
 
अफसोस की बात है कि शांति की इच्छा का अर्थ यह नहीं है कि आपको शांति मिल ही जाएगी. निसंदेह, युद्ध के संचालन की तुलना में शांति प्रकिया के प्रबंधन को अधिक एहतियात की आवश्यकता होती है, क्योंकि शांति क्षणभंगुर होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्चर्यजनक ढंग से कार्यालय में अपनी शुरुआत एक और परिवर्तनकारी क्षण द्वारा की थी, जब उन्होंने वर्ष 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क नेताओं को आमंत्रित किया था. उस क्षण को निहित स्वार्थों द्वारा दफन कर दिया गया था. आश्चर्य यह है कि इतने कम समय में एक बार फिर एक और शुरुआत संभव हो सकी है, क्योंकि भारत-पाक संबंध प्रगति के बजाय ठहराव अथवा प्रतिगमन के लिए जाने जाते हैं. इस रिश्ते को सताने वाली जटिल समस्याओं पर पारस्परिक रूप से स्वीकार्य अंतरिम समझ-बूझ का मार्ग खोजने के लिए समय, धैर्य और इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी. ऐसे संकेत हैं कि चरमपंथियों के एक गठबंधन ने अभी से नवाज शरीफ को पटरी से उतारने के लिए अभियान छेड़ दिया है. शरीफ इन जोखिमों से भली-भांति परिचित हैं, वह अतीत में इसका अनुभव कर चुके हैं. 
 
तब भी, हमें यह मान लेना चाहिए कि पाकिस्तानी सेना ने इस बार अपने रुख में कुछ नरमी दिखाई है. समान रूप से खुशी की बात यह है कि पाकिस्तान की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने सहयोगी दृष्टिकोण अपनाया है. दोनों प्रधानमंत्रियों की आकस्मिक भेंट को लेकर इमरान खान काफी उत्साहित हैं. हमारे देश के लोग प्रधानमंत्री के साथ हैं, लेकिन दुर्भाग्य से, दलगत राजनीति और राष्ट्रीय हित के बीच अंतर करने में असमर्थ कांग्रेस जैसी पार्टियां विचारहीन और अपरिपक्व आलोचना में शामिल हो रही हैं. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उनके कुछ नेताओं की टिप्पणियां पूरी तरह से बचकाना हैं. इस बचकाना व्यवहार की तुलना मार्क्सवादी व कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा दिखाई गई परिपक्वता के साथ कीजिए. दोनों पार्टियों ने प्रधानमंत्री की इस पहल का स्वागत किया है जो उपमहाद्वीप को परमाणु संकट क्षेत्र के भीतर चल रहे संघर्ष के विषाक्त दलदल से बाहर उठाने का अवसर प्रदान करती है. 
 
ऐसे क्षण जादूगर की टोपी या ज्योतिषी की कुंडली से निकल कर सामने नहीं आते. भले ही नरेंद्र मोदी के इस आकस्मिक निर्णय ने सबको चौंका दिया हो लेकिन हकीकत यह है कि इस भेंट की नींव जुलाई में ऊफा में दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात के दौरान रख दी गई थी और 30 नवंबर को पेरिस में यह नींव और अधिक मजबूत हुई. इस आधार कार्य के प्रारंभिक परिणाम सबसे पहले तब दिखाई दिए जब दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैंकाक में मुलाकात हुई. इस प्रक्रिया के दूसरे चरण में 8 और 9 दिसंबर को भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस्लामाबाद में नवाज शरीफ के साथ मुलाकात की. लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्वाचित राजनीतिज्ञ जनता की भावनाओं को अच्छी तरह से समझते हैं. यही महत्वपूर्ण गुण उनकी सबसे बड़ी ताकत है जो उन्हें अन्य नेताओं से सर्वथा भिन्न बनाती है. वे पर्यावरण के पोषण की जरूरत को भी समझते हैं. भारत-पाकिस्तान वार्ता में एक गंभीर बाधा ये रही है कि कट्टरपंथी नफरत की आग   को भड़का कर सार्वजनिक संवाद को नियंत्रित करने में सफल रहे हैं. लाहौर की खुशमिजाजी ने प्रभावी ढंग से माहौल बदल दिया है.  हम आशा कर सकते हैं कि अगले वर्ष पाकिस्तान में आयोजित होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी की भागीदारी में यह प्रकिया पराकष्ठा पर पहुंचेगी. जब हम दुष्चक्र में फंसे हों, तब हमें क्या करना चाहिए? इस शाश्वत प्रश्न पर पारंपरिक प्रतिक्रिया होगी कि इस चक्र को तोड़ दीजिए, लेकिन सूफियों का नजरिया कुछ अलग था. एक बड़ा चक्र बनाइए और आपको तिकड़मबाजी करने के लिए कहीं न कहीं जगह मिल ही जाएगी. सार्क शिखर सम्मेलन ही यह बड़ा चक्र है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)