लखनऊ. भारत माता की जय का नारा लगाने को लेकर मचे बवाल के बीच प्रख्यात इस्लामी विद्वान और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खालिद रशीद फिरंगी महली ने एक बड़ी नसीहत दी है. फिरंगी महली का कहना है कि दारूल उलूम जैसी संस्थाओं को संवेदनशील मुद्दों पर फतवा जारी करने से बचना चाहिए. क्योंकि ऐसे फतवों से देश और समुदाय पर नकारात्मक असर हो सकता है.  
 
उनका कहना है कि ऐसे फतवों से सांप्रदायिक शक्तियों को उनका लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलती है. इसलिए हम क्यों ऐसे निहित स्वार्थी तत्वों के हाथों की कठपुतली बनें.
 
फतवा जारी के लिए मौलाना बाध्य नहीं
फिरंगी महली ने कहा कि किसी मौलाना के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि वह उसके समक्ष उठाये गये हर मुद्दे पर फतवा जारी करे. यदि मौलाना को लगता है कि किसी फतवे का देश और समुदाय पर नकारात्मक असर होगा तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिए. इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि पहली बात तो ये है कि संविधान के मुताबिक देश के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए किसी तरह का नारा लगाने या नहीं लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है.
 
‘मूर्ति नहीं देश का नक्शा आता है सामने’
उन्होंने आगे इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि मुस्लिमों ने आजादी की लडाई के दौरान इंकलाब जिन्दाबाद और जयहिन्द के नारे लगाये थे. यदि अनुवाद किया जाए तो भारत माता की जय का मतलब भी वही है. उनका कहना है कि जब हम ये नारा लगाते हैं तो यह किसी मूर्ति के लिए नहीं बल्कि ऐसा करते समय देश का नक्शा हमारे मन में आता है.
 
बता दें कि इससे पहले एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि उनके गले पर चाकू रख दिया जाए तो भी वह भारत माता की जय का नारा नहीं लगाएंगे क्योंकि ये उनके मजहब के खिलाफ है.
 
देवबंद ने जारी किया था फतवा
दारूल उलूम देवबंद ने पिछले सप्ताह फतवा जारी कर कहा था कि मुसलमानों को भारत माता की जय का नारा लगाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लाम के खिलाफ है. फतवे में कहा गया है कि ऐसा नारा तौहीद या एकरूप अल्लाह के खिलाफ है, वही अल्लाह जो इस्लाम के मूल में है. इसके अलावा मौलाना ने तर्क दिया कि संविधान सभी नागरिकों को उनकी आस्था मानने की अनुमति देता है.