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पेट्रोल-डीजल: Times बोला- टैक्स घटाओ, Express ने कहा- 50% टैक्स को सेस बना दो

पेट्रोल-डीजल: Times बोला- टैक्स घटाओ, Express ने कहा- 50% टैक्स को सेस बना दो

| Updated: Saturday, September 16, 2017 - 16:32
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Times of India and Indian Express editorials talk differently on Petrol and Diesel price hike

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पेट्रोल-डीजल: Times बोला- टैक्स घटाओ, Express ने कहा- 50% टैक्स को सेस बना दोTimes of India and Indian Express editorials talk differently on Petrol and Diesel price hikeSaturday, September 16, 2017 - 16:32+05:30
नई दिल्ली. देश में पेट्रोल और डीजल के दाम में एक-एक दिन करके पिछले तीन महीने में हुई बढ़ोतरी पर कुछ दिनों से हंगामा मचा हुआ है. सोशल मीडिया पर भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी के 2014 के पहले के बयान फिर से छापे जा रहे हैं तो सरकार दाम ना घटाने को लेकर सफाई देने में जुटी है.
 
ऐसे माहौल में देश में अंग्रेजी के दो बड़े अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने 15 सितंबर का संपादकीय तेल के बढ़ते दाम को समर्पित किया है. इन दोनों अखबारों के बारे में ये माना जाता है कि ये सरकार और जनता की एक-दूसरे के बारे में नजरिया बनाने में मदद करते हैं.
 
टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने तेल के बढ़ते दाम पर चिंता जाहिर करते हुए संपादकीय तो लिखा है कि लेकिन जहां टाइम्स टैक्स कटौती करके तेल के दाम कम करने पर जोर दे रहा है वहीं इंडियन एक्सप्रेस तेल के दामों में कोई कटौती किए बगैर बढ़ाए गए टैक्स के 50 परसेंट हिस्से को सेस में बदलने की वकालत कर रहा है.
 
 
एक-एक करके दोनों अखबारों के संपादकीय की खास बातों को समझ लेते हैं और उससे ये समझ में आ जाएगा कि देश, सरकार और देश के लोगों को लेकर कौन किस जगह पर खड़ा है. संपादकीय का पूरा अनुवाद नहीं किया गया है. चुनिंदा लाइन ली गई हैं.
 
टाइम्स ऑफ इंडिया की संपादकीय का हेडिंग है- तेल पर टैक्स घटाओ
 
टाइम्स ऑफ इंडिया अपने इस संपादकीय शीर्षक के ठीक नीचे ये भी लिखता है- सरकार को हर हाल में तेल सेक्टर को कामधेनु गाय की तरह इस्तेमाल करना और आर्थिक सुधारों का नाम खराब करना बंद करना चाहिए.
 
टाइम्स की लाइन लेंथ क्लीयर हैं. आर्थिक सुधार चालू रखो लेकिन आर्थिक सुधार में अगर ये दावा किया गया था कि खुले बाजार का लाभ दुकानदार और ग्राहक दोनों को मिलेगा तो ग्राहक के लाभ के वक्त सरकार बीच में आकर टैक्स की मलाई ना खाए.
 
टाइम्स ऑफ इंडिया लिखता है- नरेंद्र मोदी के सरकार की कमान संभालने के बाद से भले कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत आधी हो गई है लेकिन उपभोक्ताओं पर इसका कोई असर नजर नहीं आ रहा. यह विचित्र हालत दिगभ्रमित टैक्स नीति की पोल खोलता है जिसने तेल सेक्टर को सरकार के लिए कामधेनु गाय समझ रखा है.
 
पेट्रोल और डीजल कई तरह से भारतीय परिवार के बजट पर असर डालता है. पिछले तीन साल में केंद्र और राज्य सरकारें अभूतपूर्व राजस्व उगाही में जुटी हुई हैं. सिर्फ पेट्रोल और डीजल से सेंट्रल एक्साइज दोगुना से ज्यादा जमा हुआ है. 
 
 
ऐसा नहीं है कि सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स नहीं लगाना चाहिए. भारत की तेल नीति रहस्यमय है जिसे गलत नीयत से सुधार का नाम दिया गया है. इस नीति के तहत देश के अंदर तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम से जुड़ी हैं लेकिन ग्राहक को शायद ही कभी अंतरराष्ट्रीय भाव गिरने का कोई फायदा मिला हो. 
 
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सरकार इस फायदे को ग्राहकों की कीमत पर अपनी जेब में भर लेती है और ऐसी ही चीजों से सुधार का नाम खराब होता है. संसद में पेश जानकारी के मुताबिक पेट्रोल और डीजल का मुंबई में मूल दाम लोगों को मिल रही कीमत के आधे से भी कम है. बाकी पैसे लोगों ने टैक्स और कमीशन के नाम पर भरे.
 
हमारे पड़ोसी और खास तौर पर पाकिस्तान पेट्रोल और डीजल पर अपने लोगों को ज्यादा राहत देती है. ये पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को भारत के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी तौर पर खड़ा करती है और शायद जेहाद से बिगड़ी चीजों को बैलेंस भी करती है. 
 
 
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की यह दलील गले नहीं उतरती कि सरकार के भारी-भरकम खर्च के मद्देनजर ऊंचे टैक्स उचित हैं. समाजवाद के जमाने में हमने उच्चतर श्रेणी में टैक्स रेट 97.5 परसेंट तक भी देखा है. वो नुकसानदेह था और बाद की सरकारों ने ज्यादा तार्किक टैक्स की तरफ रुख किया.
 
आज के आर्थिक हालात को देखते हुए सरकार को हर हाल में पेट्रोलियम सामान पर टैक्स कम करना चाहिए जिससे लोगों और उद्यमियों के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे हों. इससे जो आर्थिक विकास होगी उससे सरकार की झोली स्वाभाविक तौर पर राजस्व से भर जाएगी.
 
इंडियन एक्सप्रेस की संपादकीय का हेडिंग है- कच्चे तथ्य
 
अंग्रेज़ी के ही दूसरे बड़े अखबार इंडियन एक्सप्रेस जिसका सर्कुलेशन तो कम है लेकिन नीति बनाने वाले नेताओं और अफसरों पर असर देश के किसी भी अखबार से ज्यादा, उसने क्रुड फैक्ट्स नाम से संपादकीय लिखा है.
 
इंडियन एक्सप्रेस लिखता है- पेट्रोल और डीजल इस वक्त दिल्ली में 70.39 रुपए और 58.74 रुपए लीटर बिक रहे हैं. ये रेट 26 मई, 2014 को इन दोनों तेल के रेट से कुछ ही नीचे है जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला था. तब पेट्रोल 71.41 रुपए और डीजल 56.71 रुपए लीटर बिक रहा था. 
 
जब हम भारतीय रिफाइनरी द्वारा मंगाए जा रहे कच्चे तेल के दाम पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि भारतीय ग्राहकों को शिकायत करने का पुख्ता कारण है क्योंकि इस दौरान कच्चे तेल का दाम 108.05 डॉलर से 53.83 डॉलर प्रति बैरल पर आ चुका है.
 
इसस हालात में लोगों के बीच ठगे जाने का जो अहसास है वो 16 जून से रोजाना दाम तय होने की शुरुआत से और बढ़ गया है क्योंकि पिछले तीन महीने में पेट्रोल और डीजल का दाम करीब-करीब 5 परसेंट बढ़ गया है.
 
 
ये बात भी सच है कि भारत के लिए कच्चे तेल का दाम इसी दौरान करीब 7.89 डॉलर या 17.2 परसेंट बढ़ गया है लेकिन सरकार से बदले कंपनियों द्वारा दाम तय करने के बावजूद ग्राहकों को फायदा नहीं मिलने की शिकायत में फिर भी दम है.
 
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम गिरने का फायदा लोगों तक नहीं पहुंच पाने का मुख्य कारण निश्चित रूप से केंद्र सरकार द्वारा साथ-साथ एक्साइज ड्यूटी बढ़ाना रहा है. इस दौरान पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपए से बढ़ाकर 21.48 रुपए कर दिया गया जबकि डीजल पर 3.56 रुपए से 17.33 रुपए कर दिया गया. 
 
ऐसा करके सरकार ने अंतरराष्ट्रीय कीमत गिरने से होने वाला फायदे का ज्यादातर हिस्सा अपनी जेब में भर लिया है. देश में हर साल 3.2 करोड़ किलोलीटर पेट्रोल और 9 करोड़ किलोलीटर डीजल की खपत होती है. बढ़ाए गए टैक्स के हिसाब से सरकार को सालाना 1.62 लाख करोड़ का अतिरिक्त राजस्व मिला है. क्या यह उचित है ?
 
 
थोड़े वक्त के उपभोक्ता नजरिए से ये गलत है. खुले बाजार के नियम का फायदा ग्राहकों को भी मिलना चाहिए और उनको कच्चे तेल का दाम गिरने का लाभ मिलना चाहिए था जैसे वो कच्चे तेल के भाव बढ़ने पर ज्यादा पैसा दे रहे थे. लेकिन तेल अलग चीज है.
 
जीवाश्म इंधन यानी जमीन के नीचे दबे तेल और गैस के खजाने से महरूम भारत जैसे देश के लिए लंबे समय के लिए पेट्रोलियम सामानों की खपत को कम करना और साथ ही कम ऊर्जा खपाकर ज्यादा उत्पादन करने और नवीन ऊर्जा की तकनीक को बढ़ावा देना जरूरी है.
 
इसका एक तरीका तो टैक्स बढ़ाना है जिससे सरकारी खजाने को भी फायदा होता है. इसलिए मोदी सरकार को एक्साइज ड्यूटी घटाने के लोकप्रिय दबाव को नजरअंदाज कर देना चाहिए.
 
 
सरकार लोगों की शिकायत को कम करने के लिए दो काम कर सकती है. पहला तो ये कि सरकार एक्साइज ड्यूटी का एक हिस्सा या फिर 50 परसेंट तक को सेस यानी उपकर में बदल दे जो पैसा रेलवे, मेट्रो, हाइवे, सिंचाई, बंदरगाह जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने पर खर्च होगा. ग्राहक को शायद कम बुरा लगेगा जब उनको पता होगा कि वो ज्यादा पैसा दे रहे हैं तो वो जा कहां रहा है.
 
दूसरा तरीका ये हो सकता है कि सरकार तेल का रिटेल बाजार तमाम तरह की तेल कंपनियों के लिए खोल दे. सिर्फ आयात खर्च के हिसाब से तेल कंपनियों के लिए हर रोज देश में पेट्रोल-डीजल का दाम तय करने की छूट कोई डी-रेगुलेशन यानी सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना नहीं है.
 
सरकार को तेल का खुदरा बाजार तेल बेचने वाले स्वतंत्र रिटेलर्स के लिए खोल देना चाहिए जो तयशुदा रिफाइनरी से पेट्रोल या डीजल खरीदने के बदले वहां से तेल खरीदेंगे जहां वो सबसे सस्ता मिल रहा हो. अमेरिका में ऐसा ही होता है जहां वालमार्ट और कॉस्टको हर साल शेवरॉन और एक्क्सॉन मोबिल से ज्यादा तेल बेचती हैं.
First Published | Saturday, September 16, 2017 - 16:32
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Web Title: Times of India and Indian Express editorials talk differently on Petrol and Diesel price hike
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