संविधान का अभिनंदन करने के लिए संसद में होनी वाली चर्चा, धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा और भारतीय संदर्भ में इसकी व्याख्या को लेकर सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक तक सीमित रह गई. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष को धर्मनिरपेक्षता को विकृत न करने के लिए कहकर, और संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे शब्दों को शामिल करने को अनावश्यक बताकर जैसे आफत ही मोल ले ली. गृहमंत्री ने कहा कि ‘बीआर अंबेडकर ने कभी भी इन दोनों शब्दों को प्रस्तावना में शामिल करने के बारे में नहीं सोचा था क्योंकि यह दोनों शब्द संविधान का हिस्सा थे. यह भारतीय व्यवस्था में अंतर्निहित है.’ 
 
राजनाथ सिंह वास्तव में एक व्यापक राजनीतिक तर्क दे रहे थे कि देश की बहुसंख्यक आबादी के बड़े हिस्से के पास लचीला और सहिष्णु रवैया है. उनके इस तर्क से संघ परिवार में उनके सहयोगी भी काफी हद तक सहमत हैं. यही कारण था कि हिंदुओं ने अन्य धर्मों के प्रति अधिक से अधिक स्वीकार्यता का प्रदर्शन किया था. इसलिए, इस देश में विभिन्न धर्मों का सहवर्ती होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी और ऐसा हिंदू धर्म के समग्र उदार दृष्टिकोण के कारण ही संभव था. 
 
धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा हर देश में अलग-अलग है और भारत में राज्य सभी धार्मिक सिद्धांतों और व्यवहारों को पनपने की अनुमति देता है, हालांकि यह मांग उठती रही है कि सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए जिसे कुछ धर्मों के विश्वासों के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जाता है. पश्चिमी दुनिया और विकसित समाज में धार्मिक संस्थाओं और राज्य के बीच एक कठोर विभाजन है और कानून के समक्ष हर नागरिक के साथ समान व्यवहार किया जाता है. लेकिन भारत में ऐसे राजनीतिक दल हैं जो अपनी संभावनाओं में वृद्धि लाने के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हैं और इस प्रक्रिया में कई बार हमारी राजनीति को विभाजनकारी बनाने में योगदान देते हैं. इंडियन यूनियन मुस्लिग लीग, शिरोमणि अकाली दल और भारत के उत्तरपूर्वी भागों में कुछ पार्टियां उन संगठनों में से हैं जो चुनावों में अपनी जीत की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए जाहिर तौर पर धर्म का इस्तेमाल करती हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रतिद्वंदी दल भी अक्सर उस पर महत्वपूर्ण समय में हिंदूत्व के एजेंडे का इस्तेमाल करने का आरोप लगाते रहे हैं, जबकि कांग्रेस पर अक्सर उसकी स्थिति मजबूत करने के लिए अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है.
 
2014 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की शर्मनाक हार के पीछ कारणों में से एक कारण उसका अल्पसंख्यकों के प्रति अनुमानित झुकाव था. इस तथ्य को हार के कारणों की जांच कर रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ऐके एंटनी ने भी स्वीकार किया था. यूपीए के शासनकाल के 10 वर्ष से पहले कांग्रेस पार्टी विभिन्न समुदायों में अच्छा संतुलन बना कर रखती थी, लेकिन 2004-14 के बीच यह संतुलन बिगड़ गया था जिसने इस धारणा को जन्म दिया कि कांग्रेस प्रबल हिंदू समुदाय की अनदेखी कर रही है और अल्पसंख्यकों को महत्वपूर्ण पदों का तोहफा दे रही है.  इसलिए, यह बिलकुल साफ है कि देश की राजनीति में धर्म एक प्रबल भूमिका निभाता है और 1991 के बाद विशेष रूप से जात-पात भी राजनीतिक क्षेत्र के घटनाक्रमों को निर्धारित करने में प्रमुख कारक की भूमिका अदा करती है. इसके अतिरिक्त, ऐसे क्षेत्रीय दल भी हैं जो राष्ट्रीय दलों का मुकाबला करने के लिए लोगों की भाषाई व क्षेत्रीय भावनाओं का फायदा उठाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति कांग्रेसवाद-विरोध में है और कुछ की अध्यक्षता पूर्व कांग्रेसी नेताओं द्वारा की जा रही है जिन्होंने अपना राजनीतिक भविष्य बनाने के लिए स्थानीय आकांक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करने वाले संगठनों की शुरुआत की. अपने सबसे निराशाजनक दौर से गुजरने के बावजूद कांग्रेस देश की एकमात्र ऐसी राजनीतिक पार्टी है जिसकी देश के कोने-कोने में उपस्थिति है. हालांकि भाजपा सत्तारूढ़ दल है, लेकिन इसका देश के दक्षिणी और पूर्वी भागों में पैठ बनाना बाकी है.
 
संसद में वाद-विवाद पर वापस आते हुए, ऐसी धारणा बनाई जा रही है कि हमारे संविधान को अंतिम रूप देने के लिए अंबेडकर अकेले जिम्मेदार थे. डॉ. अंबेडकर एक बेहद प्रतिष्ठित और प्रख्यात कानून के विद्वान थे जिन्होंने 284 सदस्यीय संविधान सभा की अध्यक्षता की. भारतीय संविधान अत: एक ऐसा दस्तावेज था जिसे कई उत्कृष्ट नागरिकों के सामूहिक प्रयास के माध्यम से प्रस्तुत किया गया. डॉ.अबेडकर ने दूसरों के सुझावों को समायोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बेहतर होता अगर संविधान का अभिनंदन करने के लिए संसद का संयुक्त सत्र का आयोजन किया जाता ताकि विभिन्न संस्थाओं के कामकाज में इसके महत्व पर प्रकाश डाला जा सके. दोनों सदनों में अलग-अलग विचार-विमर्श करके संविधान पर से ध्यान किसी तरह हट गया है और राजनीतिक दलों की राजनीति और एजेंडे पर अधिक केंद्रित हो गया है.
 
अंत में, जब हम धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो एक कटु सत्य है कि जिसे हर किसी को जरूर स्वीकार करना चाहिए. भारत धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश इसलिए है क्योंकि यह हिंदू बहुल देश है. हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि हमें एक-दूसरे के लिए हमारे बहुलवाद और सहिष्णुता को त्याग देना चाहिए. भारतीय लोग उनके कई आपसी मतभेदों के बावजूद हजारो वर्षों से एकसाथ रह रहे हैं. समय आ गया है कि हम अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित करें.