राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते प्रदूषण स्तरों और तेजी से बढ़ते जहरीले वातावरण में पश्चिमी दूतावासों द्वारा संचालित स्कूलों में बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए उनके द्वारा उठाए जा रहे कदमों को लेकर काफी बातें हो रही हैं. यह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है कि लोग इस बात पर हैरान हैं कि ऐसा उस शहर में हो रहा है जो इतने लंबे समय से केंद्र सरकार की सत्ता का आसन रही है. जबकि पर्यावरणवादियों द्वारा समस्या का निदान किया जा रहा है और यह सलाह दी जा रही है कि बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को इस खतरे से आंशिक रूप से बचने के लिए घर के भीतर रहना चाहिए, नीति-निर्माताओं को समय रहते गहरी निद्रा से उठने और इस शहर को बचाने की जरूरत है. दुनिया देख रही है कि किस प्रकार चेन्नई को प्रकृति के कोप का शिकार बनना पड़ा है और नदी के तालों और नहरों सहित विभिन्न स्थानों पर निर्माण गतिविधियों की अनुमति देने वाली सिलसिलेवार सरकारों के लालच और लापरवाही के कारण लोगों के कष्ट और बढ़ गए हैं. इसका परिणाम यह निकला है कि पूरा शहर एक समुद्री टापू में तब्दील हो गया दिखाई पड़ता है. शुक्र है कि इस संकट की घड़ी में चेन्नई में कोई लूटपाट अथवा कानून-व्यवस्था संबंधी समस्या नहीं आई है. ऐसा संभवत: इसलिए है कि यह अभी एक महानगरीय केंद्र के रूप में विकसित होने के प्रारंभिक चरणों में है. खुदा न करे कि अगर दिल्ली पर ऐसी आपदा की मार पड़ी होती तो हालात कुछ और ही होते. 
 
हालांकि दिल्ली को अनूठी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और वहां जो कुछ भी हो रहा है, उस के लिए राजनीतिज्ञों के साथ-साथ नौकरशाहों को प्रत्यक्ष रूप से दोष देना चाहिए. राजधानी की जनसंख्या में खतरनाक दर से वृद्धि हो रही है. इसके निवासियों में प्रतिवर्ष 5 लाख की वृद्धि के अतिरिक्त शहर में देशभर से आए अप्रवासियों की संख्या भी समान रूप से बढ़ रही है जिसमें उत्तर प्रदेश और बिहार से आए अप्रवासियों की संख्या सबसे अधिक है. वर्तमान और प्रत्याशित बुनियादी ढांचा इतने लोगों का बोझ सहन करने में असमर्थ हैं. अप्रवासियों की भरमार का परिणाम यह है कि राजधानी के मूल निवासियों को अनियंत्रित अप्रवास का बोझ सहन करना पड़ रहा है. चूंकि राजधानी में लोगों के प्रवेश की जांच करने व शहर में भीड़ को कम करने का खाका खींचने का साहस किसी में नहीं है, दिल्ली सरकार अथवा केंद्र द्वारा उठाया गया प्रत्येक कदम अपर्याप्त सिद्ध होता है. अतीत में कई योजनाएं बनाई गई हैं लेकिन कुछ भी उपयोगी साबित नहीं हुआ है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड का अस्तित्व केवल कागजों तक ही सीमित है और यह व्यावहारिक रूप से कोई उद्देश्य प्राप्त करने में पूरी तरह विफल रहा है. राजनीतिज्ञों का कहना है कि वे इस शहर में आने से किसी को रोक नहीं सकते क्योंकि इस देश का कोई भी नागरिक उसकी इच्छा से कहीं भी जा सकता है. जी हां, आप सही कहते हैं क्योंकि देश का संविधान भी यही सत्यापित करता है. लेकिन उन लोगों का क्या जो पहले से शहर में रह रहे हैं? क्या उनके पास कोई अधिकार नहीं है या फिर वे दिल्ली में प्रदूषण अथवा भीड़-भाड़ से मुक्त वातावरण में रहने के हकदार नहीं हैं? समय आ गया है कि नागरिकों के पक्ष में किसी न किसी को तो खड़ा होना ही होगा. राष्ट्रीय राजधानी अप्रवासियों के और अधिक प्रवाह के बोझ को अब सहन नहीं कर सकती, ऐसा प्रतीत होता है कि यह शहर लोगों की भीड़ के दबाव से कूट-कूट कर भरा हुआ है. इस से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अगर दिल्ली की आबादी में खतरनाक रूप से बढ़ोतरी न होती तो आज हालात इस कदर चिंताजनक न होते. गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद और नोएडा के समीपस्थ नगरों ने राजधानी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. इन नगरों का बुनियादी ढांचा भी अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है और लोग अभी से अनियमित विद्युत आपूर्ति और पानी की अपर्याप्त सप्लाई की शिकायत करने लगे हैं. इस के अलावा बढ़ते हुए ट्रैफिक, प्रदूषण के उच्च स्तरों और बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था की समस्याएं भी हैं. किसी न किसी को तो मौजूदा हालातों के लिए जिम्मेदारी लेनी ही होगी. 
 
नौकरशाही असमंजसता की ऐसी स्थिति में ही पनपती है. अधिकार की बहुलता अन्य किसी और की तुलना में बाबुओं के लिए अधिक उपयुक्त है. वे लगातार उन्नति कर रहे हैं और शहरी प्रशासन में अपने कार्यकर्ताओं के लिए पदों की संख्या बढ़ाकर अपने ऊंचे दर्जे को सुरक्षित कर लिया है. शहर में तीन नगर निगम हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि निगम आयुक्तों की संख्या भी तीन है, जिनके मातहतों को असहाय नागरिकों के लिए क्षेत्राधिकार के मुद्दों को उठाने में बेहद आनंद की अनुभूति होती है. दिल्ली पुलिस के अधिकांश अधिकारियों के पास न के बराबर काम है लेकिन सभी विशेषाधिकारों व भत्तों के पात्र हैं. दिल्ली सरकार के बाबुओं के पास अपनी लाचारी और बेबसी दिखाने के अलावा और कोई काम नहीं है और हर बात के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहराना उनकी आदत बन गई है. उनके मुताबिक दिल्ली से संबंधित हर मामले पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा ही लिया जाता है. दिल्ली विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार का गढ़ है जिसे यह भी नहीं पता कि उसके पास कितनी भूमि है और अपनी स्थापना के समय से आज   तक यह कितने फ्लैटों का निर्माण कर चुकी है. दिल्ली राज्य औद्योगिक विकास निगम, दिल्ली पर्यटन एवं दिल्ली नागरिक आपूर्ति निगम जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने अपने मूल उद्देश्यों को त्याग दिया है, लेकिन अपने राजस्व को बढ़ाने के लिए शराब की बिक्री करने में लगे हुए हैं. दिल्ली की सड़कों पर वाहन चलाना किसी बुरे सपने की तरह है. निर्माणाधीन मेट्रो परियोजनओं और सड़कों पर वाहनों की अनगिनत संख्या ने चालन समय में कई गुणा वृद्धि कर दी है. स्वाभाविक है जब सड़कों पर अधिक वाहन अधिक समय तक चलेंगे तो वातावरण में उत्सर्जन स्तरों में भी बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी.कटु हकीकत यह है कि राष्ट्रीय राजधानी आवास के अयोग्य बनती जा रही है. जब तक केंद्र सरकार सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर शहर को बचाने के लिए आमसहमति तक नहीं पहुंचती, तब तक गंभीर मुद्दों से किसी प्रकार की राहत मिलती दिखाई नहीं देती.
 
(ये लेखक के निजी विचार है.)