नई दिल्ली: कांग्रेस पार्टी के तीन तीन बार नेशनल प्रेसीडेंट रह चुके नीलम संजीवा रेड्डी को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इसलिए भी जाना जाता है कि उन्हीं की पार्टी की पीएम ने उनके विरोध में दूसरे कैंडिडेट को सपोर्ट किया, जबकि राष्ट्रपति चुनावों में वो अपनी पार्टी यानी कांग्रेस के ऑफीशियल उम्मीदवार थे. नीलम संजीवा रेड्डी को इसलिए भी जाना जाता है कि जब कांग्रेस छोड़कर वो दूसरी पार्टी में गए तो वो भारत के पहले ऐसे राष्ट्रपति बने जो निर्विरोध चुने गए. बतौर लोकसभा स्पीकर या राष्ट्रपति तो उनके बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं लेकिन बतौर कांग्रेस अध्यक्ष उनकी पारी के बारे में बेहद कम लोग जानते हैं या चर्चा करते हैं.

नीलम संजीवा रेड्डी आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे, तब वो इलाका मद्रास प्रेसीडेंसी में आता था. गांधीजी जब 1929 में वहां के दौरे पर आए तो रेड्डी भी स्वतंत्रता की जंग में कूद पड़े. बाद में जब 1956 में आंध्र प्रदेश बना तो नीलम संजीवा रेड्डी को उसका पहला चीफ मिनिस्टर बनाया गया. जब कामराज योजना के तहत कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री इस्तीफा देकर दिल्ली में पार्टी को संभालने आए तो नीलम संजीवा रेड्डी भी उन्हीं में से एक थे।. धीरे धीरे नॉन हिंदी भाषी क्षेत्रों के कांग्रेसी नेताओं का एक गुट पार्टी में ताकतवर हो चला था, उसको सिंडिकेट कहा जाने लगा. नेहरू के बाद इस गुट ने शास्त्रीजी और फिर इंदिरा को पीएम बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. नीलम संजीवा रेड्डी भी उसी ग्रुप में शामिल हो गए, कामराज, अमूल्य घोष, एस निंजालिंगप्पा आदि कई क्षेत्रीय ताकतवर नेता इस ग्रुप में थे.

जब इंदिरा ने एक साल के अंदर ही बीमारी से परेशान होकर इस्तीफा दिया तो अगले साल यानी 1960 में नीलम संजीवा रेड्डी को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया. उसके बाद तो वो जम गए और नेहरूजी की मौत से ठीक पहले के साल तक यानी 1963 तक कांग्रेस प्रेसीडेंट बने रहे, यानी तीन या चार साल उस पद पर रहे. उनके बाद उनके ही सहयोगी कामराज ने वो पद संभाल लिया. दिलचस्प बात थी कि इस दौरान 12 मार्च 1962 को वे फिर से आंध्र प्रदेश के सीएम बन गए और 20 फरवरी 1964 तक उस पद पर रहे. एक वक्त में वो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश सीएम दोनों ही पोस्ट पर थे, लेकिन बाद में इस्तीफा दे दिया. हालांकि बस रूट्स नेशनलाइजेशन के एक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के चलते उन्हें आंध्र प्रदेश के सीएम का पद फिर से छोड़ना पड़ा और वो वापस दिल्ली आ गए.

1964 में दिल्ली में नेहरूजी की मौत के बाद उन्हें लाल बहादुर शास्त्री की केबिनेट में स्टील एंड माइंस का मंत्री बना दिया गया, 1966 में जब इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं तो तीन नए चेहरों को छोड़कर कामराज ने शास्त्रीजी के केबिनेट के चेहरों को भी इंदिरा की केबिनेट में शामिल करवाया, तो नीलम संजीवा रेड्डी भी बतौर ट्रांसपोर्ट, सिविल एविएशन, शिपिंग और टूरिज्म जैसे मंत्रालयों के मंत्री बने. लेकिन 1967 में पार्टी ने उन्हें लोकसभा स्पीकर बना दिया. 1969 में सिंडिकेट के नेताओं ने राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मौत के बाद उन्हें राष्ट्रपति पद का ऑफीशियल कैंडिडेट बना दिया और इंदिरा गांधी पर दवाब बनाकर उनके साइन के साथ ऐलान भी करवा दिया.

जब भारत के राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन की मौत हुई, वीवी गिरी उस वक्त उप राष्ट्रपति थे, उनको कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया. सिंडिकेट चाहता था कि उनके बीच के ही नेता नीलम संजीव रेड्डी को प्रेसीडेंट बना दिया जाए, जबकि वो पहले से लोकसभाध्यक्ष थे. इंदिरा को ये डर था कि कहीं सिंडिकेट की पसंद का राष्ट्रपति बन गया तो कल को उन्हें गद्दी से उतारकर मोरारजी की ताजपोशी की जा सकती है. ऐसे में उन्होंने जगजीवन राम का नाम कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में रखते हुए गांधीजी के उस जन्मशती वर्ष में दलित को सर्वोच्च अधिकार देने के सपने की याद दिलाई. लेकिन सिंडिकेट के नेताओं के आगे इंदिरा गांधी की एक ना चली और नीलम संजीवा रेड्डी को कांग्रेस का ऑफीशियल प्रेसीडेंट कैंडिडेट बना दिया गया.

इधर वीवी गिरी ने प्रेसीडेंट की पोस्ट के लिए निर्दलीय ही नामांकन कर दिया. सीजेआई मौ. हिदायुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया. सिंडिकेट ने ये भी ऑफर किया कि गिरि को लोकसभाध्यक्ष बनाया जा सकता है. माना जाता है कि गिरी को खड़ा करने में परदे के पीछे से इंदिरा गांधी की ही भूमिका थी. इंदिरा ने अपनी चाल चली और बतौर लोकसभा में कांग्रेस सदस्यों का नेता होने के चलते कांग्रेस सदस्यों के लिए व्हिप जारी करने से साफ मना कर दिया और कांग्रेसी सासंदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने को कहा. कुल 163 कांग्रेसी सासंदों ने वीवी गिरी को वोट दिया और कांग्रेस शासित 12 राज्यों में से 11 राज्यों में बहुमत भी रेड्डी को मिला.

इधर इंदिरा को आसानी सिंडिकेट के इस फरमान से भी हो गई कि जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के कैंडिडेट सीडी देशमुख को दूसरी प्राथमिकता का वोट दिया जाए. इंदिरा ने चुनाव को लैफ्ट बनाम राइट का नारा देकर गिरी के सपोर्ट को नैतिक बल भी दिया. इधर जीत वीवी गिरी की हुई और उधर अपनी ही पार्टी के कैंडिडेट को हराकर इंदिरा भी जीत गईं. हालांकि वो पहले राउंड में पिछड़ गए थे, लेकिन दूसरी पसंद के वोट्स से जीत गए.

अब नीलम संजीवा रेड्डी क्योंकि लोकसभाध्यक्ष के पद से भी इस्तीफा दे चुके थे, सो उन्होंने राजनीति को अलविदा कहना ही बेहतर समझा और अपने गांव लौट गए. लेकिन जैसे ही जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का ऐलान किया, वो भी वापस आकर जनता पार्टी से जुड़ गए। 1977 में वो अकेले जनता पार्टी उम्मीदवार थे जो आंध्र प्रदेश से जीते थे. उन्हें जनता पार्टी सरकार में लोकसभा स्पीकर चुन लिया गया, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मौत के बाद राष्ट्रपति चुनाव हुए तो वो राष्ट्रपति उम्मीदवार बन गए और तीन महीने सत्रह दिन के अंदर लोकसभा स्पीकर की पोस्ट से इस्तीफा दे दिया. कुल 37 उम्मीदवारों में से 36 कैंडिडेट्स की उम्मीदवारी रिटर्निंग ऑफिसर ने कुछ ना कुछ खामियों के चलते रद्द कर दी औऱ इस तरह नीलम संजीवा रेड्डी देश के पहले निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए और तब तक सबसे कम उम्र के भी, उस समय वे 64 साल के थे.

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