नई दिल्ली: राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में मंगलवार को उस वक्त नया मोड़ आया जब कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को 2019 तक टालने की अपील की. हालांकि कोर्ट ने कपिल सिब्बल की मांग को खारिज कर सुनवाई के लिए 8 फरवरी 2018 की अगली तारीख मुकर्रर कर दी लेकिन कपिल सिब्बल की इस मांग से विवाद हो गया. सुन्नी पर्सलन बोर्ड की तरफ से हाजी महमूद ने कहा कि हमारी सहमति के बिना ही कपिल सिब्बल ने मामले की सुनवाई टालने की बात कह दी. इसके बाद पूरे मामले ने नाटकीय मोड़ ले लिया. पीएम मोदी ने गुजरात रैली में इसे चुनावी मुद्दा बनाते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड का शुक्रिया अदा कर दिया. इसके बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील शकील अहमद ने कहा कि हाजी महमूद का सुन्नी वक्फ बोर्ड से कोई रिश्ता नहीं है और वो भी इस केस में तमाम वादियों में एक हैं. इसके बाद कपिल सिब्बल ने कहा कि वो सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ही नहीं है.

शकील अहमद ने ये भी कहा था कि उनके मुवक्किल यानी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने उनसे नहीं कहा है कि उसे कपिल सिब्बल की इस दलील पर आपत्ति है कि सुप्रीम कोर्ट को अयोध्या मामले को 2019 के बाद के लिए टाल देना चाहिए क्योंकि बीजेपी 2019 के चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करेगी. सिब्बल की दलील थी कि ये अयोध्या में राम मंदिर बनाना राजनीतिक मसला है जिसका फायदा बीजेपी उठा सकती है इसलिए इसे अगले आम चुनाव के बाद निपटाया जाए.

अब सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जफर फारूखी का खुलकर इस मामले में कपिल सिब्बल की दलील के खिलाफ बोलना ये साफ करता है कि वो बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के संयोजक जफरयाब जिलानी से सहमत नहीं हैं. जिलानी ने सिब्बल का पक्ष लेते हुए कहा था कि गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या मामले में कपिल सिब्बल की दलील को उठाया जिससे साफ है कि बीजेपी इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है इसलिए इसे 2019 के बाद निपटाना चाहिए.

इस पूरे विवाद को समझने के लिए आपको ये जानना जरूरी है कि राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में कौन-कौन से लोग शामिल हैं.

शकील अहमद- सुन्नी वक्फ बोर्ड
राजीव धवन- मोहम्मद सिद्दिकी
दुष्यंत दवे- फारूख अहमद
कपिल सिब्बल- इकबाल अंसारी

रामलला विराजमान- सीएस वैद्यानाथन
हिंदू पक्ष- हरीश साल्वे
निर्मोही अखाड़ा- सुशील जैन

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि विवादित जमीन का तीन हिस्सा करके सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच बांट दिया जाए. 30 सितंबर 2010 को जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एस यू खान और जस्टिस डी वी शर्मा की बेंच ने अयोध्या विवाद पर अपना फैसला सुनाया. फैसला हुआ कि 2.77 एकड़ विवादित भूमि के तीन बराबर हिस्सा किए जाए. राम मूर्ति वाला पहला हिस्सा राम लला विराजमान को दिया गया. राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दिया गया और बाकी बचा हुआ तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया.