कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर जिस इंदिरा गांधी की बहू होने की दुआई दी, उस इंदिरा गांधी की निडरता पर कतई पूरे राष्टÑ को संदेह नहीं है. इंदिरा गांधी ने अपने पूरे जीवनकाल में न किसी से भय खाया और न ही अनावश्यक रूप से भय दिखाया. यहां तक कि अदालत ने जब उन्हें हाजिर होने को कहा वह हाजिर हुर्इं. न्यायिक प्रक्रिया का सदा सम्मान किया. शायद यही कारण रहा है कि उनके व्यापक समर्थन में कभी कोई कमी नहीं आई. आपातकाल का दंश झेलने के बावजूद आज भी इंदिरा गांधी के संसदीय प्रक्रिया के प्रति समर्पण को पूरा राष्ट्र नमन करता है.
 
पर यह क्या? आज जो सोनिया गांधी खुद को इंदिरा गांधी की बहू कहकर नहीं डरने की बात कर रही हैं, वह खुद इतनी डरी हुई हैं कि कोर्ट के मामले को संसद में पहुंचा दिया है. हाल यह है कि पूरा शीतकालीन सत्र खत्म होने को है और संसद सिर्फ इसलिए नहीं चलने दी जा रही है क्योंकि कांग्रेस के दो दिग्गजों पर नेशनल हेराल्ड केस में कोर्ट की तलवार लटक रही है. कांग्रेस के दिग्गजों को इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के समय में लंबे वर्षों का अंतराल है. वह दौर 1975 का था जब मीडिया इतनी सुलभ नहीं थी. आज 2015 का वक्त है, जब पूरा राष्ट्र टीवी पर लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही लाइव देख रहा है. स्पीकर भले ही कई मामलों को रिकॉर्ड में शामिल नहीं करने की बात कह देते हैं, पर लाइव दिख रहे हंगामे को कौन ऑफ द रिकॉर्ड कर सकता है. जनता सबकुछ देख रही है. जिस संसद को एक दिन चलाने में जनता की कमाई के लाखों रुपए खर्च होते हैं, जिस संसद में पूरे देश का विकास छिपा है, जिस संसद की तरफ पूरा राष्ट्र एक उम्मीद की तरह देखता है, वही संसद एक ऐसे मामले को लेकर नहीं चलने दी जा रही है जो कोर्ट में लंबित है. 
 
यह लोकतंत्र का ऐसा मजाक है जिसका जवाब पूरा राष्ट्र मांग रहा है. संसद को ठप कर देने के पीछे कांग्रेस की भले ही कोई अलग मंशा हो, पर कांग्रेस के सहयोगी दल इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने कांग्रेस के इस राजनीतिक कदम का पुरजोर विरोध किया है. कई सहयोगी दलों ने खुद को इस विवाद से पूरी तरह अलग कर दिया है. इसे मामूली तौर पर नहीं लिया जा सकता है. संसदीय इतिहास में शायद यह पहली बार है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में खुलेआम न्यायिक प्रक्रिया को चुनौती दी गई है. खुलेआम कांग्रेसी दिग्गज इस बात को दोहरा रहे हैं कि नेशनल हेराल्ड मामला पीएमओ द्वारा संचालित हो रहा है. कभी कांग्रेस के मुखपत्र के रूप में प्रसिद्धि पाए नेशनल हेराल्ड अखबार ने भले ही ताउम्र लोकतंत्र का सम्मान किया, उसी अखबार को लेकर लोकतंत्र का ऐसा माखौल उड़ाया जा रहा है जिस पर पूरा देश अचंभित है. नेशनल हेराल्ड मामला कोर्ट के समक्ष है. ट्रायल कोर्ट द्वारा सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत तीन बड़े कांग्रेसी नेताओं को सम्मन भेजा है. सम्मन का आधार यह है कि ये पांचों लोग कंपनी के प्रमुख शेयर होल्डर्स हैं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया और उपाध्यक्ष राहुल इस कंपनी के 36-36 प्रतिशत के शेयरधारक हैं. यानि, कंपनी का कुल 76 प्रतिशत शेयर इन्हीं दोनों के पास है. ऊपरी अदालत में अपील करना हर एक भारतीय का अधिकार है. ऐसे में अगर ऊपरी अदालत से भी अपील खारिज हो जाए तो इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय का क्या रोल हो सकता है, यह समझ से परे है. हद तो इस बात को लेकर है कि अपील खारिज होने का खामियाजा संसद झेल रही है. गांधी परिवार के प्रति अपनी चापलूसीपूर्ण विश्वसनीयता दर्शाने के लिए कांग्रेसी सांसदों ने लोकसभा और राज्यसभा में जिस तरह हंगामा किया उसे पूरा देश लाइव देख रहा था. 
 
राजनीति में विरोध जायज है. बिना इसके कोई भी सरकार निरंकुश हो सकती है पर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में विरोध की यह राजनीति आज से पहले कभी नहीं देखी गई. कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी रही है. सत्ता का सबसे लंबा कार्यकाल भी इसी पार्टी के पास रहा है. ऐसे में इस पार्टी के दिग्गजों से एक व्यक्तिगत मामले को लेकर संसद ठप कर देने की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है. संसद में राष्ट्र के मुद्दों को लेकर बहस होती है. नीतियों पर चर्चा होती है. विकास की रूपरेखा पर वाद-विवाद होता है. यही स्वस्थ राजनीति की परिपाटी रही है. पर एक व्यक्तिगत मामले को लेकर पूरे राष्ट्र को अगर शर्मिंदा किया जाए तो इसे जनता कभी माफ नहीं करेगी. वैसे भी कांग्रेस की नीतियों के कारण पूरे देश में उसके जनाधार का क्या हर्ष है, यह किसी से छिपा नहीं है. कभी पूरे देश में एकछत्र राज करने वाली पार्टी के इतने बुरे दिनों की किसी ने कल्पना नहीं की थी. ऐसे में कांग्रेसी दिग्गजों को नए सिरे से सोचने की जरूरत है. क्या उनके लिए गांधी परिवार ही एक मात्र विकल्प है, जिनके व्यक्तिगत मामलों के लिए संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी जाए, या फिर नीतिगत विषयों पर वाद-विवाद और धरना-प्रदर्शन किया जाए.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)