नई दिल्ली: इन दिनों मोदी सरकार का एक एक प्रस्तावित कानून काफी चर्चा में है, जिसमें तमाम तरह की बातें कही जा रही हैं कि अब बैंकों में आपका पैसा सुरक्षित नहीं रहेगा, आपके पैसे को सरकार कभी भी जब्त कर सकती है .दरअसल ये एफडीआरआई बिल यानी फाइनेंशियल रिजोल्यूशन एंड डिपोजिट इंश्योरेंस बिल को लाने के प्रस्ताव पर जून में मोदी केबिनेट ने अपनी सहमति दी थी. अगस्त में इसे लोकसभा में पेश किया गया और संसद की संयुक्त समिति इस बिल पर अपनी रिपोर्ट इस विंटर सैशन में सौंप सकती है, जो 15 दिसंबर से शुरू होने जा रहा है. सरकार के मुताबिक, इस बिल को लाने का उद्देश्य बैकिंग, इंश्योरेंस और अन्य फाइनेंशियल सेक्टर की संस्थाओं, कंपनियों के लिए दीवालिया जैसी हालत होने पर एक्शन का फ्रेमवर्क तैयार करना है. साथ ही बड़े स्तर पर जमाकर्ताओं के हितों का भी ध्यान रखना है.

आखिर क्या है ये बिल? क्यों ला रही है सरकार? सरकारे के इरादे और दावे क्या हैं और किन वजहों से लोगों में इस प्रस्तावित बिल को लेकर तमाम शंकाएं हैं, उन सबको इस पूरे मुद्दे से जुड़ी दस महत्वपूर्ण बातों के जरिए दूर किया जा सकता है.

  1. सबसे पहले इस बिल की चर्चा अरुण जेटली ने पिछले साल अपने बजट भाषण में की थी. अरुण जेटली ने कहा था कि देश में खुद को दीवालिया घोषित करने या होने वाली कंपनियों से जुड़े मामलों के लिए कोई सिस्टमेटिक फ्रेमवर्क नहीं हैं. उसे हम बनाएंगे और अगले साल एक बिल लेकर आएंगे.
  2. मार्च 2016 में फाइनेंस मिनिस्ट्री से जुड़े डिपार्टमेंट ऑफ इकोनोमिक अफेयर्स के एडीशनल सेक्रेटरी अजय त्यागी की अगुवाई में एक कमेटी बनाने का ऐलान किया, जिसका काम बिल का ड्राफ्ट तैयार करना था.
  3.  इस कमेटी की अमुशंसाओं के आधार पर एफआरडीआई बिल 2017 का ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया.
  4. उसके बाद फाइनेंस मिनिस्ट्री ने विभिन्न स्टेक होल्डर्स और एक्सपर्ट्स से इस बिल को लेकर 31 अक्टूबर 2016 तक सुझाव मांगे गए और उन सुझावों के आधारों पर बदलावों के बाद केंद्रीय केबिनेट ने इसे लोकसभा में पेश करने के लिए मंजूरी दे दी.
  5. फाइनेंस मिनिस्ट्री का मानना है या दावा है कि ये बिल वित्तीय मुश्किलों के हालात में फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर्स से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए लाया जा रहा है.
  6. वित्तीय परेशानियों से जूझ रही इकाइयों के बेलआउट के लिए पब्लिक मनी के इस्तेमाल की एक सीमा तय करके ये बिल फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच अनुशासन को भी बढ़ावा देगा.
  7. वित्तीय संकट से जूझ रही कंपनियों को भी मदद देने के लिए इस बिल के जरिए एक टाइम फ्रेम तय किया जाएगा, जिससे लागत भी कम हो जाएगी.
  8. ऐसी सभी वित्तीय संस्थाओं को ऐसे संकटों से उबारने के लिए एक रिजोल्यूशन कॉरपोरेशन बनाने का भी इस बिल में प्रावधान है.
  9. इस बिल की तमाम सारी आलोचनाएं भी हो रही हैं, जिस प्रावधान की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है वो ये है कि जमाकर्ताओं का धन भी वित्तीय रूप से फेल साबित हो रही संस्थाओं को उबारने के लिए किया जा सकता है.
  10. ये बिल रिजोल्यूसन कारपोरेशन को ये भी अधिकार देगा कि वो बैंकों के डूबने की स्थिति में जमाकर्ताओं के धन का भी इस्तेमाल कर सकता है. ये बिल कॉरपोरेशन को ये भी अधिकार देगा कि हर जमाकर्ता के कितने धन को एंस्योर्ड किया जाए.

आलोचनाओं के बाद सरकार ने भी सफाई देने में देर नहीं की. सरकार का कहना है कि अब तक बैंकों में जमा एक लाख रुपए तक का ही बीमा होता था, लेकिन बिल में इसको बढ़ाए जाने की बात है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कल शाम को एक ट्वीट करके आश्वस्त किया कि ये बिल जमाकर्ताओं के भले के लिए ही होगा, ट्वीट में लिखा- ‘’ The Financial Resolution and Deposit Insurance Bill, 2017 is pending before the Standing Committee. The objective of the Government is to fully protect the interest of the financial institutions and the depositors. The Government stands committed to this objective.’’

इधर फाइनेंस मिनिस्ट्री की तरफ से ट्विटर पर बयान आया है जिसमें तमाम आशंकाओं को खारिज किया गया है, इस ट्वीट में लिखा है- ‘’ The FRDI Bill will strengthen the system by adding a comprehensive resolution regime that will help ensure that, in the rare event of failure of a financial service provider, there is a system of quick, orderly and efficient resolution in favour of depositors.’’ ऐसे में क्या बिल वाकई में जमाकर्ताओं के भले के लिए है या फिर उठ रहीं तमाम आशंकाएं और विपक्षी पार्टियों के आरोप सच हैं, ये तभी पता चलेगा जब स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी.

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