13 नवंबर की शाम को पेरिस के केंद्र में आईएस के श्रृंखलाबद्ध आतंकी हमलों से नागरिकों की बड़े पैमाने पर हत्या को फ्रांस के राष्ट्रपति द्वारा उचित रीति से ‘युद्ध का कृत्य’ के रूप में वर्णित किया गया है, और यह था भी बिलकुल ऐसा ही. एक ऐसे असंयमित युद्ध की शुरुआत जिसमें एक शक्तिशाली राष्ट्र को सामाजिक-आर्थिक विनाश के माध्यम से नीचे लाने के लिए अपनी जान तक गंवा देने के लिए तैयार किए गए आतंकवादियों का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया जाएगा. भिड़ंत का यह नया रूप एक दशक से चले आ रहे ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ का परिणाम है जो वास्तव में 9/11 हमलों के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों और अमेरिकी अगुआई वाले पश्चिम जगत के बीच की लड़ाई थी. 
 
पाकिस्तान के ऐबटाबाद में अमेरिकी सेना के खुफिया ऑपरेशन में ओसामा बिन लादेन को मार गिराए जाने के बाद अपनी जीत की घोषणा करने ही वाला था कि जेहाद को और आगे ले जाने के लिए कट्टरपंथियों का नया नेतृत्व उभर कर सामने आया. इराक-सीरिया क्षेत्र में अबू बक्र अल बगदादी ने आईएस का नेतृत्व किया और अफगान-पाकिस्तान क्षेत्र में अल जवाहिरी ने अलकायदा की कमान अपने हाथों में ले ली. उल्लेखनीय ढंग से कट्टरपंथियों का यह नया नेतृत्व उन दो देशों (इराक-अफगानिस्तान) में उभर कर सामने आया जिन्हें आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी अगुआई वाले गठबंधन राष्ट्रों द्वारा मुख्य रूप से निशाना बना गया था. पेरिस नरसंहार सिर्फ एक और एकल आतंकी हमला नहीं है बल्कि यह उस नए संघर्ष का संकेतक है जो वैश्विक आयाम हासिल कर सकता है. पेरिस हमलों की योजना, हमलावरों के लिए आत्मघाती हथियार प्रदान करना, विशेष रूप से तैयार की गई आत्मघाती जैकेटें तैयार करना और स्वचलित राइफलों की तस्करी इत्यादि इस बात का ठोस प्रमाण हैं कि इस्लामी कट्टरपंथी अपने नापाक इरादों को बेहद गोपनीय तरीकों से अंजाम देने में सफल रहे हैं और इराक-सीरिया में चल रहे संघर्ष की जड़ें अब धीरे-धीरे यूरोप में भी फैल रही हैं. 
 
इस्लामी कट्टरपंथी इस्लामी दुनिया के गौण-तत्व नहीं बल्कि भौगोलिक सीमाओं के पार फैले मुस्लिम समाज की मुख्यधारा का हिस्सा हैं. वे उस राजनीतिक-ऐतिहासिक विरासत को संभाले हुए हैं जो उन्हें शिक्षित करती है कि किस प्रकार 19वीं सदी के प्रमुख उलेमा ने अलजीरिया, अरब और भारत में इस्लामी भूमि पर पश्चिमी अतिक्रमण को हटाने के लिए जेहाद की शुरुआत की थी. उन्होंने इस्लाम के प्रारंभिक समय में वापस लौटने को आवश्यक बताया था और यह आज तक सभी कट्टरपंथियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है. आईएस और अलकायदा क्रमश: खलीफा और वहाबी आक्रामकता की ऐतिहासिक स्मृति को आगे बढ़ाते हैं. चरमपंथियों द्वारा शियाओं को प्रमुख शत्रु समझने का कारण खलीफा अली के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह में निहित है, जिसमें सुन्नी इस्लाम का जन्म हुआ था. इस सब से पता चलता है कि इस्लामी चरमपंथियों के खतरे को कम करके आंका गया था. यह भी चिंता का विषय है कि अन्य मुस्लिम वर्गों के नेता चरमपंथियों से अलग होने को तैयार हैं लेकिन उनकी निंदा नहीं करना चाहते. आईएस और अलकायदा ने पश्चिम के खिलाफ आतंकवादी हमले को प्रायोजित किया और इनके समर्थकों को उनके अनुचरों व उनसे हमदर्दी जताने वालों से पर्याप्त धन मिलता है. पैसे का गुप्त हस्तांतरण हो रहा है और जेहाद की इस लड़ाई का अफ्रीका, पश्चिमी एशिया और यूरोप में फैल जाना इसलिए संभव हो सका है क्योंकि चरमपंथियों द्वारा धर्म के नाम पर अशिक्षित व बेरोजगार युवकों के साथ सुशिक्षित युवाओं को भी इस धर्मयुद्ध में शामिल होने के लिए उकसाया जा रहा है.
 
भारत ने अपनी सामरिक संस्कृति को ध्यान में रखते हुए उचित रूप से धर्म पर आधारित उग्रवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है. पेरिस नरसंहार पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अग्रणी होने की भारत की इच्छा को दोहराया है. प्रधानमंत्री ने सटीकता के साथ यह भी कहा कि सभी आतंकवादी समूह एकसमान होते हैं और उनमें किसी प्रकार का फर्क नहीं किया जाना चाहिए. ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ का संचालन और धर्म पर आधारित आतंकवाद की निरंतरता सिद्ध करते हैं कि उग्रवादी ‘अच्छे’ या ‘बुरे’ नहीं होते, उनका मकसद सिर्फ निर्दोष नागरिकों की जान लेना और धर्म की आड़ में उनके नृशंस कृत्यों को अंजाम देना है. बेहतर होगा कि समय रहते ही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से यह घोषणा की जाए कि राजनीति में धर्म का हस्तक्षेप और धर्म में हिंसा के प्रवेश का हरगिज स्वीकार नहीं किया जाएगा. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ पर दोहरी नीति थी, देश में मुस्लिम जगत के नरमपंथियों को कट्टरपंथी उग्रवादियों के खिलाफ खड़ा करना और लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को शीघ्रता से निपटाने के लिए धन का संचय करना. पाकिस्तान इस दृष्टिकोण की विफलता का घोतक है क्योंकि धर्म के उपयोग ने उग्रपंथियों के खिलाफ नरमपंथियों को शांत कर दिया और सैन्य तानशाही को समर्थन के परिणामस्वरूप उस रणनीति के दूसरे पहलू का निष्फल होना तय था. आशा करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जी-20   शिखर सम्मेलन को दिया गया नुस्खा इस बढ़ते हुए नए खतरे के खिलाफ इस दुनिया को अर्थपूर्ण ढंग से एकजुट कर पाएगा.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)