नई दिल्ली. साहित्यकार, कलाकार, फिल्मकार और वैज्ञानिकों के बाद अब इतिहासकार भी खराब माहौल को लेकर सरकार के खिलाफ खुलकर आ गए हैं. रोमिला थापर, इरफान हबीब, केएन पन्निकर व मृदुला मुखर्जी समेत 53 इतिहासकारों ने एक साझा बयान में माहौल सुधारने की दिशा में ठोस बयान नहीं जारी करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की है.
 
बयान में कहा गया है कि विरोधी विचार रखने वालों को मार-पीट के जरिए चुप कराने की कोशिश हो रही है, बहस में तर्क की बजाय गोलियां इस्तेमाल हो रही हैं. बयान में इस बात पर भी आपत्ति जाहिर की गई कि साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने पर केंद्र सरकार के मंत्री ने देश के खराब माहौल पर बात करने के बदले ये कहा कि ये सब कागजी क्रांति है और लेखकों को लिखना बंद कर देना चाहिए.
 
इतिहास को अपने हिसाब से लिखवाना चाहती है सरकार
 
इतिहासकारों ने ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ पर भी सवाल उठाते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि सरकार कालक्रम, स्रोत, तथ्य या ऐतिहासिक जांच प्रणाली को नजरअंदाज करके मनगढ़ंत इतिहास लिखवाना चाहती है जिसमें उसके हिसाब से कुछ चीजों का महिमामंडन हो और बाकी चीजों का अपमान हो.
 
बयान में सरकार से अपील की गई है कि वो देश में ऐसे माहौल की गारंटी करे जिसमें स्वतंत्र और भयमुक्त विचार रखने की आजादी हो, समाज के हर तबके की सुरक्षा हो, भारतीय विविधता के मूल्यों और परंपरा की रक्षा हो. इतिहासकारों ने कहा है कि अगर ये चीजें बिगड़ गईं तो इसे संवारने में काफी वक्त लगेगा और इसे ठीक करना उन लोगों के भी वश में नहीं होगा जो अभी सत्ता में हैं.
 
साहित्यकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों का विरोध
 
यूपी के दादरी में बीफ खाने की अफवाह पर उग्र भीड़ के हाथों एक अल्पसंख्यक की हत्या के बाद सबसे पहले बारी-बारी से करीब तीन दर्जन से ज्यादा साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटा दिए. बुधवार को 12 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के विजेताओं ने अपने अवार्ड लौटाने की घोषणा कर दी. 
 
देश भर के 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने भी साझा बयान जारी करके माहौल सुधारने की अपील सरकार से की है. पद्मभूषण से सम्मानित तीन वैज्ञानिक अशोक सेन, पीएम भार्गव और बी बलराम ने भी खराब माहौल के खिलाफ अपने पद्म सम्मान को लौटाने की घोषणा की है.