नई दिल्ली : शिया वफ्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी ने अयोध्या केस में कहा कि शिया वक्फ बोर्ड साल 1946 में ऐसा मुकदमा हार गया था जो उसे कभी नहीं हारना चाहिए था. उन्होंने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड से शिया ने बंटवारे के दौर में वो केस हारा था.
 
वसीम रिज़वी ने कहा कि फैसले को चुनौती देने में देरी की वजह कोर्ट को बता दी है. उन्होंने कहा कि हमारे खिलाफ साजिश हुई थी, हमारी फाइलें वक्फ बोर्ड ने छुपा दी थी, उस जमाने के कर्मचारी मिले होंगे हमारे खिलाफ साजिश करने में.
 
उन्होंने कहा, ‘हमारे सामने ये बात सामने आई तो फाइल ढुढ़वाई. लखनऊ, अयोध्या की जगह फाइल जौनपुर के बंडलों में मिली. फाइल मिली तो ऐसी बात आई कि शिया वक्फ बोर्ड को मुकदमा नहीं लड़ना चाहिए, जिससे ये पता चलता है हम किस दबाव में थे.’ 
 
 
उन्होंने कहा कि मीरा बकी ने मस्जिद बनवाई थी. 1992 से पहले वहां मस्जिद थी. उन्होंने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड खिलाफ होंगे वो नहीं चाहते कि इस मामले का हक निकले. हम कहते हैं कि सुन्नी वक्फ बोर्ड इस मामले को हल नहीं करना चाहता. वो बाहरी मुल्क के दबाव में है. 
 
वसीम रिजवी ने कहा कि सुलह ही आखरी रास्ता है. मंदिर और मस्जिद एक साथ नहीं बन सकते. आज की तारीख में वहां मस्जिद नहीं है वहां केवल झगड़ा है. जो रास्ता बताया है उसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.
 
 
बता दें कि अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू होने से पहले ही शिया वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया है. जिसमें उन्होंने थोड़ी दूर पर मस्जिद बनाने के लिए सरकार जमीन दे दे तो वो जन्मभूमि पर दावा छोड़ने के को तैयार हैं. 
 
शिया वक्फ बोर्ड ने हालांकि ये सीधे तौर पर नहीं कहा है कि विवादित जमीन पर राम मंदिर बने लेकिन इस जमीन के तीन दावेदारों में अगर मुसलमान पक्ष दावा छोड़ दें तो बचे हुए दो पक्ष हिन्दू हैं जो वहां मंदिर बनाने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.