नई दिल्ली: रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल की गई है. याचिका दाखिल कर मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के उस फैसले पर रोक लगाए जिसमें वो रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने का फैसला लिया गया है.
 
दरअसल, यह याचिका वकील रोशन तारा जायसवाल, ज़ेबा ख़ैर और के जी गोपालकृष्णन की ओर से दाखिल की गई है. याचिका में कहा गया है कि अगर उन्हें वापस म्यांमार भेजा जाता है तो उनका उत्पीड़न किये जाने का खतरा है. 
 
 
याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार अच्छे से जानती है कि म्यांमार में किस तरह से रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है. याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को निर्देश दे कि वो कोई ऐसा दिशा निर्देश बनाये ताकि भविष्य में इस तरह को परिस्थितियो को हैंडल किया जा सके.
 
वहीं सुप्रीम कोर्ट रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में 18 सितंबर को सुनवाई करेगा. इससे पहले रोहिंग्या मुसलमानों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताने के चंद घंटों के बाद केन्द्र सरकार ने कहा था कि इस मसले पर उसकी और से अंतिम निर्णय नही लिया गया है.
 
सरकारी वकील की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि हलफनामा गलती से याचिकाकर्ता के वकील को भेज दिया गया. पत्र में कहा गया था कि हलफनामे को अंतिम रूप देने से पहले ही गलती से इसकी प्रति याचिकाकर्ता को दे दी गयी. साथ ही इस पत्र में यह भी दावा किया गया था कि हलफनामा सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में दाखिल नही की गई है.
 
 
वहीं रोहिंग्या मुस्लिम को वापस बर्मा भेजने के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा था कि रोहिंग्या भारत में नहीं रह सकते. केंद्र सरकार ने अपने हलफ़नामे में कहा कि सरकार को ये खुफिया जानकारी मिली है कि कुछ रोहिंग्या आतंकी संगठनों के साथ मिले हुए हैं.
 
केंद्र सरकार ने ये भी कहा कि रोहिंग्या मुस्लिमों को ISIS इस्तेमाल कर सकता है इतना ही नही रोहिंग्या मिलीटेंट ग्रुप दिल्ली, जम्मू, हैदराबाद और मेवात में सक्रिय। केंद्र सरकार ने कहा कि राष्ट्रहित में उन्हें वापस भेजना जरूरी.
 
केंद्र सरकार ने अपने हलफ़नामे में कहा कि अवैध रूप से आए लोगों को भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि ये मौलिक अधिकारों के तहत नहीं आता.
 
केंद्र सरकार ने अपने हलफ़नामे में ये भी कहा कि ये संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नहीं आता. देश में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिम अवैध तौर पर रह रहे हैं. भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों के अनुरूप कारवाई करने के लिए स्वतंत्र है.