चूंकि भारत के निर्वाचन आयोग में केवल सेवानिवृत्त या सेवारत अधिकारियों को निवृत्त किया जाता है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि चुनाव आयोग चाहेगा कि भारत में चुनावी संघर्षों में वृद्धाश्रम का जोश-खरोश देखने को मिले. हर कुछ वर्षों में, चुनावी चक्र के दौरान सरकारी तंत्र के अधिकांश हिस्से के निष्क्रिय होने की मूर्खता को पूरा देश देखता है क्योंकि चुनाव आयोग द्वारा आदेश दिया जाता है कि उस अवधि के दौरान ‘नीतिगत पहलों’ की घोषणा नहीं की जानी चाहिए अन्यथा वे मतदाताओं को प्रभावित कर सकती हैं. चुनाव आयोग के ऐसे अप्रजातंत्रवादी आदेश द्वारा जिस अवधि में सरकार के पास सामाजिक रूप से वांछनीय नीतियों के साथ आने का सबसे उपयुक्त अवसर होता है, उस समय में ऐसे उपाय बिलकुल नदारद रहते हैं. काश अर्थशास्त्रियों अथवा शैक्षणिक समुदायों द्वारा चुनावी अवधि के दौरान नीतिगत पहलों में उत्पन्न अभाव के कारण अर्थव्यवस्था को पहुंची हानि के विश्वसनीय आंकड़ों को जनता के सामने लाया जा सकता.
 
हर चुनाव में एक ‘आदर्श आचार संहिता’ लागू होती है जो प्रत्येक चुनाव लड़ने वाले प्रतियोगी को यह ढोंग करने का आदेश देती है जैसे उसके चुनावी प्रतिद्वंदी कोई संत हैं, और इसलिए ऐसे संकोचक शब्दाडंबर के अनाधिकारी हैं जो अधिक परिपक्व लोकतंत्रों में ऐसी प्रतिद्वंदिताओं का मुख्य भाग है. काश औपनिवेशिक संस्कृति द्वारा प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा ऐसी प्रतियोगिताओं को पूरी तरह से निर्देशित करने के बजाय चुनाव आयोग में ऐसे लोगों को समाविष्ट किया जाता जिन्होंने वास्तव में चुनावी जटिलताओं का अनुभव किया हो. आपराधिक मानहानि से संबंधित लोकतंत्र-विरोधी कानूनों के अतिरिक्त ‘भड़काऊ भाषणों’ की शिकायतों के प्रति कानून एवं व्यवस्था तंत्र की प्रचंड प्रतिक्रिया के कारण एक नागरिक के लिए ऐसे शाब्दिक हमलों में प्रवेश करना बेहद जोखिमपूर्ण है जिन्हें अमेरिका में प्रतिदिन देखा जाता है. उदाहरण के लिए, अगर डोनाल्ड ट्रंप भारत के नागरिक होते तो अब तक उन्हें किसी कानून अथवा अभिव्यक्ति की सीमित की गई स्वतंत्रता के अंतर्गत जेल में डाल दिया गया होता. अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी के भारत के प्रति नर्म रुख के पीछे संभवत: यही कारण है.
 
एक ऐसी व्यवस्था में जहां ‘इंसाफ में विलंब यानि इंसाफ से वंचित’ एक मूल आदर्श वाक्य होना चाहिए, अभी तक इंसाफ प्रदान करने वाली प्रक्रिया में होने वाले विलंबों के कारण होने वाले आर्थिक अथवा मानवीय नुकसान की गणना करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है. न केवल अदालत में लंबित मामलों के व्यापक वर्णक्रम में स्थगन आदेशों (स्टे आर्डर) की प्रचुरता होती है, बल्कि अदालतों ने भी सभी प्रकार के मामलों पर विचार करने और प्रत्येक मामले को पर्याप्त समय समर्पित करने की इच्छा दिखाई है. आशा करते हैं कि एक विधिवेत्ता के रूप में उत्कृष्ट छवि वाले जस्टिस टीएस ठाकुर अपने कार्यकाल के दौरान न्यायिक स्थगनों और न्यायिक अपीलों को सीमित किए जाने के लिए आवश्यक कदम उठाना सुनिश्चित करेंगे. जाहिर है कि वर्तमान राजनीति में आज कई स्वयंभू संतों व योगियों द्वारा ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जो गटर में भी विशेष रूप से बदबूदार प्रतीत होगी. विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनिंदा राजनीतिज्ञों की तरह वे भी वर्षों से शालीनता का ऐसा अपवित्रीकरण करते आ रहे हैं. उदारवादी होने का दावा करने वालों का हमेशा से यह प्रयास रहा है कि जिन लोगों के विचार नेहरूवादी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं, उनके साथ किसी भी प्रकार के मौखिक या अन्य संपर्क को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए. आज भारत के कुछ राजनीतिक दल व राजनीतिज्ञ इस कदर तुच्छ राजनीति पर उतर आए हैं कि वे यह सिद्ध करने पर तुले हुए हैं कि आज का भारत हिटलर के शासनकाल वाले नाजी जर्मनी की हूबहू नकल है, और यह कि अबू बक्र बगदादी के कट्टरपंथी अनुयायियों की तुलना में हिंदू समुदाय अंतर्राष्ट्रीय भाषा के लिए कहीं अधिक बड़े खतरे का प्रतिनिधित्व करता है.
 
ऐसी अवधारणा को झूठा सिद्ध करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम को संशोधित करने के साथ-साथ देश के इतिहास संबंधी तथ्यों की गोपनीयता को समाप्त करने के माध्यम से सरकार की कार्यशैली में अधिक पारदर्शिता लाई जाए. यूपीए सरकार के प्रतिगामी और गुप्त मार्ग का अनुसरण करने के बजाय एनडीए सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित प्रतिबंधों से छुटकारा पाने की आवश्यकता है. यह उन लोगों के लिए श्रेष्ठ प्रतिक्रिया होगी जो समाज, अर्थशास्त्र और राजनीति पर ‘नेहरूवादी आमसहमति’  को अस्वीकार करने वालों के प्रति नफरत की संस्कृति में पले-बढ़े हैं. यह स्तंभकार उदारवादी मूल्यों के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता में भी विश्वास करता है. इस देश के प्रत्येक नागरिक को उसके विचारों की अभिव्यक्ति करने का पूरा अधिकार है. उम्मीद करते हैं कि आने वाले महीनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति प्रगतिशील के बजाय प्रतिगामी दृष्टिकोण अपनाने वाले टिप्पणीकार आखिरकार इस विचार को स्वीकार कर लेंगे कि आम सहमति के किसी भी रूप का विरोध करने वालों की निंदा करने के बजाय उन्हें भी उनके विचारों को अभिव्यक्त करने का पूरा अधिकार है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)