नई दिल्ली: गांधीजी के उम्मीदवार को कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में कभी सुभाष चंद्र बोस ने हरा दिया था, ये कहानी तो काफी लोग जानते हैं, आज की पीढ़ी के भी. लेकिन इस बात की कहीं चर्चा नहीं होती कि कभी नेहरूजी के उम्मीदवार को भी सरदार पटेल के उम्मीदवार ने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में पटखनी दे दी थी. ये महाशय थे पुरुषोत्तम टंडन, जिन्हें राजर्षि टंडन भी कहा जाता है, अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष के चुनावों के इतिहास में उनका तुलना हमेशा सुभाष चंद्र बोस से की जाती है. इसी तरह आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में पंडित नेहरू ने भी पुरुषोत्तम दास टंडन के विरोध में जे बी कृपलानी को सपोर्ट किया, वो भी अपने कैंडिडेट को जिता नहीं पाए. नतीजा ये हुआ कि नेहरूजी ने इस्तीफा देने तक की धमकी दे डाली, बाद में पुरुषोत्तम दास टंडन को भी कांग्रेस अध्यक्ष पद से बोस की तरह ही इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया गया.

दिलचस्प बात ये है कि पुरुषोत्तम दास टंडन भी नेहरू जी के तरह इलाहाबादी ही थे और वकील भी, वो तेज बहादुर सप्रू के जूनियर थे औऱ स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के लिए नौकरी छोड़ दी. कई बार जेल गए, किसान सभा से जुड़े रहे, 13 साल यूपी असेम्बली के स्पीकर रहे, संविधान सभा के सदस्य भी चुने गए. आजादी के बाद उन्होंने 1948 में पट्टाभि सीतारमैया के विरोध में अध्यक्षीय चुनाव में कोशिश की थी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. ऐसे में उन्होंने 1950 के चुनाव में भी किस्मत आजमाई, तो सरदार पटेल ने भी उनके ऊपर हाथ रख दिया.

पुरुषोत्तम टंडन दास

 

लेकिन पंडित नेहरू के खेमे का सपोर्ट जेबी कृपलानी के साथ था, जो 1947 में भी कांग्रेस प्रेसीडेंट रह चुके थे. नेहरू उस वक्त पीएम थे, उनको लगता था कि उनका कैंडिडेट जीत जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उनको कृपलानी की हार से वही सदमा लगा जो कभी बोस की जीत से गांधीजी को लगा था. अब सरकार की कमान नेहरू के हाथ में और पार्टी की कमान पुरुषोत्तम दास टंडन के हाथ में, चुनाव जीतने के लिए नेहरूजी की ही जरूरत थी, छोटे मोटे कई विवाद हुए औऱ नेहरूजी ने इस्तीफे की भी धमकी दी तो पुरुषोत्तम दास टंडन ने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा और अगले दो साल फिर जवाहर लाल नेहरू ही दोनों पदों पर काबिज रहे पीएम भी और कांग्रेस अध्यक्ष भी.

नेहरूजी से उनके मतभेद के और भी तमाम मुद्दे थे, धर्मान्तरण के मुद्दे पर सोमनाथ मंदिर को फिर से खड़ा करने वाले के एम मुंशी और पुरुषोत्तम दास टंडन के सुर एक थे. बंटवारे के प्रस्ताव का भी उन्होंने ये कहकर विरोध किया था कि मुस्लिम लीग और अंग्रेजों के सामने ये सरेंडर जैसा है. वैसे भी वो नेहरू के बजाय पटेल के ज्यादा करीबी थे. हिंदी प्रचार सभाओं के जरिए उनका हिंदी और देवनागरी की वकालत करना भी लोगों को पसंद नहीं आया था. ऐसे कई मुद्दे थे जिन पर उनकी राय आज के बीजेपी नेताओं से मिलती है.

1952 में तो टंडन लोकसभा चुनाव जीते, लेकिन 1956 में राज्यसभा से सांसद हुए. उसके बाद तो उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ही ले लिया. वो काफी बीमार भी हो गए. तब तक पंडित नेहरू के मन से भी उनको लेकर मन का मैल निकल चुका था और पंडित नेहरू की ही सरकार ने उनको 1961 में भारत रत्न से सम्मानित किया. हालांकि उन्हें अगर ये सम्मान मिला और उन्हें आज भी जनता राजर्षि टंडन के तौर पर जानती है तो ये जानना आज की पीढ़ी के लिए भी जरूरी होगा कि वो वाकई में सत्ता में रहकर भी ऋषियों की तरह ही रहते थे.

विधानसभा का स्पीकर भी लोकसभा की तरह ही चुने जाने के बाद पार्टी से दूरियां बना लेता है और कभी पार्टी की मीटिंग्स में हिस्सा नहीं लेता, लेकिन टंडनजी पार्टी की मीटिंगों में भाग लेते थे. जब इस पर काफी ऐतराज किया गया तो उन्होंने विधानसभा में खड़े होकर कहा कि मैं अपने पद से अभी इस्तीफा देने को तैयार हूं अगर एक भी सदस्य को मुझ पर भरोसा ना हो तो, तो उनकी इतनी इज्जत दी सदन में, यहां तक कि विरोधियों के बीच भी कि एक भी सदस्य ने उनके खिलाफ आवाज नहीं निकाली. इसी तरह वो लैदर का इस्तेमाल नहीं करते थे औऱ ज्यादातर रबर की चप्पलों का ही इस्तेमाल करते थे.

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Posted by InKhabar on Monday, 4 December 2017

 

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