नई दिल्ली. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने NJAC को असंवैधानिक ठहराया है. अब जजों की नियुक्ति NJAC नहीं करेगा बल्कि नियुक्ति पहले से चले आ रहे कॉलेजियम सिस्‍टम के तहत होगी.  कोर्ट  ने कहा है कि NJAC न्यापालिका की स्वतंत्रता  में बाधा डालेगा. ऐडवोकेट सूरत सिंह के अनुसार, NJAC को असंवैधानिक ठहराए जाने की वजह इसका संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करना है.
 
क्या है मामला?
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाऐं दायर की गई थीं. याचिका में कहा गया है कि इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का दखल बढ़ेगा जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित होगी.
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ता है.
 
NJAC से  SC और HC में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ेगा
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट में इसे सही ठहराते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अभी सुनवाई कर सकता क्योंकि इसके लिए नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है. याचिका में कहा गया है कि न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून और 121वां संविधान संशोधन कानून निरस्त किया जाए, क्योंकि इससे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का हस्तक्षेप बढ़ता है, जो न सिर्फ न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बाधित करता है बल्कि संविधान के मूल ढांचे को भी प्रभावित करता है.
 
केंद्र ने कॉलेजियम सिस्‍टम की खामियों पर सवाल उठाए थे 
केंद्र सरकार ने NJAC मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने कॉलेजियम सिस्टम की खामियों पर फिर सवाल उठाए थे. सरकार ने कहा था कि अगर कोर्ट इस आयोग के फैसले को हटाती है तो ये लोकतंत्र के लिए सही नहीं होगा. केद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि ऐसे कई मामले हैं, जिनमें खुफिया विभाग की रिपोर्ट के बावजूद कॉलेजियम ने जजों की नियुक्ति की. हालांकि संविधान पीठ ने सवाल उठाया उस समय भी सवाल उठाया था कि किसी व्यक्ति के बारे में संदेह की रिपोर्ट देने से ही उसकी नियुक्ति कैसे रोकी जा सकती है? ऐसे में सरकार बजाए संदेह जताने के कोई ठोस सबूत क्यों नहीं देती? इसके अलावा मुकुल ने कोर्ट में कई जजों के उदाहरण भी दिए थे. उन्होंने कहा कि एक महिला जज अदालत में हमेशा देरी से आती थीं. उनकी वजह से बेंच के दूसरे जज भी परेशान थे. ये पता होने के बावजूद उन्हें सुप्रीम कोर्ट की जज बना दिया गया.
 
न्यायिक नियुक्ति आयोग का ढ़ांचा
न्यायिक नियुक्ति आयोग के अध्यक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश होंगे. उनके अलावा सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और दो विख्यात हस्तियां होंगी. दो विख्यात हस्तियों का चयन तीन सदस्यीय समिति करेगी. इस समिति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता होंगे.
 
कानून की धारा 5(6) कहती है कि अगर आयोग के दो सदस्य किसी की नियुक्ति के लिए सहमत नहीं होंगे तो आयोग उस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफारिश नहीं करेगा. याचिकाकर्ता का कहना है कि इसका सीधा मतलब है कि मुख्य न्यायाधीश के नजरिए को नजरअंदाज किया जा सकता है, जबकि सुप्रीमकोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड मामले में कह चुकी है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की राय नजरअंदाज नहीं की जा सकती, जबकि नए कानून के मुताबिक आयोग का अल्प समूह (दो सदस्य) ऐसा कर सकते हैं.