नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जाट विद्यार्थियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत मिलने वाले आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, भले ही न्यायालय का फैसला आने के पहले उनकी नामांकन प्रक्रिया क्यों न शुरू हो गई हो. मेडिकल तथा डेंटल के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए आठ विद्यार्थियों द्वारा दायर याचिका पर न्यायमूर्ति रंजन गोगोई तथा न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन की पीठ ने कोई राहत देने से इंकार कर दिया और कहा कि वह उस नामांकन प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा नहीं डालेंगे, जो जाटों को ओबीसी आरक्षण के तहत संपन्न हुआ था.

न्यायालय का यह आदेश उन दो जाट विद्यार्थियों की उस याचिका को ठुकराने के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, क्योंकि आरक्षण को रद्द करने का न्यायालय का फैसला उनकी नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद आया है. सर्वोच्च न्यायालय ने 17 मार्च को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की चार मार्च, 2014 को जारी की गई अधिसूचना को रद्द कर दिया था, जिसके तहत नौ राज्यों में जाटों को ओबीसी आरक्षण का लाभ दिया गया था.

अखिल भारतीय कोटा से दिल्ली में ओबीसी कोटा के तहत नामांकन चाहने वाले छात्रों की तरफ से पेश हुए वकील जयंत भूषण ने न्यायालय से कहा कि 17 मार्च को आए फैसले के बाद जाट अब फिर से सामान्य वर्ग की श्रेणी में आ गए हैं, जबकि जनवरी में नामांकन प्रक्रिया शुरू होते समय वह आरक्षित वर्ग की श्रेणी में थे. जाटों को आरक्षण का लाभ देने का विरोध करने वाले याचिकाकर्ता के वकील राम सिंह ने हालांकि कहा कि जाट आरक्षण के तहत हर कार्रवाई मामले के परिणाम के अधीन होगा.  उन्होंने दलील दी कि जाट आरक्षण को निरस्त करने से लेकर अब तक, यहां तक कि 17 मार्च के पहले की अवधि के लिए भी कोई भी व्यक्ति आरक्षण नीति के लाभ का दावा नहीं करेगा.