सत्ता अपने साथ एक महान जिम्मेदारी लेकर आती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिज्ञ होने के उलझावों के प्रति समय रहते ही सतर्क हो गए हैं और उन्हें यह अहसास हो गया है कि वह शासन की बागडोर किसी अन्य के हाथ में नहीं छोड़ सकते. गत सप्ताह, इस रूखे भगवा सुल्तान ने पिछले कुछ सत्रों में पटरी से उतर चुकी संसदीय राजनीति को प्रभावित करने के लिए वार्तालाप के साधन का चतुर इस्तेमाल किया.18 माह में ऐसा पहली बार हुआ है जब उन्होंने अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को 7 रेसकोर्स रोड पर चाय चर्चा के लिए बुलावा भेजा. जीएसटी विधेयक (वस्तु एवं सेवा कर) को पारित करने के लिए राज्य प्रमुख और प्रमुख विपक्षी दल के बीच लगभग 40 मिनट तक चली यह बैठक महज एक आधिकारिक संवाद ही दिखाई दी.
 
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राजग सरकार और यूपीए के बीच जबर्दस्त तनातनी चल रही है. लेकिन, चाय पर चर्चा के बाद दोनों पक्षों के हाव-भाव ने संकेत दिया है कि नरेंद्र मोदी ने इस धारणा को दूर करने के लिए पहल की है कि उनकी कांग्रेसी नेतृत्व के साथ कोई निजी रंजिश है. प्रधानमंत्री ने यह संकेत भी दिया कि वह कांग्रेस की अहमियत को स्वीकारते हैं और उसकी चिंताओं पर विचार करने के लिए तैयार हैं. इस बैठक से पहले ही प्रधानमंत्री ने निपुणता के साथ इस तथ्य को प्रस्तावित किया था कि लोकतंत्र में शासन-विधि बहुमत की ताकत पर नहीं बल्कि आम सहमित पर आधारित होती है.पहली बार ऐसा हुआ है कि लुटियन की दिल्ली की राजनीति में मोदी एक सक्रिय भागीदार बन गए हैं, जिससे वह अब तक दूरी बना कर रखे हुए थे.भारत का सबसे सफलतम प्रधानमंत्री बनने का गौरव अर्जित करने के लिए उन्होंने खुद को कूटनीति और नवीन योजनाओं को प्रोत्साहित करने तक सीमित किया था. जब उन्हें समझ आया कि भारत व विदेशों में उनकी ‘वायदे पूरे करने वाले नेता’ की छवि को नुकसान पहुंच रहा है, तब उन्होंने उनसे घुलने-मिलने के लिए अपने राजसी अलगाव को त्यागने का फैसला किया जिनसे वह वैचारिक रूप से सबसे अधिक घृणा करते थे.मोदी के असंख्य प्रोत्साहकों व समर्थकों में इस बात को लेकर घोर निराशा थी कि सरकार जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) और भूमि विधेयक को संसद द्वारा अनुमोदित कराने में विफल रही.नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अपने सहयोगियों को प्रेरित किया है ताकि निवेशकों को भारत में व्यापार करने में किसी प्रकार की कठिनाइयों का सामना न करना पड़े.बीते कुछ महीनों में राजग सरकार ने रियल एस्टेट, रक्षा, बैंकिंग, ई-कॉमर्स, मीडिया और खुदरा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी निवेश के लिए नियमों में ढील दी है.यहां तक कि नरेंद्र मोदी ने संघ परिवार के कुछ वर्गों के विरोध को भी नजरअंदाज कर दिया.कई संरचनात्मक और विकासोन्मुख सुधारों के बावजूद उनकी सरकार को आर्थिक मोर्चे पर अनुप्रयोज्य नौसखिया सरकार के रूप में देखा जा रहा था.इसके अतिरिक्त, संघ परिवार के भीतर कुछ गौण तत्वों द्वारा किए गए गैरजिम्मेदाराना बयानों के कारण भी उसकी छवि खराब हुई.प्रमुख वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों द्वारा पुरस्कार वापसी अभियान ने इस निराशाजनक दुविधा में इजाफा करते हुए देश और विदेश में राजग सरकार का नकारात्मक प्रचार किया.अंत में, बिहार में शर्मनाक हार ने मोदी की एक अपराजेय नेता की छवि को नुकसान पहुंचाया हालांकि इस हार का प्रमुख कारण राज्य नेताओं का स्थानीय मतदाताओं के साथ खुद को उचित रूप से संबद्ध न करना था.
 
यह सच है कि यह कोई संयोग नहीं है कि प्रधानमंत्री ने बिहार पराजय के बाद ही विपक्ष के साथ खुद को संलग्न करने का निर्णय किया.प्रधानमंत्री कार्यालय के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार उन्हें यह प्रभाव दिया जा रहा था कि जीएसटी विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों का मार्ग प्रशस्त करने के लिए वरिष्ठ मंत्रियों सहित कई वार्ताकार सभी संसदीय हितधारों के साथ लगातार संपर्क में बने हुए हैं.जबकि सच्चाई यह है कि कांग्रेस के साथ बातचीत कर रहे मध्यस्थों में से किसी ने भी मौजूदा मतभेदों को हल करने के लिए कांगेसी नेतृत्व और प्रधानमंत्री के बीच परामर्श की संभावना पर चर्चा तक नहीं की थी.सोनिया और राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी भाजपा नेता ने उनके साथ जीएसटी व अन्य लंबित विधायी मुद्दों पर चर्चा नहीं की है.राजग सरकार के शीर्ष ओहदेदार व कई वरिष्ठ मंत्री कांग्रेस के साथ वार्तालाप के पक्ष में नहीं हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई के इच्छुक हैं.प्रवर्तन निदेशालयों और सीबीआई जैसी विभिन्न जांच एजेंसियों को हर प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ की गहराई से जांच करने का निर्देश दिया गया है.इसमें कोई संदेह नहीं कि कई प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ सत्ता में रहने के दौरान वित्तीय अनियमितताओं में शामिल थे लेकिन मौजूदा सरकार जिस गति से उनके खिलाफ अदालत में लंबित मुकदमों को तेजी से निपटाने पर जोर दे रही है, उसे लेकर पार्टी नेतृत्व काफी गुस्से में है.
 
लेकिन, मोदी की व्यक्तिगत पहल दिल्ली की राजनीति के प्रबंधन के तरीके को   पूरी तरह से बदल कर रख देगी.नरेंद्र मोदी एक श्रेष्ठ प्रसारणकर्ता हैं.1990 के दशक में मोदी भाजपा के सबसे अधिक सक्रिय महासचिवों में से एक थे.उनकी सभी राजनीतिक दल के नेताओं के साथ बहुत अच्छा तालमेल था.लेकिन, 2002 गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी एक राजनीतिक अछूत बन गए.ज्यादातर राष्ट्रीय नेता, फिल्मी सितारे और कॉरपोरेट घराने उनके सबसे कटु आलोचक बन गए.सामाजिक और राजनीतिक पदानुक्रम के शक्तिशाली व्यक्तियों ने उनका तिरस्कार किया.इसके परिणामस्वरूप दुर्जेय विरोधियों से निपटने के लिए उनके विश्वास और क्षमता को काफी नुकसान पहुंचा.उसके बाद, लोकसभा चुनाव में शानदार तरीके से उभरकर उन्होंने भाजपा के लिए एक रिकार्ड तोड़ जीत को सुरक्षित किया.वह अपने राजनीतिक आलोचकों के साथ बातचीत करने के मूड में बिलकुल भी नहीं थे.जब से मोदी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने किसी भी विपक्षी नेता के साथ व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत करने से पूरी तरह परहेज किया और केवल सर्वदलीय बैठकों में ही उनके साथ मुलाकात की.उन्होंने नीति-आयोग की कल्पना जरूर की थी जहां वह मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत कर सकते थे. राजधानी में पिछले कुछ महीनों के अनुभव ने मोदी को अहसास दिलाया है कि वह राजनीतिक विशेषज्ञता को औरों के भरोसे छोड़कर स्वयं को केवल प्रधानमंत्री की भूमिका तक सीमित नहीं रख सकते.गत सप्ताह कांग्रेसी नेताओं के साथ मोदी की बैठक आकस्मिक बैठकों की श्रृंखला की शुरुआत भर है.प्रधानमंत्री अभी तक विदेशी गणमान्य अतिथियों, भारतीय व विदेशी मशहूर हस्तियों और अपने भरोसेमंद सहयोगियों के साथ मुलाकात करने पर ही अटके हुए हैं.सर्वोच्च राष्ट्रीय नेता के रूप में उनकी सफलता, अटल बिहारी वाजपेयी की मधुर उदारता और इंदिरा गांधी की विशुद्ध दृढ़ता को अपनाने की उनकी क्षमता पर निर्भर करती है.
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)