मंथन शुरू करने से पहले आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं. कहानी रेलवे के सबसे निचले कर्मचारी से जुड़ी है. यह कर्मचारी आम बोलचाल की भाषा में गेट मैन कहलाता है. जब ट्रेन फाटक से गुजरती है इसका काम फाटक बंद करना और खोलना होता है. कई बार सुनसान एरिया में ये गेटमैन तैनात होते हैं. ऐसे ही एक दूरस्थ क्षेत्र में तैनात गेट मैन की शादी हो गई. एक दिन पत्नी ने ताना मारा, ‘आपका काम तो बड़ा ही छोटा है. ट्रेन आती है तो आप झंडी दिखाते रहते हो, गेट खोलते-बंद करते रहते हो.’ गेट मैन को यह बात चुभ गई. पत्नी को उसने कहा, ‘देखो ऐसी बात नहीं है. मेरी इतनी औकात (पॉवर) है कि मैं किसी भी ट्रेन को जब चाहे अपने पास रुकवा सकता हूं.’ पत्नी ने भी चैलेंज कर दिया. कहा, ठीक है, तो कल राजधानी एक्सप्रेस को मेरे सामने रुकवा कर दिखाओ. 
 
गेट मैन ने भी चैलेंज स्वीकार कर लिया. सुबह सवा ग्यारह बजे राजधानी ट्रेन के आगमन के समय वह पत्नी को लेकर तैनात हो गया. ट्रेन आई और गेट मैन ने हरी झंडी के बदले लाल झंडी आगे कर दी. ट्रेन रुक गई. गेट मैन की पत्नी ने पति को गले लगा लिया. गेट मैन भी कॉलर खड़ी कर इतरा रहा था. इसी बीच ट्रेन का गार्ड और ड्राइवर वहां पहुंचे और सवाल किया. ट्रेन क्यों रोकी? गेट मैन के पास कोई जवाब नहीं था. बस मुस्कुराता रहा. इतने में सबसे पहले ड्राइवर ने फिर बाद में गार्ड ने जोरदार थप्पड़ गेट मैन को रसीद कर दिया. अब चौंकने की बारी गेट मैन की पत्नी की थी. वह कुछ पूछती इससे पहले गेट मैन ने स्पष्टीकरण दिया. कहा, ”देखो यह जीवन की सच्चाई है मेरी औकात थी कि मैं ट्रेन को जब चाहे रोक दूं और यह उनकी औकात थी कि वे मुझ पर चिल्लाएं और थप्पड़ भी मार सकें.” यह कहानी पढ़कर आप भी समझ गए होंगे कि मैं किस औकात की बात कर रहा हूं. दरअसल, सत्ता और नौकरशाह के बीच औकात की लड़ाई कोई नई नहीं है. जब-जब मौका मिला है दोनों एक दूसरे को उनकी औकात बताते रहे हैं.
 
पिछले महीने जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के पिता मुलायम सिंह यादव ने आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को देख लेने की बात कही थी तो उस समय भी यह चर्चा के केंद्र में था कि क्या राजनीति नौकशाही से ऊपर है. हालांकि, अमिताभ ठाकुर ने भी कानून के सहारे अपनी औकात दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. उन्होंने भी काननून एफआईआर दर्ज कराकर अहसास करा ही दिया कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है. अबफिर यही मुद्दा हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री और फतेहाबाद की पूर्व एसपी संगीता कालिया को लेकर गरम है. जिस तरह पब्लिक मीटिंग में दोनों के बीच संवाद हुआ उसे पूरे देश ने देखा और समझा. एक राजनेता पब्लिक के बीच अपनी ‘हनक’ दिखा रहा था, वहीं दूसरी तरफ एक आईपीएस अधिकारी अपनी ‘अकड़’ दिखा रही थी. मामले ने तूल तब पकड़ा जब राजनेता ने पब्लिक मीटिंग छोड़ दी. बातों ही बातों में बात आखिरकार औकात दिखाने पर ही आकर टिक गई. खुलेआम ऐलान हो गया कि जबतक एसपी का ट्रांसफर नहीं होगा मैं फतेहाबाद में कदम नहीं रखूंगा. आखिर हुआ भी वही, जो राजनेता चाहते थे. सरकार ने भी अपनी औकात दिखाई और उसके बस में जो था वह कर दिया. नौकरी से तो बर्खास्त किया नहीं जा सकता था, इसीलिए पद से ही हटा दिया. फील्ड से हटाकर सिटिंग पोस्ट दे दी. 
 
दरअसल, बात सिर्फ ट्रांसफर या औकात दिखाने की नहीं है. बात है सुचिता की और गरिमा की. एक नौकरशाह और राजनेता अपनी गरिमा को कैसे बनाकर रखता है इस पर लंबे समय से बहस होती रही है. यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी नौकरशाह को ट्रांसफर पॉलिटिक्स का शिकार होना पड़ा है. नौकरशाह अपना काम करते हुए जब सरकार को आईना दिखाता है तो सरकार के पास एक ही चारा होता है. पद से हटा दो. ट्रांसफर कर दो. हरियाणा के ही कांग्रेस सरकार में पूरे देश ने अशोक खेमका और प्रदीप कासनी के मामले में ट्रांसफर पॉलिटिक्स का नंगा नाच देखा था. हालांकि, बावजूद इसके इन अधिकारियों ने सरकार की नाक में दम जरूर किया. मंथन का वक्त है कि हम इस तरह की विवादों के बीच कैसे बीच का रास्ता निकालें. क्या सरकार के पास सिर्फ एक ही रामबाण होता है, ट्रांसफर. या फिर दूसरे रास्तों पर भी मंथन करने की जरूरत है. भारतीय संविधान में यह स्पष्ट व्यवस्था की गई है कि सरकार और नौकरशाहों के काम का दायरा क्या है. किसी प्रदेश में एक सरकार पांच साल के बाद बदल जाती है पर एक अधिकारी अपने रिटायरमेंट तक उसी राज्य में रहता है. ऐसे में दोनों के बीच समन्वय स्थापित करके ही बेहतर सरकार का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन हो इसका उल्टा रहा है.
 
हरियाणा की ही बात करें तो कई बार यह मुद्दा सामने आ चुका है कि प्रदेश के अधिकारी सरकार के मंत्रियों या विधायकों की बात नहीं सुनते हैं. अधिकारियों से मिलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है. ऐसे में हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री और एक आईपीएस के बीच हुए विवाद ने इसे और हवा दी. परिणाम यह हुआ कि महिला अधिकारी को इसकी कीमत चुकानी पड़ी. संविधान ने जो व्यवस्था दी है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए. कौन बड़ा है या कौन छोटा, इस विवाद में पड़ने की जगह इस बात पर जोर देना चाहिए कि एक साथ मिलकर कैसे किसी प्रदेश का विकास किया जा सकता है. और रही बात औकात दिखाने की, उसकी न तो कोई सीमा है और न ही इसे सीमाओं में बांधा जा सकता है. क्योंकि, आज मंत्री के हाथ में था तो उसने महिला अधिकारी का ट्रांसफर करा दिया पर मंत्री जी को वह दिन भी याद ही होगा जब अंबाला में ही एक महिला आईपीएस अधिकारी ने उन्हें एक दिन की जेल की हवा भी खिला दी थी.
 
(यह लेखक के निजी विचार हैं.)