देहरादून: बद्रीनाथ के रास्ते में शुक्रवार दोपहर बड़ी तबाही मची. जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा टूट कर नीचे आ गिरा. इस लैंडस्लाइड के बाद 15 से 20 हजार यात्री फंस गए हैं. बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) का कहना है कि सड़क को दोबारा चालू करने में 2 दिन तक का वक्त लग सकता है.
 
जिस जगह पर लैंडस्लाइड हुआ, वहां लोगों की रिहाइश भी है. मलबे की वजह से कई मकानों को भी नुकसान भी पहुंचा है. लैंड स्लाइड की वजह से जोशीमठ से बद्रीनाथ के बीच की 170 मीटर सड़क पूरी तरह से बर्बाद हो गई. इससे 15 से 20 हजार श्रद्धालु जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच फंसे हैं. 
 
इस बड़े भूस्खलन की वजह से बद्रीनाथ की यात्रा भी फिलहाल रोक दी गई है और बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन युद्धस्तर पर सड़क दुरूस्त करने के काम में जुट गया है. इसके अलावा जल्द बिजली बहाली की भी कोशिशें शुरू कर दी गई हैं ताकि पूरी रात मलबा हटाने का काम चल सके और फंसे हुए यात्रियों को निकाला जा सके.
 
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अचानक कैसे धड़ाम हुआ पहाड़ ?
पहाड़ गिरने के पीछे की वजह खराब मौसम है. गुरुवार रात से ही बद्रीनाथ इलाके में बारिश हो रही थी. शुक्रवार को मौसम तो खुल गया, लेकिन दोपहर बाद करीब साढ़े तीन बजे हाथी पहाड़ दरकने लगा. देखते ही देखते मलबा और बड़ी-बड़ी चट्टानें सड़क पर गिरने लगीं. इससे बद्रीनाथ हाईवे बंद हो गया.
 
चमोली जिला प्रशासन ने कल दोपहर तक सड़क खुलवाने का दावा किया है, हालांकि बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन की तरफ से कहा गया है कि सड़क खुलने में दो दिनों का भी वक्त लग सकता है. प्रशासन श्रद्धालुओं को अलग अलग होटलों और गुरुद्वारों में ठहराने का इंतजाम कर रहा है. स्थानीय होटल मालिकों को निर्देश दिए गए हैं कि वो यात्रियों से एक दिन का किराया ना लें.
 
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अंदर की बात
अंदर की बात ये है कि हिमालय क्षेत्र में खासकर उत्तराखंड में विकास के नाम पर अंधाधुंध काम हो रहा है. पहाड़ काटने के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ है, जिससे हिमालय हिला हुआ है. पहाड़ की मिट्टी ढीली हो चुकी है, इसलिए जैसे ही पहाड़ों पर भारी बारिश होती है, पहाड़ धसकने की घटनाएं शुरू हो जाती हैं.
 
इस साल उत्तराखंड में पहाड़ों पर लैंड स्लाइड का खतरा इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि पहाड़ पर बर्फबारी बहुत ज्यादा हुई है. पहाड़ की ढीली पड़ चुकी मिट्टी नम है, जो बारिश के पानी के साथ बहकर तबाही मचा सकती है. लैंड स्लाइड की भविष्यवाणी का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है, इसलिए चार धाम यात्रियों के लिए बेहतर यही होगा कि वो बारिश की चेतावनी पर नजर रखें और उसी के हिसाब से यात्रा करें.