निर्भया गैंगरेप के नाबालिग आरोपी को रिहा करने के अदालती फैसले के बाद पूरे देश में कानून पर नई बहस छिड़ गई है. कोर्ट ने साफ तौर पर कह दिया कि कानूनों के दायरे के ऊपर कोई नहीं है और कानून उसकी रिहाई पर मुहर लगाता है. कोर्ट ने जो निर्णय दिया उस पर हायतौबा मचाने वालों को सोचना चाहिए कि कोर्ट के फैसले जज्बातों पर नहीं होते हैं. यह सच है कि निर्भया के साथ पूरे देश का सेंटिमेंट जुड़ा है पर इस मामले को लेकर जितनी राजनीति हो सकती है वह हो रही है. हमें मंथन जरूर करना चाहिए कि हम राजनीति में उलझें या वह रास्ता खोजें जिससे भविष्य में इस तरह की स्थिति का सामना न करना पड़ा.
 
सबसे बड़ी राजनीति लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद में हो रही है. जिस वक्त केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया था वह इस नाबालिग की रिहाई के पक्ष में बिल्कुल नहीं है. यहां तक कि केंद्र की तरफ से सॉलिसिटर जनरल ने भी सरकार की मंशा साफ कर दी थी. बावजूद इसके कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की. जबकि, हकीकत यह थी कि लोकसभा में सही समय पर जुवेनाइल जस्टिस अमेंडमेंट एक्ट पास हो चुका था. राज्यसभा में इसे पास कराया जाना था पर कांग्रेस ने अपने हुक्मरानों के बेवजह के मुद्दों पर राज्यसभा ही नहीं चलने दी. नतीजा यह हुआ कि राज्यसभा में यह एक्ट पास नहीं हो सका और कोर्ट ने मौजूदा कानून के तहत उस रेपिस्ट को आजाद करने का आदेश जारी किया, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. 
 
कांग्रेस की राजनीति के बीच बीजेपी ने भी एक राजनीतिक चाल चलने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. भले ही बीजेपी का कोई बड़ा नेता या मंत्री इस मुद्दे पर खुलकर सामने नहीं आया, पर एक ऐसी हवा चला दी गई कि दिल्ली सरकार आजाद होने वाले रेपिस्ट का स्वागत सत्कार करने वाली है. सोशल मीडिया के जरिए दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार पर एक ऐसा जोरदार हमला बोला जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. जबकि, सच्चाई यह है कि मौजूदा जुवेनाइल एक्ट कहता है कि संबंधित सरकार को किसी नाबालिग की रिहाई के बाद उसके रिहेबेटाइजेशन की व्यवस्था करनी पड़ती है. निर्भया गैंग रेप मामले में भी ऐसा ही हुआ. कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और दिल्ली सरकार को इस नाबालिग के पुनर्वास का आदेश दिया था, जिसके तहत दिल्ली सरकार ने उसे सिलाई मशीन और कुछ हजार रुपए देने की बात कही थी. 
 
हमें मंथन करना होगा कि इतने सेंसेटिव इश्यू पर हम राजनीतिक रोटी कब तक सेंकते रहेंगे. यहां बात सिर्फ निर्भया की ही नहीं है. हर दिन हमारे आसपास ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जिसमें हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते हैं. हर दिन हमारे देश में करीब 93 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं. ये आंकड़े कागजों में दर्ज हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि निर्भया केस के बाद भले ही देश में रेप के खिलाफ एक अलग तरह की मानसिकता ने जन्म लिया पर हकीकत यह है कि उसी रफ्तार से रेप के मामले भी आश्चर्यजनक तौर से सामने आए. 2012 में भारत में 24,923 मामले रजिस्टर किए गए वहीं, 2013 में इसकी संख्या बढ़कर 33,707 हो गई. इनमें से अधिकतर मामले टीन एज गर्ल्स के साथ घटित हुईं. जिस दिल्ली के लोगों ने निर्भया केस के दौरान आंदोलन का झंडा बुलंद किया था उसी दिल्ली को एनसीआरबी ने रेप केस के मामलों में सबसे अनसेफ घोषित कर रखा है. आपको जान कर हैरानी होगी कि दिल्ली में 2013 में 1441 मामले दर्ज हुए. अभी 2014-15 के आंकड़े आने बाकी हैं. अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति और भी चिंताजनक ही होगी. 
 
निर्भया का मामला इसलिए पूरे देश में चर्चा का केंद्र बन गया, क्योंकि इसने एक आंदोलन का रूप ले लिया था. नहीं तो हर दिन पूरे देश में इसी तरह के ब्रूटल केस सामने आते ही रहते हैं. राष्ट्रीय राजधानी में हुई इस वारदात ने एक जनआंदोलन का रूप ले लिया था. वही कहानी दोबारा दोहराई जा रही है. एक बार फिर से एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि निर्भया गैंग रेप से बड़ा गुनहगार कोई नहीं है. उस गुनहगार से किसी को हमदर्दी होनी भी नहीं चाहिए, पर यह सवाल भी लाजिमी है कि इस तरह के न जाने कितने गुनहगार हमारे और आपके बीच ही मौजूद हैं. क्यों नहीं हम निर्भया के बहाने इस बीमारी को जड़ से समाप्त करने का प्रयास करें. हमें एक ऐसी मानसिकता के खिलाफ जंग लड़ने को तैयार होना होगा, जिसमें ऐसी परिस्थितियों को सिरे से नकारा जा सके. सिर्फ हाथों में मोमबत्ती और मुंह पर काले कपड़े बांधकर, फेसबुक और व्हॉट्सएप पर अपनी डीपी चेंज कर हम निर्भया या उसकी जैसी हजारों लड़कियों को न्याय नहीं दिला सकते हैं. कोर्ट को अपना काम करने दीजिए. कोर्ट कोई भी फैसला सोच समझकर लेता है, न कि जज्बाती होकर. ऐसे में हमें बेवजह कानून पर ऊंगली उठाने से पहले अपने अंदर के मनुष्य को जगाना होगा. हर किसी को समाज में सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार है, हमारा लोकतंत्र भी ऐसा मानता है. ऐसे में अगर एक नाबालिग कोर्ट द्वारा छोड़ दिया जाता है तो बजाए इस पर राजनीति करने के हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)