26 जुलाई 2005 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बारिश की तबाही के जिस मंजर ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया था ठीक वही स्थिति आज चेन्नई में है. दो महानगर की इस त्रासदी ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि विकास और विनाश के बीच एक पतली सी दीवार है जिसे समय रहते अगर मजबूती नहीं दी गई तो सिर्फ तारीखें बदलेंगी और कुछ नहीं. यह विभीषिका हमें हर साल एक ऐसा दर्द दे जाएगी जिसकी टीस सदियों तक महसूस होगी. साल दर साल हम विकास की ऊंचाईयों को छू रहे हैं, पर क्या सिर्फ यही काफी है. यह मंथन का वक्त है. 
 
साल 2013 के जून माह में जब उत्तराखंड में बारिश ने तांडव मचाया था उसे पूरे विश्व ने लाइव देखा था. लाखों यात्री चारधाम की यात्रा पर निकले थे पर भारी बारिश के बाद आए सैलाब ने सबकुछ बदल कर रख दिया. इस सैलाब ने उत्तराखंड का नक्शा ही बदल डाला. कई गांव, कस्बों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया. पहाड़ों में दूर-दूर तक सड़कों का नामो निशान मिट गया. एक वक्त में पर्यटकों से गुलजार रहने वाले बाजार और सड़कों पर नदियां अपनी प्रचंड वेग से बहती दिखने लगीं. यह सब कुछ अनायास ही नहीं था. सिर्फ कहने को हम कह सकते हैं कि यह प्राकृतिक आपदा थी जो अचानक आई और सबकुछ अपने में समेट कर निकल गई. पर सच्चाई यह है कि इस प्राकृतिक आपदा की नींव हमने ने ही रखी थी. विकास और प्रगति के नाम पर इसकी नींव रखी गई थी. नदियों के रास्तों को रोककर, उसकी धाराओं को बदलकर हमने विकास का एक ऐसा ढांचा तैयार कर दिया था जिसकी परिणति विनाश के रूप में सामने आनी ही थी. परिणाम इस रूप में सामने आएगा इसके बारे में किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. हजारों लोग मारे गए, लाखों लोग बेघर हो गए. इतिहास मिटता गया और नया इतिहास बनता गया.
 
कुछ ऐसा ही देखने को मिला था वर्ष 2014 में. धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में जब बाढ़ ने प्रलय मचाया था तो कई दिनों तक लोग समझ ही नहीं सके थे कि ऐसा हमने क्या कर दिया कि आज इस हाल में हैं. अब आफत से जूझ रहे हैं तमिलनाडू के लोग. तमिलनाडू के बड़े हिस्से में बाढ़ का प्रकोप है. लाखों लोग जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं. बैंक अकाउंट में लाखों करोड़ों रुपए रहते हुए भी एक अदद रोटी के लिए घरों की छतों पर टकटकी लगाए बैठे हैं. तथ्यों की बात करें तो फिलहाल जो रिजल्ट सामने आया है उसके अनुसार चेन्नई में बाढ़ का सबसे अधिक प्रकोप इसलिए सामने आया क्योंकि वहां का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल हो गया. औसत से ज्यादा बारिश क्या हुई पूरा शहर चोक हो गया. शहर की छोटी-बड़ी नालियों ने काम करना बंद कर दिया. जो पानी शहर में जमा हो रहा था उसे निकलने के लिए कोई रास्ता ही नहीं मिला. मंथन करने की जरूरत है आखिर ऐसा क्यों हुआ? शहरीकरण की दौर में हम अपनी बेसिक जरूरतों को तो पूरा कर रहे हैं, पर इन जरूरतों को पूरा करते हम क्या खोते जा रहे हैं इसपर कोई सोचने को तैयार नहीं है. मुंबई में आई बाढ़ के लिए भी शहर के ड्रेनेज सिस्टम को ही सबसे बड़ा जिम्मेदार माना गया था. पर बात सिर्फ मुंबई या चेन्नई की नहीं है. आज सभी शहर इस समस्या से दो-चार हैं. हां यह बात अलग है कि अबतक दूसरे शहरों ने इतना भीषण जलप्रलय नहीं देखा है. हो सकता है यह इंतजार ज्यादा दूर नहीं हो. फिर हम क्या करें, सिर्फ आने वाली विभिषिका का इंतजार करते रहें, या फिर कुछ मंथन करें.
 
शहरों में नालियों पर अवैध कब्जे. इन नालियों में जमा कचरा. समय-समय पर इन नालियों और ड्रेनेज सिस्टम का प्रॉपर मानिटरिंग नहीं होने से भी हमने बहुत कुछ ऐसा इंतजाम कर दिया है कि हम कभी भी मुंबई और चेन्नई जैसी त्रासदी को आमंत्रित कर सकें. अब सवाल उठता है कि इसके लिए हम किसको दोष दें. सिर्फ जबर्दस्त बारिश, प्राकृतिक आपदा या सरकार की कमियों का रोना रोने से ही हालात नहीं बदल जाएंगे. हमें आगे आना होगा. सरकार का काम सिर्फ एक सिस्टम को डेवलप करना है. हमें उस सिस्टम को आगे बढ़ाना है. भारत सरकार ने भले ही पूरे भारतवर्ष में स्मार्ट सिटी की परिकल्पना में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है. विदशों से थोक के भाव में इंवेस्टर्स भी आने लगे हैं. अरबों रुपए की लागत से हम स्मार्ट सिटी की परिकल्पना को साकार भी कर लेंगे. पर शहरों में व्याप्त बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को हम सुधार सकेंगे, यह भी सबसे बड़ा सवाल है. 
 
हाल ही में पेरिस में जलवायू परिवर्तन पर सबसे बड़ा सम्मेलन हुआ है. सभी देशों के प्रतिनिधियों ने पूरे विश्व को आगाह किया है कि अगर हम अभी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगा. पर चेन्नई में आए जलप्रलय ने स्पष्ट कर दिया है कि सच में बहुत देर हो चुका है. असमान्य रूप से हुई बारिश इसी जलवायू परिवर्तन का ही हिस्सा है. हमें इस बात पर भी मंथन करना होगा कि प्रकृति के इस असमान्य व्यवहार को हम किस तरह रोक सकते हैं. अगर अभी से छोटे-छोटे प्रयास शुरू कर दिए जाएं तो हो सकता है आने वाली पीढ़ी हमें धन्यवाद दें. अगर ऐसा नहीं कर पाए तो यकीन मानिए सिर्फ तारीखें बदलेंगी, साल बदलेंगे, हम यूं ही त्रासदियों पर आंसू बहाते रहेंगे.