भारतीय राजनीति में 30 वर्ष तक गठबंधन सरकारों के बाद भारतीय मतदाता पर्याप्त संख्या में एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द सम्मिलित हुए जो परिवर्तन का वायदा करते हुए लाखों-करोड़ों मतदाताओं के समर्थन की तीव्र लहर पर सवार होकर केंद्र में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में लेकर आया. नरेंद्र मोदी ने ‘एक नई सोच’ का वायदा किया, जो जवाहरलाल नेहरू व उनके उत्तराधिकारियों द्वारा विरासत में दी गई औपनिवेशिक शासन प्रणाली की बाध्यताओं को नष्ट कर देगी. इस प्रणाली में, अगर नागरिक कुछ भी महत्वपूर्ण प्राप्त करने का प्रयास करना चाहते हैं तो उन्हें निरपवाद रूप से सरकारी तंत्र की ‘पैनी निगाहों’ से होकर गुजरना ही होगा. भारत में कारोबार लगाना और करना, घर का निर्माण, स्कूल अथवा अस्पताल शुरू करना, ऐसी प्रत्येक गतिविधि को आधिकारिक रूप से उत्पन्न ‘अवरोधक क्रम’ से होकर गुजरना पड़ता है जो इस कदर कपटपूर्ण व पेचीदा होता है कि अधिकांश उद्यमी तो बीच में ही हौसला हार जाते हैं और कई उद्यमी निवेश के लिए विदेश की ओर कूच कर जाते हैं.
 
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा जारी रूढ़िवादी अनुमानों के मुताबिक, भारत से केवल पिछले 10 वर्ष के दौरान लगभग 500 अरब डॉलर अवैध धन विदेशों की ओर प्रवाहित हुआ है. किसी भी अत्यंत विनयिमत अर्थव्यवस्था में विकृतियों और मनमानी प्राथमिकताओं का मानदंड बने रहना जारी है और तब भी वाणिज्य एवं रोजमर्रा की गतिविधियों में और अधिक कानूनी एवं विनियामक परतों को संकलित किया जा रहा है .सर्वोच्च न्यायालय द्वारा काले धन के उन्मूलन के लिए आदेशित मई 2014 में स्थापित विशेष जांच दल द्वारा अनुशंसित दंडात्मक उपाय इसका नवीनतम उदाहरण है. इस अनवरत वर्तमान संस्था द्वारा अभी तक केवल 10 लाख डॉलर के अवैध प्रवाह को देश में वापस लाना तो दूर की बात, इसकी खोज-बीन भी नहीं की जा सकी है. एसआईटी केवल पहले से ही मौजूद नियमों के अंबार में और अधिक नियमों को शामिल करने का सुझाव देने में सफल रहा है, जिससे उन राजनीतिज्ञों और अधिकारियों को बेहद खुशी होगी जो उच्च-निवल महत्व वाले विशिष्ट नागरिकों को बर्बाद करने के लिए कठोर कानूनों का उपयोग करने में माहिर हैं. ठीक चीन की तरह, जहां शी जिनपिंग के ‘भ्रष्टाचार-विरोधी’ अभियान के परिणामस्वरूप गैर-कानूनी रूप से विदेशों में प्रवाहित होने वाले धन में कई गुणा वृद्धि आई है, भारत में भी विशेष जांच दल के प्रयासों से काले धन का वास्तविक सृजन नहीं बल्कि भारत में कर लगी वस्तुओं पर इसका व्यय प्रभावित हुआ है. ऐसे संदर्भ में जहां केवल भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ही ऐसा मानते हैं कि वास्तव में भारत में साधारण कारोबार करने को असंभव बनाने वाले कठोर विनियामक उपाय ही काले धन के उत्पादन को बढ़ाने के बजाय कम कर सकते हैं. राजनीतिक रूप से दोषपूर्ण व्यक्ति शायद ऐसा कहने का जोखिम उठा सकते हैं कि घरेलू बाजारों और नौकरियों का सृजन करने वाले व्यवसायों में काले धन के व्यय को कठिन बनाने के बजाय और अधिक सुगम बनाना चाहिए. कम से कम ऐसा करने से विदेशों में गैर-कानूनी रूप से प्रवाहित होने वाले धन पर रोक तो लगेगी जिसका इस्तेमाल विदेशों में रोजगार व धन सृजन के लिए किया जा रहा है.
 
प्रशासन की नेहरूवादी प्रणाली के तहत भारत में मौजूदा कानूनों, निषेधों और नियमों के भंवर के परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जहां नागरिक बिना सोचे-समझे अपने जीवन में रोजाना कोई न कोई कानून अथवा नियम तोड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति बन गई है जहां हर कानून और नियम की अनुपालना करते हुए किसी प्रकार का व्यापार या अन्य गतिविधि का संचालन करना लगभग असंभव बन गया है. बीते लोकसभा चुनाव के 18 माह बाद भारत अभी भी औपनिवेशिक युग के बाद ‘न्यूनतम सरकार’ के प्रारंभ होने की प्रतीक्षा कर रहा है जिसका वायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. केवल इस तरह का परिवर्तन ही दोहरे अंकों के स्तर तक विकास की गति सुनिश्चित कर सकता है ताकि तेजी से बढ़ती हुई बेरोजगारी और युवाओं के लिए निराशाजनक आर्थिक संभावनाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न सामाजिक अशांति को रोका जा सके. आज भारत को 21वीं सदी की आवश्यकताओं, संभावनाओं व प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करने वाले कम लेकिन बेहतर कानूनों की आवश्यकता है. ऐसे संदर्भ में जहां प्रौद्योगिकी गोपनीयता को और कठिन बना रही है, शासन में अधिक पारदर्शिता केवल वांछनीय ही नहीं बल्कि अपरिहार्य बन गई है.माइक्रोसॉफ्ट अथवा गूगल को चुनौती देने वाले ज्ञान-समूहों के निर्माण के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद के आधार पर जीवनशैली का अधिकार अत्यंत अनिवार्य है.यह कोई संयोग नहीं है कि 21वीं सदी की सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गुजरात अपने से कहीं अधिक आधुनिक बेंगलुरू या गुड़गांव से बहुत पीछे छूट गया है क्योंकि गुजरात की सरकार वयस्क नागरिकों को भी शराब व अन्य क्रीड़ाओं से दूर रखने के माध्यम से पापियों को संतों में परिवर्तित करने के लिए कानून की क्षमता में विश्वास रखती है. हालांकि गुजरात अभी भी 20वीं सदी के निर्माण में अन्य राज्यों से आगे है. तुच्छ व गैर-मामूली शिकायतों के आधार पर कानून व नियमों की भरमार को देखते हुए, भारत में खुली बातचीत का आयोजन स्वास्थ्य और स्वतंत्रता के लिए खतरनाक बन गया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण की अपुनस्थिति में ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे घरेलू प्रौद्योगिकी दिग्गज भारत में उभर सकें.
 
दोहरे अंकों की विकास दर के लिए भारत में तिहरे अंकों वाली स्वतंत्रताओं की जरूरत है. इस देश में सदियों से बहुमुखी व प्रतिभावान लोगों को ऐसी नियंत्रण प्रणाली की हथकड़ियों से जकड़ कर रखा गया है जिसका एकमात्र उद्देश्य उनसे किसी न किसी रूप में धन की उगाही करना है. हम देख रहे हैं कि किस प्रकार मनमोहन सिंह द्वारा सिलसिलेवार तरीके से प्रतिगामी कानूनों और दमनकारी नियमों को पारित कराए जाने के दौरान उनके समर्थन में खड़े कांग्रेसी नेतृत्व को आज नेहरूवादी तंत्र द्वारा पोषित उन्हीं कानूनों के इस्तेमाल के माध्यम से खुद पर अभियोग चलाए जाने का खतरा है. इससे पहले कि भारत उन देशों में शामिल हो जाए जहां अराजकता ही एकमात्र नियम बन जाए, नरेंद्र मोदी कृपया इस व्यवस्था को जल्द से जल्द नष्ट कर दें. शायद सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों के शीर्ष स्तरों पर आसीन नेताओं को एहसास न हो, लेकिन ऐसी भयावह स्थिति बहुत नजदीक है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)