नई दिल्ली. देश की आजादी और सुरक्षा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने जो योगदान दिए उसे शायद ही कोई भूल सकता है. इसका प्रमाण उसके 1947 में कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों पर कड़ी नज़र से लेकर 1999 के क कारगिल युद्ध में स्वयंसेवकों के अतुलनीय योगदान से लगाया जा सकता है.
 
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वैसे संघ की हमेशा से ही किसी न किसी बात लेकर आलोचना होती रही है. संघ को कभी हिन्दूवादी कहा गया, कभी फांसीवादी कहा गया और कभी सांप्रदायिकता का भी तमगा संघ को दिया गया, लेकिन संघ इन सब से बेपरवाह त्याग, हिम्मत और भारतीय संस्कृति का प्रतीक अपने भगवा ध्वज के साथ देशहित में 1947 से डटा हुआ है.
 
1. कश्मीर सीमा पर स्वयंसेवकों का बलिदान- स्वयंसेवकों ने 1947 में बिना किसी ट्रेनिंग के कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों की प्रत्येक हरकतों पर नजर रखी. स्वयंसेवकों के उस बलिदान को कभी नहीं भूलाया जा सकता जब पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत में घुसपैठ करने की कोशिश की, तब भारतीय सेना के साथ-साथ स्वयंसेवकों ने भी अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. इसके बाद जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ उस समय भी संघ ने ही पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे.
 
2. गोवा की आजादी- 21 जुलाई 1954 को गोवा, दादरा और नगर हवेली को संघ की मदद से ही पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया था. स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 को पुर्तगाल का झंडा उतारकर तिरंगा फहराया और दादरा-नगर हवेली को सदा के लिए पुर्तगाल के चंगुल से आजाद कराया. संघ के स्वयंसेवक 1955 से ही गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से जुड़ चुके थे. जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप जगन्नाथ राव जोशी समेत कई संघ कार्यकर्ताओं को दस साल की सजा सुनाई गई. इसके बाद सेना के हस्तक्षेप के बाद 1961 में गोवा आजाद हुआ.
 
3. 1962 का भारत-चीन युद्ध- जब भारत और चीन के बीच 1962 में युद्घ हुआ उस वक़्त भी स्वयंसेवकों ने देशहित में जान गंवाई. उस समय संघ ने सेना की मदद में पूरी ताकत झोंक दी. इसके बाद स्वयंसवकों के कार्य को पूरे देश ने सराहा, जिसके बाद तत्कालिन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने 1963 के गणतंत्र दिवस परेड के लिए स्वयंसवकों को आमंत्रित किया जिसके बाद करीब 3500 स्वयंसेवक पहली बार बिना किसी रिहर्सल के परेड में शामिल हुए, जबकि आमंत्रण परेड से केवल 2 दिन पहले मिला था.
 
4. 1965 का युद्ध- 1965 में जब पाकिस्तान से दोबारा युद्ध हुआ तो उस समय तत्कालिन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी संघ की मदद मांगी. यहां तक कि उन्होंने दिल्ली की कानून व्यवस्था को संभालने के लिए स्वयंसेवकों की मदद मांगी ताकि दिल्ली पुलिस को युद्ध में लगाया जा सके. युद्ध में घायल जवानों को खून देने में भी स्वयंसेवक ही आगे थे. साथ ही युद्ध के समय घाटी से बर्फ हटाने का काम भी स्वयंसेवकों ने ही किया था.
 
5. आपातकाल और संघ- सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बावजूद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन शुरु कर दिया. 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के आपातकाल के खिलाफ पोस्टर चिपकाना, जेलों में बंद राजनीतिक नेताओं तक सूचनाएं पहुंचाने जैसे देशहित के कई कामों को संघ ने अपने हाथ में लिया जिसके बाद आपातकाल के समय ही संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया. आपातकाल हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने.
 
इसके अलावा संघ की देशहित की बात करें तो 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी, 1984 का सिक्ख दंगा, गुजरात में भूकंप, सुनामी, उत्तराखंड की बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही करगिल युद्ध में भी संघ ने अपना अद्वितीय योगदान दिया है जिसे कतई नकारा नहीं जा सकता.