नई दिल्ली. पूरी देश जश्न-ए-आजादी की तैयारी में जुटा है. दिल्ली के लाल किला से लेकर इंडो-पाक बॉर्डर तक आजादी की 69वीं सालगिरह मनाने का पूरा इंतजाम किया जा रहा है लेकिन आज हम आपको सरहद के उस आखिरी गांव का सच दिखाने जा रहे हैं, जहां के लोग हमेशा संगीनों के साये में जीते हैं.
 
दुश्मन का कौन सा हमला कब उनकी जिंदगी जहन्नुम बना दे, कोई नहीं जानता. एक तरफ बीएसएफ की निगेहबानी है तो दूसरी ओर है पाकिस्तानी रेंजर्स का खतरा और बीच में दांव पर लगी है इस गांव की किस्मत.
 
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हम बात कर रहे हैं राजस्थान के बीकानेर से करीब 180 किमी पश्चिम में है खाजुवाला विधानसभा क्षेत्र, जहां है सरहद का आखिरी गांव भूरासर. आजादी के 69 साल बाद भी सरहद का ये आखिरी गांव एक अदद पक्की सड़क का भी मोहताज बना हुआ है. इस गांव के करीब 90 फीसदी से भी ज्यादा मकान झोंपड़ीनुमा है. क्योंकि सरहद पार से कभी भी दुश्मन का कोई गोला. इनका आशियाना हमेशा के लिए तबाह कर सकता है.
 
सरहद के आखिरी गांव भूरासर में स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर सिर्फ एक अस्पताल है लेकिन वो भी महीनों से बंद पड़ा है. सड़क से लेकर बिजली पानी तक और स्कूल से लेकर अस्पताल तक इस गांव में कुछ भी दुरुसत नहीं. सरकार को इसकी कोई सुध नहीं. अलबत्ता बीएसएफ से थोड़ी बहुत मदद जरूर मिल जाती है.
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