‘असहिष्णुता’ किसी न किसी प्रकार से हमारे धर्मनिरपेक्ष देश में एक वर्जित शब्द बन गया है. असहिष्णुता पर केंद्रित सभी प्रकार की वार्तालाप व वाद-विवाद को हम सिरे से खारिज करने व उस पर व्यंग्य कसने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं. इस शब्द के प्रति हमारे देश के नागरिकों की प्रतिक्रिया में भी दिन बीतने के साथ-साथ बदलाव आता जा रहा है. जबकि इस देश ने शाहरुख खान के इस विचार के साथ सहमति जताई कि यह देश वाकई में असहिष्णु हो गया है. इस सप्ताह हमने असहिष्णुता पर उसके विचारों के लिए आमिर खान की कड़े शब्दों में निंदा की और साथ ही उसे यह अहसास भी दिलाया कि जिस देश ने उसे धन, शोहरत और प्रसिद्धि के मुकाम पर पहुंचाया, उसी व्यक्ति द्वारा देश की वैश्विक छवि को धूमिल करने वाले बयानों को यहां की जनता कभी बर्दाश्त नहीं करेगी.
 
चूंकि असहिष्णुता एक प्रचलित शब्द है, मैं असहिष्णुता पर वाद-विवाद करने के लिए इसका इस्तेमाल करने का पूरा प्रयास कर रही हूं. मैं यह कहना चाहूंगी कि मैं दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण स्तरों के प्रति असहिष्णु हो गई हूं. यह एहसास होना महत्वपूर्ण है कि अगर हम इस प्रकार की असहिष्णुता को गंभीरता से नहीं लेते हैं तो हम खुद मौत के मुंह में धीरे-धीरे चले जाएंगे. राजधानी में प्रदूषण स्तर पर नजर रखने वाली एजेंसियां बीते कई सप्ताह से हमें शहर में प्रदूषण के बढ़ते स्तर, पीने के पानी की दयनीय स्थिति और बेकार सफाई-व्यवस्था को लेकर सतर्क करती आ रही हैं. इन गंभीर समस्याओं का समाधान करने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र व राज्य सरकार ने शहर की दूषित हवा के प्रति एक प्रकार की सहिष्णुता विकसित कर ली है और इस तथ्य से अनजान दिखाई पड़ती है कि यह दूषित हवा शहर में रहने वाले बच्चों और बूढ़ों के लिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर रही है. कई विदेशी व स्वदेशी न्यूज एजेंसियों, लेखकों, राजनीतिज्ञों, संवाददाताओं द्वारा एक असहिष्णु राष्ट्र होने के सम्मान के साथ-साथ हमारे पास गौरवान्वित महसूस करने के लिए एक और ठोस कारण है. दिल्ली को आधिकारिक तौर पर विश्व का सर्वाधिक प्रदूषित शहर घोषित कर दिया गया है, लेकिन न ही न्यायालयों और न ही सरकार को इसकी कोई परवाह है. जब सरकार शहर की हवा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए आवश्यक उपाय करने में असमर्थ रही है तो इंद्र देवता को दोष देने का क्या मतलब बनता है? हालात को और बदतर बनाने के लिए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने खुलासा किया है कि धुंध और कोहरे के संयोजन के कारण इन सर्दियों में प्रदूषण के स्तर में और वृद्धि होने की पूरी संभावना है. इस खुलासे के बाद भी राज्य अथवा केंद्र सरकार की तरफ से इस स्थिति से निपटने के संबंध में कोई बयान नहीं आया है.
 
बढ़ते प्रदूषण स्तर के दुष्परिणामों पर मंथन करने के बजाय हम अभी भी इस तर्कहीन प्रश्न पर अटके हुए हैं कि हमारा राष्ट्र असहिष्णु है या नहीं. और तो और, वाद-विवाद का स्तर इतना गिर चुका है कि सोशल मीडिया में सरेआम इस प्रश्न पर बहस छिड़ गई है कि हिंदू अथवा मुस्लिम समुदाय में से कौन सा समुदाय अधिक सहिष्णु है. हिंदुस्तान कोका कोला के हापुड़ स्थित संयंत्र के चार शुद्धिकरण संयंत्रों में से तीन के निष्क्रिय होने के बाद वहां के प्रदूषण स्तरों को लेकर भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा चेतावनी जारी कर दी गई है. यह संयंत्र बीते एक वर्ष से संचालन की अनुमति लिए बिना ही चल रहा था और इसकी जांच किए जाने की आवश्यकता है कि प्रदूषण जांच एजेंसियों की नजर इस संयंत्र पर पहले क्यों नहीं पड़ी. यह संयंत्र प्रतिदिन 100 केएलडी गंदा पानी बाहर निकालता है और निकटस्थ तालाब के पानी को बहुत प्रदूषित कर चुका है. अगर सरकार एक संयंत्र द्वारा फैलाए गए प्रदूषण और उसके जलग्रह-क्षेत्र पर प्रभाव से नहीं निपट सकती तो उसे गंगा और यमुना नदियों को स्वच्छ करने का दावा करके खुद को और जनता को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए. यहां यह प्रश्न उठाने की आवश्यकता है कि किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई करने के लिए सरकार किस समय की प्रतीक्षा कर रही है? क्या सरकार की आंखें तभी खुलेंगी जब कई लोग जहरीले प्रदूषण की चपेट में आकर अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे? हमारे समक्ष पंजाब का उदाहरण पहले से ही है जहां भू-जल प्रदूषण के परिणामस्वरूप कई परिवार बर्बाद हो गए हैं, जबकि भटिंडा, मानसा, मोगा, फरीदकोट, संगरूर और पाटियाला जिलों में यूरेनियम विषाक्तता के परिणामस्वरूप कुछ लोग कैंसर से और कुछ जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे हैं. 
 
सर्वोच्च न्यायालय ने राजधानी में प्रवेश करने वाले और प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों पर ग्रीन टैक्स लगाने का निर्देश जारी किया है, लेकिन इस निर्देश को अभी तक स्थानीय प्रशासन द्वारा कार्यान्वित नहीं किया गया है. जबकि, हम केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा उचित कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं, यह समझना आवश्यक है कि ‘इस असहिष्णु देश को छोड़ने’ की तरह इस शहर को छोड़ना किसी समस्या का हल नहीं है. इस गंभीर समस्या के समाधान होने तक हमें सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर बहस के द्वारा खुद का मनोरंजन करते रहना चाहिए. कौन राष्ट्रभक्त है कौन देशद्रोही, राममंदिर का निर्माण कब होगा, क्या इन प्रश्नों के अलावा और कोई रोचक समाचार सुर्खियों की संभावना भी है या नहीं? क्या हम में इन अप्रचलित वाद-विवादों से आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति का अभाव है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमें अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारी मानसिकता, हमारी विचारधारा और हमारी मनोवृत्ति ही इस प्रश्न का उचित उत्तर हैं.
 
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)