हमारे राजनीतिक संवाद से विचित्रता का पुट उतना दूर नहीं है जितना कि हम सोचते हैं. हालांकि , ऐसे मौके आए हैं जब एक राजनीतिक दल का प्रतिरक्षा-अपराध संबंधी स्पष्टीकरण आवश्यकता से इतना अधिक खिंचा चला जाता है कि इसे अदालत की नहीं बल्कि केवल लोगों की अवमानना समझा जा सकता है. शनिवार की सुबह एक अंग्रेजी अखबार ने अपने मुख्य पृष्ठ पर असाधारण कहानी प्रकाशित की. इसमें दो दिग्गज कांग्रेसी नेताओं को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि चार दिनों तक संसद के दोनों सदनों के निरंतर व्यवधानों का इस तथ्य से कोई लेना-देना नहीं है कि अदालतों ने अब निष्क्रिय समाचार पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के कब्जे वाली संपत्तियों के महज 50 लाख रुपए की मामूली रकम में अधिग्रहण के लिए धन के कथित हेरफेर के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी के परीक्षण के लिए नोटिस भेजा है. गौरतलब है कि ‘नेशनल हेराल्ड’ की संपत्तियों की अनुमानित लागत तकरीबन 2 हजार करोड़ रुपए की है. दोनों दिग्गजों ने दावा किया कि सोनिया गांधी और राहुल ने अपने सांसदों को पुराने मुद्दों पर हो-हल्ला व सदन में व्यवधान उत्पन्न करने की अनुमति दी. 
 
मैं इन वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की दुर्दशा पर सहानुभूति के कारण उनके नामों का उल्लेख नहीं कर रहा. वास्तव में उन्हें संभवत: उनके अपने कथित शब्दों पर यकीन नहीं हो पा रहा है. वे तो बस आलाकमान के आदेशों पर बोल रहे थे. जैसा कि वे खुद और अन्य सभी जानते हैं कि ‘नेशनल हेराल्ड’ मामले में न्यायाधाीश द्वारा इस मामले को अभियोग योग्य समझने और प्रधान अभियुक्त को अदालत में हाजिर होने का बुलावा भेजने से पहले संसद में सब कुछ सुव्यवस्थित व अनुशासनात्मक ढंग से चल रहा था. वास्तव में राज्यसभा में नेपाल पर उत्कृष्ट तर्क-वितर्क हुआ था जिसने संसद को उसकी असल जिम्मेदारी का एहसास कराया. विपक्ष ने पूरे जोश के साथ तीखे प्रहार किए और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने न केवल विपक्ष के प्रत्येक प्रश्न का संतोषजनक उत्तर दिया बल्कि इस महत्वपूर्ण समस्या पर भारत की स्थिति के बारे में प्रचलित अटकलों पर भी पूर्णविराम लगा दिया. संसद केवल स्वस्थ तर्क-वितर्क  के लिए ही बनी है, अनावश्यक शोरगुल और निरंतर व तर्कहीन व्यवधानों के लिए नहीं. लोकतंत्र का सच्चा अभ्यास केवल तर्कसंगत वाद-विवाद द्वारा ही संभव है. कांग्रेस ने इस वाद-विवाद में भाग लिया. ‘नेशनल हेराल्ड: कांग्रेस ने चौथे दिन राज्यसभा भंग की’, गोवा के अखबारों में शनिवार सुबह मोटे अक्षरों में छपी सुर्खियों ने वो सब कुछ बयान कर दिया, जो किया जाना चाहिए था. जिस व्यक्ति ने बार-बार यह स्पष्ट किया था कि ‘नेशनल हेराल्ड’ मामला उसकी पार्टी की समस्या है, वह और कोई नहीं बल्कि राजग सरकार पर ‘100 फीसदी राजनीतिक प्रतिशोध’ का आरोप लगाने वाले राहुल गांधी खुद थे. स्वाभाविक है राहुल ने कभी भी यह समझाने की परेशानी मोल नहीं ली कि राजग सरकार उनसे राजनीतिक प्रतिशोध क्यों ले रही है, शायद इसलिए क्योंकि राहुल के पास समझाने के लिए कोई ठोस तर्क ही नहीं है. जैसा कि वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग के साथ संवाददाता सम्मेलन में भी ध्यान दिलाया कि सरकार ने इस मामले में किसी को भी किसी प्रकार का नोटिस नहीं भेजा है. यह अदालत है जिसने डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत को योग्य समझा और इस पर गौर करते हुए इस प्रकिया में कुछ तीखी टिप्पणियां की. गौर फरमाएं कि अदालतों ने डॉ. स्वामी की शिकायतों पर हमेशा एकसमान प्रभाव के साथ प्रतिक्रिया नहीं दी है. अदालतें हर मामले के साथ उसकी योग्यता के आधार पर निपटती हैं. राहुल का निरंतर रूप से अदालतों में पक्षपात होने का संकेत करना, न्यायिक प्रणाली की अखंडता को चुनौती देता है. 
 
कांग्रेस को समझना चाहिए था कि वह भ्रष्टाचार के इस सीधे आरोप पर सदन में अलग-थलग पड़ जाएगी. कांग्रेस के समर्थन में एक भी विपक्षी दल नहीं आया. यहां तक कि बिहार में कांग्रेस के सहयोगी दलों ने भी नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस से दूरी बनाए रखी. स्पष्ट अथवा कथित भ्रष्टाचार का बचाव करते हुए किसी को भी नहीं देखा जाएगा. राजनीतिक दल तब सफल होते हैं जब वे जनता की प्रतिक्रिया का सटीकता के साथ अंदाजा लगाने में समर्थ होते हैं. हर किसी को एहसास हो गया था कि जनता कांग्रेस के तर्कों पर विश्वास नहीं कर पा रही है. कांग्रेस को इस हकीकत का एहसास होने में समय लगा क्योंकि यह राजवंश के प्रति वफादारी में उलझी हुई है. किसी को नहीं मालूम कि सोमवार को संसद के पुन: प्रारंभ होने के साथ कांग्रेस का व्यवहार कैसा रहेगा. संभव है कि कांग्रेस के निष्ठावान सदस्य और पुराने मुद्दों पर संसद में व्यवधान उत्पन्न करने का हरसंभव प्रयास करेंगे, लेकिन राजनीति में वो समय कब का बीत चुका है जब राजनीतिज्ञों के शब्दों पर जनता आंखें मूंद कर यकीन कर लेती थी. जनता की राय की अदालत लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका है और कांग्रेस यहां आकर इस बहस को हार जाती है. मतदाता जानते हैं कि कांग्रेस ने गरीबों, अनुसूचित जातियों व जनजातियों को फायदा पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण विधेयकों को नाकाम करने का प्रयास किया है, क्योंकि उसने ऐसे मामले पर असमर्थनीय रुख अपनाया है जिसे   राजनीतिक वर्ग के नहीं बल्कि कानून प्रणाली के हाथों में छोड़ देना चाहिए.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)