हैदराबाद.   हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला के आत्महत्या के मामले की जांच कर रहे एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का कहना है कि रोहित की मां ने खुद को गलत तरीके से दलित साबित कर सुविधाओं का फायदा उठाया है.

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इतना नहीं आयोग का कहना है कि रोहित के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया और उसने आत्महत्या का कदम ‘व्यक्तिगत निराशा’ की वजह से उठाया था.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट से रिटायर जज जस्टिस एके रुपनवाल ने 41 पन्नों की रिपोर्ट में कहा है कि कि वेमुला को जिन कारणों से हॉस्टल से निकाला गया था वह पूरी तरह सही था.
 

वहीं तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी और केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को भी क्लीन चिट देते हुए आयोग ने कहा कि यह दोनों सिर्फ अपना फर्ज निभा रहे थे. हैदराबाद विश्वविद्यालय की ऊपर रोहित के मामले में कोई दबाव नहीं था. 
 
अखबार ने लिखा है कि जांच के दौरान आयोग ने यह भी पाया है कि रोहित का जन्म प्रमाण पत्र भी बिना जांच के जारी किया गया था. आयोग ने इस रिपोर्ट को 50 लोगों से पूछताछ के आधार पर तैयार किया है जिसमें छात्र, अध्यापक और स्टाफ के लोग शामिल हैं.

इस दौरान आयोग ने ज्वाइंट एक्शन समिति से भी पूछताछ की थी जिसे रोहित की मौत के बाद गठित किया गया था.

गौरतलब है कि 17 जनवरी को रिसर्च स्कॉलर रहे रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी.

जिसके बाद पूरे देश में केंद्र सरकार के खिलाफ दलितों के साथ भेदभाव करने के आरोप में प्रदर्शन हुए थे. इन विरोध प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और बीजेपी को भी निशाने पर लिया गया था.  

इस पूरे मामले पर संसद में भी बहस हुई थी.  रोहित की मौत के बाद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से पूरे मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय आयोग गठन किया गया था.