भारत-पाकिस्तान क्रिकेट के बीच बढ़ते गतिरोध का एक ही विवेकपूर्ण समाधान है. इस खेल को इतना उबाऊ बना दें कि इस खेल से खेलप्रेमियों का मन ही भर जाए. हॉकी के रूप में हमारे पास इसकी जीती-जागती मिसाल है. कई दशकों पहले, ऐसा समय भी था जब ओलंपिक अथवा एशियाई हॉकी पदक के लिए आपस में भिड़ रही भारत-पाकिस्तान हॉकी टीमों का मैच देखने के लिए स्टेडियमों में दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी. लेकिन दोनों टीमें जब शीर्ष स्थान के बजाय अंक तालिका में सबसे निम्नतर स्थान के लिए खेलने लगी, तो दोनों देशों के हॉकी प्रेमियों का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. आज, जब क्रिकेट पर वाद-विवाद फिर से पूरे रंग में है और सोशल मीडिया समाज-विरोधी टिप्पणियों से भरी पड़ी है, भारत और पाकिस्तान हॉकी का मैच खेलते हैं तो इस पर कोई बात तक करने को तैयार नहीं. लेकिन जहां भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का उल्लेख हो तो समझिए हंगामा मचना तय है. 
 
इसका अर्थ यह हुआ समस्या खेल के साथ नहीं अपितु प्रतिक्रिया के साथ है. दिलचस्पी खत्म कर दीजिए और विवाद स्वत: खत्म हो जाते हैं. समस्या यह है कि भारत और पाकिस्तान के पास ऐसी क्रिकेट टीमें हैं जो उबाऊ क्रिकेट खेलना जानती ही नहीं. दोनों टीमें किसी भी दिन किसी भी विपक्षी टीम को हरा सकती हैं. स्वाभाविक है कि दोनों में कोई भी देश निरंतरता के साथ प्रदर्शन नहीं करता. हमारा घातक आकर्षण हमारी अप्रत्याशिता है. अप्रत्याशिता तनाव को जन्म देती है और राष्ट्रीय धैर्य के लिए तनाव कोई अच्छी बात नहीं है. भारत-पाक टेस्ट श्रृंखला में बाधा उत्पन्न करने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों के बारे में सोचिए और शोक मनाइए. कुछ पाकिस्तानी खिलाड़ियों के बुरे बर्ताव के लिए ‘टाईम-आऊट’ सहित आप केवल दो घंटों में हॉकी मैच को निपटा सकते हैं. क्रिकेट टैस्ट मैच पांच दिन तक चल सकता है. अगर श्रृंखला भारत में खेली जाए तो हमारे पिच क्यूरेटर यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे कि टेस्ट मैच 3 दिन में ही निपट जाए. लेकिन भारत-पाकिस्तान का मैच जब होता है तो 18 घंटों का खेल भी दर्शकों की सांसे थामने में भली-भांति सक्षम रहता है, एक-एक गेंद, एक-एक रन के साथ दर्शकों की कौतूहलता बढ़ती ही जाती है. 
 
वास्तव में, इन समस्याओं में सबसे न्यूनतम समस्या शायद शांतिपूर्ण नागरिकों के बीच भावनाओं का प्रबंधन है. पाकिस्तान अपने ही देश में नहीं खेल सकता क्योंकि खिलाड़ियों की सुरक्षा की गारंटी देने के लिए कोई तैयार नहीं है. पाकिस्तान के घरेलू मैदान को अब गर्मी में झुलसते हुए संयुक्त अरब अमीरात में पहुंचा दिया गया है. पाकिस्तान अपने सभी घरेलू अंतर्राष्ट्रीय मैच अबूधाबी स्टेडियम में ही खेलता है. लेकिन आप क्या सोचते हैं कि जो आतंकवादी पाकिस्तान में क्रिकेट के खेल को असंभव बनाते हैं, वो दुनिया में अन्यत्र कहीं भारत-पाक मैच के दौरान चुपचाप बैठे रहेंगे? अगर आतंकवादियों द्वारा भारत-पाक क्रिकेट मैच को दुनिया में और कहीं भी निशाना बनाया जाता है तो ऐसी सूरत में हम क्या करेंगे? हाल ही में दोनों देशों के बीच इंग्लैंड में श्रृंखला आयोजित करने की बातें हो रही थी. मैं सोच रहा हूं कि क्या इंग्लैंड की सुरक्षा एजेंसियां दो तटस्थ देशों के क्रिकेट मैच के लिए चाक चौकस सुरक्षा बंदोबस्त करने में दिलचस्पी दिखाएंगी? किसी भी कोने में देखिए और आप एक हमला करने के लिए घात लगाकर बैठी अकल्पित समस्या को पाएंगे.
 
उदाहरण के लिए, मुझे बांग्लादेश में आयोजित पिछले विश्व टी-20 टूर्नामेंट से पहले प्रसारित टीवी विज्ञापनों के बारे में याद दिलाया गया है. दर्शकों को आकर्षित करने के लिए और मुनाफे में वृद्धि करने के लिए निर्मित उत्तेजना, आधुनिक क्रिकेट की सबसे विघटनकारी वास्तविकताओं में से एक है. उस टूर्नामेंट से पहले भारतीय टीवी पर प्रसारित किए जाने वाले कई विज्ञापन भड़काऊ, आक्रामक, बेस्वाद और कौमपरस्त थे. उन भड़काऊ विज्ञापनों ने असंख्य क्रिकेट प्रेमियों को भारत का विरोधी बना दिया. उन विज्ञापनों से हुई क्षति के दुष्परिणामों को अभी भी महसूस किया जा सकता है. भारतीय क्रिकेट के कथित संरक्षक, बीसीसीआई, ने तब इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और भविष्य में भी उसके ऐसे ही रवैये की उम्मीद है. बीसीसीआई को केवल करारे नोटों से भरे खजानों की परवाह है. चलिए ऐतिहासिक दृष्टि से सदा विवादों में घिरे अंपायरिंग के विषय की ओर मुड़ते हैं. भारत अभी भी इस आधार पर तकनीक के उपयोग से परहेज करता है कि अगर मैदान पर गलती होनी है तो उसे मानवीय चूक तक सीमित रहने देना चाहिए. यह पूर्व कप्तान एमएस धोनी की विरासत का एक अंश है. हमारा क्रिकेट चलाने वाले विद्वान इस सरल सी बात को क्यों नहीं समझते कि लोग मशीन को तो माफ कर देंगे लेकिन इंसान को नहीं. आप मशीन को रिश्वत नहीं खिला सकते. मैं यहां अंपायरों के चरित्र व नैतिकता पर सवाल नहीं उठा रहा. वे खुद गहन जांच के अधीनस्थ हैं. लेकिन संदेह और अटकलों की तथ्यों में कोई दिलचस्पी नहीं होती. अगर हम कभी भी पाकिस्तान के साथ भविष्य में क्रिकेट श्रृंखला खेलते हैं तो शेष टीमों की ही तरह इन दोनों टीमों को भी संदिग्ध निर्णयों का भाग्य टीवी अंपायर और तकनीक के हाथों में छोड़ देना चाहिए. 
 
चाहे उबाऊ हो अथवा मनोरंजक, मुझे क्रिकेट से बेहद लगाव है. इंग्लिश प्रीमियर लीग फुटबॉल के साथ क्रिकेट प्रेम ही मेरे टेलीविजन सेट खरीदने का प्रेरणास्रोत है. किसी भी क्रिकेट प्रेमी के लिए भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला से अधिक रोमांचकारी कुछ नहीं हो सकता. लेकिन, अगर क्रिकेट एक उत्सव नहीं हो सकता तो क्या इसके लिए जोखिम उठाना समझदारी है? खेल युद्ध का विकल्प नहीं है. यह उच्च्तम स्तर पर अत्यंत प्रतिभाशाली पुरुषों व महिलाओं द्वारा खेले जाने वाली उत्कृष्ट प्रदर्शन कला है. खेल में प्रतिद्वंदिता होती है और खेल का रोमांच बढ़ाने के लिए यह आवश्यक भी है. लेकिन कोई भी समझदार खिलाड़ी प्रतिद्वंदिता को द्वेषपूर्ण शत्रुता के गर्त में नहीं धकेलना चाहता. यह खेल के बुनियादी सिद्धांतों का पतन है. अगर हम जो कुछ देख रहे हैं उसका आनंद नहीं उठा रहे तो वो खेल नहीं है.   क्या इन सर्दियों में भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला होनी चाहिए? मैं उन लोगों के साथ सहानुभूति प्रकट करता हूं जिन्हें इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)