13 नवंबर की रात को पेरिस को बर्बाद करने वाला पैशाचिक आतंकी हमला मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए नृशंस आतंकी हमले से काफी हद तक मेल खाता है. दोनों दृष्टांतों में, निर्दोष नागरिकों की जान लेने के लिए प्रतिबद्ध आतंकवादियों के छोटे से समूह ने भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों व मनोरंजन केंद्रों को अपने नापाक इरादों का निशाना बनाया और शहर की सड़कों पर आतंक फैलाते हुए सैंकड़ों नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया. 
लेकिन उपर्युक्त आतंकी हमलों की समानता यहीं समाप्त होती है और क्रमभंग और अधिक विस्तृत हो जाता है. घरेलू आतंकी अड्डों, पड़ोसी देश बेल्जियम में छुपे हुए आतंकवादियों और सीरिया के अधिकेंद्र का घेराव करते हुए पेरिस हमलों का प्रतिकार भौगालिक पहुंच के मामले में तीव्र, तत्पर, घातक और व्यापक था. एक सप्ताह बाद, पेरिस हमलों के मास्टरमाइंड को पेरिस के उपनगरीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर चल रहे सर्च ऑपरेशन में पुलिस द्वारा मार गिराया गया और इस प्रकार षड्यंत्रकारियों को एक मजबूत संदेश दिया कि उनकी क्रूर धूर्तता का प्रत्युत्तर घातक शक्ति द्वारा दिया जाएगा. 
 
पेरिस की तीव्र व तत्पर घातक प्रतिक्रिया के विपरीत, मुंबई हमलों का जवाब अनिश्चितता की स्थिति में अटका हुआ है और उत्कृष्ट अयोग्यता का संग्रह है. सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बीच रसद संबंधी तकरार के परिणामस्वरूप कमांडो घटनास्थल पर पूरे 12 घंटे बाद आए. मुंबई हमलों के 7 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमलों के मास्टरमाइंड जकीउर रहमान लखवी को पाकिस्तान की सड़कों पर सरेआम भारत-विरोधी भाषण देते हुए देखा जा सकता है. भारत के क्रोध के प्रारंभिक विस्फोट के बाद भारत की ओर से अगर कुछ देखने को मिला तो वो था दृढ़ विश्वास और शक्ति के अभाव का प्रदर्शन करने वाला आधे-अधूरे व उत्साहहीन मन से किया गया पड़ोसी राष्ट्र का विरोध. पेरिस हमलों के बाद, भारतीय अखबारों के स्तंभलेखों में अभिव्यक्त की जाने वाली झुंझलाहट हिंसा के इन दो तुलनीय कृत्यों द्वारा उत्पन्न अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के बिलकुल विपरीत है. जबकि पेरिस हमले ने सार्वभौमिक सहमति से तत्काल प्रतिशोध को मंजूरी दी, मुंबई हमले को संयम बरतने के अपरिहार्य आह्वानों का सामना करना पड़ा. मगर, संयम के लिए इस कदाचित असमर्थनीय और अनुचित तर्क का विवेचन शून्य में नहीं किया जा सकता. इसकी तुलना हमारी दोषपूर्ण मानसिकता के साथ करनी होगी, अनुमोदन की मांग का प्रयास करने वाला ऐसा रवैया जो कई वर्षों की औपनिवेशी गुलामी से उत्पन्न हुई है और जो अपने स्वंय के आत्महित और प्रतिबद्धता की कीमत पर बाहरी अनुमानों को अनुचित और आवर्धित विश्वसनीयता प्रदान करते हैं. शेक्सपीयर का हवाला देते हुए ‘प्रिय ब्रूटस, गलती हमारे सितारों में नहीं है, गलती तो हमारी खुद की है जो हम किसी की गुलामी कर रहे हैं.’ 
 
फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने आतंकवादियों के खिलाफ शक्तिशाली व कड़ा हमला करने की घोषणा करने से पहले दुनिया भर के राजनेताओं की राय की प्रतीक्षा नहीं की. उनकी यह कार्रवाई अपने देश की रक्षा करने के लिए गैर-पराक्रम्य अनुबंध से प्रेरित एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश था. इस में बाहरी राय की नगण्य व अप्रसांगिक भूमिका थी. फ्रांस ने शेष विश्व को यह अटल संदेश दिया है कि फ्रांस अपनी सुरक्षा का स्वामी खुद है और उसे इसका बचाव करने के लिए बाहरी सहयोग की आवश्यकता नहीं है. भारत इससे सबक सीख सकता है. अमेरिका सहित अन्य देशों की राय हमारे कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं लेकिन केवल कुछ सीमा तक. अंतिम विश्लेषण में केवल हम अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं. जब तक हम पश्चिमी राय का अनुपालन करते जाएंगे, तब तक हम पाकिस्तानी प्रेरित आतंकवादियों का शिकार बनते रहेंगे. इस अनुग्रहभाजित आचरण को मनोविकारी संदेह द्वारा और जटिल बनाया जा रहा है जो निर्णायक कार्रवाई का नामुमकिन बनाता है. यह हमारी एक और राष्ट्रीय चूक है जो हमारी निष्क्रिय आतंक-विरोधी रणनीति का प्रमुख कारण है. इसके अलावा, दुनिया भर के राजनेताओं की राय समय के साथ बदलती रहती है. अगर हमने मुंबई हमलों के तुरंत बाद पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों पर बमबारी की होती तो संयम का आह्वान करने वाले यही नेता एकजुट होकर हमारी निर्णायक कार्रवाई की उन्मुक्त कंठ से प्रशंसा करते. दासतापूर्ण विनीतता और संदेह हमारी विफलता को और मजबूत करने वाले दोहरे लक्षण हैं. हमारे राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त विकृत वैचारिक कथा एक और ऐसी बाधा है जो घरेलू सांप्रदायिक हिंसा को भड़का कर इन नृशंस कृत्यों के लिए समर्थन की मांग करती है, और राजनीतिक बढ़त प्राप्त करने के लिए सांप्रदायिक हिंसा को भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ छद्म युद्ध के रूप में चित्रित करती है. इस दुर्भावनापूर्ण और सहजज्ञान विरोधी घबराहट को रोकना ही होगा. हमारे सुरक्षा कर्मियों की वीरता को नीचा दिखाए बिना, हमें अपने परिणामों को बेहतर बनाने के लिए अपनी सैन्य क्षमता और खुफिया तंत्र का गहराई से पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है. 
 
कंधार विमान अपहरण और मुंबई हमलों ने हमारे सुरक्षा कवच में चूकों का खुलासा कर दिया. कंधार में भारतीय   सरकार के आत्मसमर्पण को रणनीतिक पलायन के रूप में युक्तिसंगत बनाया जा सकता था अगर अनुवर्ती गुप्त खुफिया ऑपरेशन में विमान अपहरण के षड्यंत्रकारियों को मार गिराया गया होता. लेकिन ऐसा कभी हुआ ही नहीं. आतंकवाद के खिलाफ हमारा युद्ध अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते नहीं लड़खड़ाता. यह मुख्य रूप से राजनीतिक और बौद्धिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण लड़खड़ाता है जिसकी जड़ें संभ्रमित मानसिकता में निहित हैं.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)