नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने समाजवादी पार्टी (सपा) से तत्कालीन  सांसद अमर सिंह और जया प्रदा की याचिका का निस्तारण किया. कोर्ट ने कहा दोनों ही सदस्य अपना कार्यकाल पूरा कर चुके है इस लिए इस मामले में कोई आदेश जारी करने की जरूरत नहीं. क्या कोई निष्कासित सदस्य, यदि पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है तो क्या उसे दलबदल कानून के तहत सदन की सदस्यता के अयोग्य ठहराया जा सकता है? इस पर कोई भी कोर्ट ने आदेश देने से इंकार कर दिया.
 
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ऐसे में साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई दल बदल कानून की व्याख्या के अनुसार किसी राजनीतिक दल के नाम पर निर्वाचित या नामित सदस्य बर्खास्तगी के बाद भी पार्टी के नियंत्रण में रहता है का फैसला फ़िलहाल बरकरार रहेगा. जब तक कोई इसे चुनोती नहीं देता. दरअसल तत्कालीन समाजवादी पार्टी (SP) से  सांसद अमर सिंह और जया प्रदा को पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने की स्थिति में दलबदल कानून के तहत उन्हें अयोग्य ठहराया गया था. 
 
अमर सिंह और जया प्रदा उस संभावित कदम के खिलाफ स्थगन के लिए अदालत के शरण में गए थे जो मतदान के दौरान महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में वोट डालने की स्थिति में उनके खिलाफ उठाया जा सकता है. सपा इस विधेयक का पुरजोर विरोध कर रही है.
 
दोनों सांसदों के वकीलों ने कोर्ट में दलील थी कि यदि पार्टी में रहते हुए कोई दलबदल करता है या पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है तभी उनके खिलाफ दलबदल कानून लगाया जा सकता है. इन वकीलों का कहना था कि इस मामले में सांसदों ने पार्टी से दलबदल नहीं किया है बल्कि उन्हें निष्कासित कर दिया गया है ऐसे में बतौर असंबद्ध सदस्य उनके लिए पार्टी व्हिप मानना जरूरी नहीं है.
 
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साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई दल बदल कानून की व्याख्या के अनुसार किसी राजनीतिक दल के नाम पर निर्वाचित या नामित सदस्य बर्खास्तगी के बाद भी पार्टी के नियंत्रण में रहता है. दोनों नेताओं के अनुसार संविधान की दसवीं सूची की शीर्ष अदालत की व्याख्या निष्कासित सदस्यों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करती है, जिसमें अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत समानता, स्वतंत्र भाषण और अभिव्यक्ति और जीवन का अधिकार भी शामिल हैं.