अगर एक कद्दावर राजनीतिज्ञ को जेल की सलाखों के पीछे कुछ समय गुजारना पड़ जाए तो उसकी राजनीतिक महानता पर सवाल उठना लाजिमी है. जेल और राजनीति के बीच का सहजीवन समकालीन नायकों का निर्माण करता है. ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो जेलों और न्यायालयों ने इन्क्यूबेटर मशीन की ऐसी भूमिका अदा की है जो भविष्य में राजनीतिक लोकप्रियता व ऊंचाइयां छूने के लिए नवोदित नेताओं का पालन-पोषण करती हैं. पिछले सप्ताह के अंत में, राष्ट्रीय राजनीतिक संभाषण इस प्रश्न पर केंद्रित रहा कि सोनिया और राहुल गांधी के लिए उनके नेतृत्व को मजबूत करने और कांग्रेस के लगातार सिकुड़ते जनाधार में वृद्धि करने के लिए जमानत के बजाय जेल बेहतर विकल्प साबित होगी कि नहीं. सोनिया और राहुल गांधी ने अदालत के समक्ष पेश होकर और जमानत की अर्जी देकर राजनीतिक पवित्रता की दिशा में छोटे व अपरिपक्व कदम बढ़ाए हैं.यह दोनों ऐसे खानदान से नाता रखते हैं जिसके सदस्यों ने राष्ट्रीय नेता बनने से पहले कारागार में लंबा अथवा छोटा समय बिताया है.इस प्रवृत्ति की शुरुआत मोतीलाल नेहरू के साथ हुई और इसका अंत इंदिरा गांधी के साथ हुआ.यह राजीव गांधी ही थे जो विवादास्पद बोफोर्स कांड के बावजूद जेल में प्रवेश करने का राजनीतिक अवसर प्राप्त नहीं कर पाए और इसके बजाय अपने राजनीतिक भाग्य का फैसला मतदाताओं के हाथों में छोड़ दिया.
 
विरोधाभास यह है कि महात्मा गांधी ने कांग्रेस और स्वतंत्रता के कुलपति के रूप में कारावास में दिन बिताए थे और उनके जहन में राष्ट्रीय हित के अलावा दूसरा कोई विचार ही नहीं था, जबकि गांधी परिवार के जेल में बिताए गए समय का राष्ट्रहित व सार्वजनिक कारणों के साथ कुछ लेना देना नहीं है.इस बार इन दोनों ने अदालत में महज उपस्थिति मात्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पलटवार करने के लिए राजनीतिक अवसर में बदल दिया है.भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने पांच अन्यों के साथ सोनिया और राहुल गांधी पर अब बंद हो चुके नेशनल हेराल्ड अखबार की संपत्तियों को अवैध रूप से हथियाने का आरोप लगाया था.स्थानीय अदालत ने इन आरोपों के खिलाफ कानूनी रूप से बहस करने के लिए मां व पुत्र को अदालत में हाजिर होने का आदेश दिया.चूंकि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी अदालत द्वारा मां-पुत्र को एकसाथ हाजिर होने का आदेश दिया गया है, कांग्रेस ने इस मौके को इन दोनों को नरेंद्र मोदी की ‘प्रतिशोध की राजनीति’ के पीड़ितों के रूप में प्रस्तुत करने के सुनहरे अवसर के रूप में देखा.
 
कांग्रेस की रणनीति भारतीय नेताओं व अन्य लोकतांत्रिक समाज के सदियों पुराने आचरण के साथ पूरी तरह से मेल खाती है.सोनिया और राहुल के लिए यह गांधियों द्वारा लड़ी गई राजनीतिक लड़ाइयों के इतिहास से एक पन्ना उठाने का एक कृत्य भर था.इंदिरा गांधी ने खुद को राज्य की ताकत के समक्ष न झुकने वाली एक लोकवादी नायिका के रूप में पुनर्स्थापित करने के लिए मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार की दंडात्मक कार्रवाई को एक राजनीतिक अवसर में बदल डाला.जनता पार्टी सरकार द्वारा इंदिरा गांधी को राजनीतिक भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार करने के महज एक दिन बाद, 4 अक्टूबर 1977 को, अदालत ने उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया.उनकी साहसी संतान संजय गांधी ने युवा कांग्रेस के अपने समर्थकों के साथ लाठीचार्ज का सामना किया.यह उनकी ‘जेल भरो’ रणनीति ही थी जो उनके परिवार को 30 माह के भीतर सत्ता में वापस लेकर आई.आज भी कई राष्ट्रीय स्तर के नेताओं व केंद्रीय मंत्रियों ने संयोगवश अथवा पूर्वनियोजित तरीके से जेल जाकर मौजूदा ऊंचा नैतिक दर्जा हासिल किया है.अगर लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल और करुणानिधि आज लोकप्रिय नेता हैं तो इसके पीछे कारावास में उनके द्वारा बिताया गया समय भी आंशिक रूप से जिम्मेदार है.
 
जेल और राजनीति के बीच का प्रेम-प्रसंग अन्य देशों में भी कई नेताओं को सत्ता में लाने का सबसे प्रभावशाली तरीका रहा है.पाकिस्तान में नवाज शरीफ एकबार फिर प्रधानमंत्री बन पाए क्योंकि जनरल मुशर्रफ ने उन्हें देश से निकाल दिया था.बेनजीर भुट्टो की पार्टी भारी बहुमत से इसलिए जीत पाई क्योंकि उनके पिता जुल्फि कार अली भुट्टो को जनरल जिया उल हक द्वारा जेल में डाल दिया गया था और फांसी पर लटका दिया गया था.नेल्सन मंडेला को जेल से रिहा होने के बाद रंगभेद मुक्त दक्षिण अफ्रीका के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था.मंडेला ने जेल में 27 वर्ष बिताने के बाद भविष्यसूचक ढंग से कहा था ‘ऐसा कहा जाता है कि जब तक कोई जेल न गया हो तब तक वो व्यक्ति अपने राष्ट्र को सही ढंग से नहीं जान सकता.एक राष्ट्र को उसके द्वारा उसके उच्चतम नागरिकों के साथ किए गए व्यवहार से नहीं बल्कि निम्नतर नागरिकों के साथ किए बर्ताव के आधार पर आंका जाना चाहिए.’ चूंकि राजनीति को जनता की सेवा और अधिकारहीनों की रक्षा करने के रूप में कल्पित किया जाता है, राजनीतिज्ञ गरीबी और अपराधीकरण के बारे में जानने के लिए जेल को एक प्रभावी ठिकाने के रूप में पाते हैं.भारतीय राजनीतिक पार्टियां विभिन्न देशों के इतिहासों से शिक्षा लेते हुए अपने कार्यकर्ताओं को ऐसे मुद्दे और रणनीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित   कर रहे हैं जो आंदोलनों को भड़काएं और परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए उन्हें जेल में डाल दिया जाए.राज्य विधानसभा और संसद से नामांकन की मांग करने वाले कई उम्मीदवार उनके द्वारा जेल में बिताए गए समय का उल्लेख वास्तविक योग्यता के रूप में करते हैं.
 
लेकिन, गांधियों के लिए जेल जाना किसी कार्यालय अथवा पद को पाने की रणनीति नहीं है.राहुल व सोनिया गांधी लोकसभा सदस्य हैं और कांग्रेसी नेतृत्व में पहले व दूसरे स्थान पर प्रतिष्ठित हैं.अगर इन दोनों के दिमाग में जेल में कुछ समय बिताने का विचार कभी आता भी है तो ऐसा केवल इसलिए होगा क्योंकि वे एक तीर से दो शिकार करना चाहेंगे.अगर दोनों को अथवा एक को जमानत नहीं दी जाती तो नेशनल हेराल्ड मामले पर से लोगों का ध्यान बंट जाता और गांधी परिवार को मायूस पार्टी का सहारा मिलता.गांधी परिवार अपनी पार्टी के सदस्यों से आशा करता है कि वे अपने गुटीय मतभेदों को भूल जाएं और अपने मरणासन्न राजनीतिक उद्यम को बचाने के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रिय छवि को भी खराब करें. चूंकि अगला आम चुनाव 40 माह दूर है, गांधियों की रणनीति जल्द ही सामने आएगी.इसकी मूल रूप-रेखा आंदोलनात्मक राजनीति के इद-गिर्द घूमती है, जो राहुल को सलाखों के पीछे फोटो खिंचवाने के पर्याप्त अवसर प्रदान करेगी.जेल में ठहराव ही एकमात्र ऐसी पुरस्कृत योग्यता है जो राहुल के राजनीतिक बायोडाटा से नदारद है.कांग्रेस और खुद को सहारा देने के लिए वे प्रतीकात्मक हथकड़ी पहनने के लिए बेहद उत्सुक हो रहे हैं.   
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)