बिहार. नीलम बिहार के जमूई जिले में एक छोटे गांव केड़िया में रहती है. अभी वो 12वीं में पढ़ती है. गांव की वह पहली लड़की है जिसने हाईस्कूल के बाद पढ़ाई को जारी रखा है. वो हर रोज पांच किलोमीटर दूर मटिया कस्बे में पढ़ने जाती है और लौटकर आसपास की महिलाओं को जैविक खाद, कीटनाशक बनाना सिखाती है.
 
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इस मुहिम में नीलम अकेली नहीं है बल्कि सरकार और ग्रीनपीस की मदद से केड़िया के सभी लोग अपने गांव को जैविक ग्राम बनाने की मुहिम में जुटे हुए हैं. गांव में सरकारी योजना की सहायता से वर्मी बेड बनाये गए हैं, जहां गोबर, पत्ते और कृषि के दूसरे कचरे को कंपोस्ट करके खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा यहांं पशु शेड भी बनाए गए हैं. जहां गौ मूत्र और गोबर को इकट्ठा किया जाता है.
 
घरों में बायोगैस प्लांट भी लगाये गए हैं. बायोगास के प्रयोग से  प्रदुषण भी नहीं होता, और  महिलायें पारंपरिक चूल्हे से निकलने वाले धुएं से भी बच जाती हैं. इतना ही नहीं, गांव वालों ने एक कदम आगे बढ़ते हुए इकोसैन शौचालय बनाना शुरू कर दिया है. इस तरह के शौचालय में मानव मल-मूत्र बर्बाद नहीं होता बल्कि उसका इस्तेमाल भी खेती में कर लिया जाता है.
 
 
पिछले दो सालों में केड़िया के लगभग सभी किसानों ने कुदरती खेती करना शुरू कर दिया है. गांव में 282 वर्मी-कंपोस्ट बेड लगाये जा चुके हैं। रासायनिक खाद के इस्तेमाल में 42.6 प्रतिशत कमी हुई है. 90 प्रतिशत से भी ज्यादा किसानों ने खेती की लागत में कमी दर्ज की है और सबसे खास बात यह है कि अभी तक कुदरती खेती में किसी भी तरह का नुकसान दर्ज नहीं किया गया है.
 
इस बारे में नीलम बताती है “हम लोग कीटनाशक के लिये जीवामृत, अग्निअस्त्र, अमृतपानी का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये सारे कीटनाशक घर में ही तैयार किये जाते हैं. अग्निशस्त्र के लिये लहसून, मिर्च, तंबाकू का डंठल, गौमूत्र, नीम का पत्ता का इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह जीवामृत के लिये गौमूत्र, गोबर, गुड़ और बेसन का इस्तमाल होता है.
 
 
इन कीटनाशकों की सबसे अच्छी बात यह है कि इनका कोई साइड इफेक्ट नहीं है. यह डर भी नहीं रहता कि बच्चे इसके संपर्क में आयेंगे तो नुकसान पहुंचेगा। इसी तरह छिड़काव के वक्त भी किसान की सेहत पर इसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता.”
 
नीलम के गांव से ही सुनिता देवी की उम्र 40 साल है. उनके पिता जी एक खाद कंपनी में ही काम करते थे. सुनिता कहती हैं, “हमें कभी यह अहसास ही नहीं था कि रासायनिक खाद से हमारी मिट्टी और फसल को नुकसान हो रहा है, कि इससे मिट्टी खराब भी होता है. हमलोग यह सोचते थे कि जितना रासायनिक खाद डालेंगे, उतनी ही अच्छी उपज होगी, जबकि सच्चाई यह थी कि रासायनिक खेती से मिट्टी खराब हो गयी, हमें कई तरह की बिमारियों का सामना करना पड़ा.”
 
 
हालांकि सुनिता देवी कहती हैं, “जैविक खेती के इस्तेमाल से शुरू-शुरू में पैदावार कम होती है. रासायनिक खाद की तरह जैविक खेती फास्ट फूड नहीं है. कुदरती खेती में थोड़ी ज्यादा मेहनत की जरुरत है, लेकिन उस मेहनत का फल बहुत मीठा है.
 
उदाहरण के लिये, गांव में पुआल से छप्पर खूब बनाया जाता है. पहले ये पुआल बेहद कमजोर होते थे और एक बारिश भी नहीं सह पाते थे लेकिन जैविक खेती के बाद यही पुआल गर्मी-बारिश भी मजे से झेल जाते हैं”.
 
 
कुदरती खेती के इस पूरे मुहिम में बच्चे भी शामिल हो रहे हैँ. नीतीश कुमार आठवीं कक्षा में पढ़ता है. उसके पिता किसान हैं. उसने जबसे होश संभाला है थोड़ी-बहुत खेती में अपने परिवार का हाथ बंटाता रहा है. अब वो जैविक खेती के गुर भी सीख रहा है. नीतीश बताता है कि केंचूआ लाकर खेत में डालने का जिम्मा उसी के हिस्से है. वो अमृतपानी बनाने के तरीके को भी विस्तार से बताता है,
 
“अमृतपानी खेतों में कीटनाशक के बतौर इस्तेमाल किया जाता है. नीम का पत्ता, आकबन का पत्ता, बेसन, 10 लीटर गौमूत्र, गोबर, गुड़ इन सबको मिलाकर 21 दिन के लिये जमीन के नीचे डाल दिया जाता है. गलने के बाद उसे मथकर निकाला जाता है. चार-पाँच लीटर निकाल उसमें पानी मिलाया जाता है, फिर खेतों में छिड़काव किया जाता है.”
 
 
नीतीश कीटनाशक के फायदे गिनाते हुए बताता है कि पहले आलू में अक्सर कीड़ा लगने की शिकायत आती थी, जबसे जैविक कीटनाशक देना शुरू किया है कीड़े नहीं लगते. पौधे भी ज्यादा हरा रहते हैं.
 
जैविक ग्राम केड़िया में सिर्फ खेती के तरीकों में ही बदलाव नहीं आया है. बल्कि यह बदलाव आम किसानों के जीवन-स्तर में भी देखा जा रहा है. मसलन, गाँव के लोगों ने बायोगैस का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. अब घर का खाना इन्हीं गोबर गैस पर पकाया जाने लगा है.
 
 
तारो देवी इस बायोगैस के बनने के बाद बहुत सारा गोबर निकलता है, जिसका इस्तेमाल खेतों में खाद के रूप में किया जाता है. इससे किसानों को कई तरह के फायदे एक साथ मिल रहे हैं. बायोगैस के चूल्हे में धूंआ नहीं होता, जिससे बर्तन भी गंदा होने से बच जाता है. लकड़ी की बचत होती है. गोबर का एक साथ कई कामों में इस्तेमाल हो जाता है.
 
तारो देवी इस पूरे काम का श्रेय संस्था वालों को देतीं हैं. संस्था वाले मतलब ग्रीनपीस. वो कहतीं हैं इससे पहले हम किसानों तक कोई भी सरकारी योजना नहीं पहुंच पाती थी. कुछ पहुंचती भी थी तो भ्रष्टाचार की चासनी में लिपटी हुई.
 
 
लेकिन आज आसपास के इलाकों में केड़िया गांव में चल रहे खेती के प्रयोग की चर्चा है. दूसरे गांव के रिश्तेदार भी आते हैं तो इस मॉडल में बड़ी दिलचस्पी दिखाते हैं और खुद भी जैविक खेती शुरू करने को प्रेरित हो रहे हैं.
 
बायोगैस का महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व है. तारो देवी के अनुसार, अब गाँव के जिन घरों में बायोगैस लगाया गया है, उन घरों की महिलाओं की जिन्दगी में बड़ा बदलाव आया है. उन्हें लकड़ी व गोयंठा के जहरीले घूंए से राहत मिली है.
 
 
अब न तो घर काला होता है और न ही बर्तन को धोने में बहुत मेहनत की जरुरत होती है. खाना बनाना आसान हो गया है. समय की बचत भी होती है, जिसका इस्तेमाल महिलाएं दूसरे कामों के लिये करती हैं।
 
तारो जी को अब एक शौचालय बनाने की इच्छा है. इकोसैन शौचालय बनने के बाद उनके घर की महिलाओं को खेतों में नहीं जाना पड़ेगा और खेती के लिये जैविक खाद उपलब्ध होगा. अभी गांव के कुछ घरों में शौचालय बनाया गया है.
 
केड़िया को जैविक ग्राम बनाने की मुहिम से जुड़े ग्रीनपीस कैंपेनर इश्तियाक अहमत इस पूरे अभियान में महिला-पुरुषों की बराबर की भागदारी पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, “यह गांव और यहां के किसान, ख़ासकर महिला किसान बहुत हिम्मतवर हैं और चुनौतियों का सामना पूरी ताक़त से करते हैं. इस अभियान में उन्होंने अपनी रोज़ी के एकमात्र स्रोत को भी दांव पर लगा दिया और मिट्टी और क़ुदरत के लिए सुरक्षित खेती के तरीक़ों को अपनाया है.”