नई दिल्ली. देश में बढ़ती सांप्रदायिक असहिष्णुता के खिलाफ और लेखकों और कवियों के अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने को मोदी सरकार के केंद्रीय संस्कृति मंत्री ने संदेहास्पद बताया है. महेश शर्मा ने कहा कि लेखकों के सम्मान लौटाने का फैसला ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि शक इसलिए भी है क्योंकि एक ही तरह के लोग अवार्ड लौटा रहे हैं.
 
देश में सब ठीक, किसी को कोई खतरा नहीं
महेश शर्मा ने यह भी कहा कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कोई खतरा नहीं है और लेखकों को इस तरह अकादमी से इस्तीफा नहीं देना चाहिए. यदि किसी लेखक को कोई समस्या है तो उसे प्रधानमंत्री को पत्र लिखना चाहिए लेकिन इस तरह इस्तीफा देना, अपने विरोध को प्रकट करने का सही तरीका नहीं है. यह कहे जाने पर कि लेखकों ने कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में पुरस्कार लौटाए हैं उन्होंने कहा कि हम लेखकों की हत्या की कड़ी निंदा करते हैं पर कानून एवं व्यवस्था राज्य का विषय है. इस प्रकरण में नया मोड़ देते हुए कहा कि इस तरह की गैर जरूरी कार्रवाई को लेकर उन्हें उनकी मंशा पर संदेह होता है. 
 
पुरस्कार लौटा रहे लोगों की पृष्ठभूमि पर संदेह
शर्मा ने कहा कि अगर आप उन लोगों के पास जाते हैं, जिन्होंने ऐसा किया है और हम उनकी मंशा का पता लगाते हैं और उनकी क्या पृष्ठभूमि रही है तो मेरा मानना है कि कुछ खुलासा करने वाली बात सामने आएगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि जो लोग सम्मान लौटाने का फैसला कर रहे हैं अगर वो कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें राज्य या केंद्र सरकार को लिखना चाहिए था. मंत्री ने कहा कि अगर किसी को कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर शिकायत है तो उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री, देश के गृह मंत्री या प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया होता. वो मुझे भी पत्र लिख सकते थे क्योंकि मैं भी मंत्री हूं. उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि यह गैर जरूरी है या बात रखने का यह सही तरीका नहीं है. 
 
सलमान रुश्दी ने भी किया समर्थन
 
रुश्दी ने अपने ट्वीट में कहा, ‘मैं नयनतारा सहगल और कई अन्य लेखकों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन करता हूं. भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरनाक समय है.’ जवाहर लाल नेहरू की 88 वर्षीय भांजी सहगल उन शुरुआती लोगों में से थीं जिन्होंने असहमति की आवाज उठाने पर लेखकों और अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ताओं पर बार-बार हमले को लेकर अकादमी की चुप्पी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया था. कम से कम 21 लेखकों ने अपना पुरस्कार लौटाने के फैसले की घोषणा की है. कुछ ने कहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय आज देश में खुद को असुरक्षित और भयभीत महसूस कर रहा है.