नई दिल्ली. वित्त मंत्री अरुण जेटली मोदी सरकार का सोमवार दूसरा आम बजट पेश करेंगे. जेटली सुबह 11 बजे बजट पेश करेंगे. इस बार के बजट से देश की जनता को बड़ी उम्मीदें है. वित्त मंत्री के सामने बजट में कृषि क्षेत्र और उद्योग जगत की जरूरतों के बीच संतुलन बिठाना बड़ी चुनौती होगी. विश्व अर्थव्यवस्था में सुस्ती के बीच, विकास के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने, संसाधन जुटाने का भी लक्ष्य होगा. ऐसे में आम लोगों पर बोझ बढ़ सकता है. वेतनभोगी निराश हो सकते हैं. 
 
सूखे की वजह से ग्रामीण भारत की हालत ख़राब हुई है और उसे राहत देने की बड़ी चुनौती भी वित्तमंत्री के सामने रहेगी. ऐसे में ये देखना दिलचस्प रखेगा कि अरुण जेटली अपनी पोटली से क्या-क्या निकालते हैं.
 
हालांकि इस बारे में शुक्रवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 में सुझाव देते हुए कहा गया है कि उम्मीदों को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है. बजट में यह भी देखा जाएगा कि सर्वेक्षण के सुझावों को कहां तक अपनाया गया है. सर्वेक्षण में सब्सिडी को सुसंगत करने और ज्यादा लोगों को कर दायरे में लाने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जाने जैसे सुझाव दिए गए हैं.
 
सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन से सरकार पर 1.02 लाख करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा. इससे भी वित्त मंत्री के लिए दिक्कतें बढ़ी हैं. अगले साल के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 3.5 फीसदी तक रखने के पूर्व में घोषित लक्ष्य से समझौता किए बिना वे इसे कैसे करते हैं यह देखने वाली बात होगी. 
 
माना जा रहा है कि जेटली कॉरपोरेट कर की दरों को चार साल में 30 से 25 प्रतिशत करने के अपने पिछले साल के वादे को पूरा करने के लिए भी कुछ कदम उठाएंगे. समझा जाता है कि वह बजट में इस प्रक्रिया की शुरुआत करेंगे, जिसमें कर छूट को वापस लिया जाना शामिल होगा जिससे इस प्रक्रिया को राजस्व तटस्थ रखा जा सके. 
 
इसी तरह चर्चा है कि पिछले साल लगाए गए स्वच्छ भारत उपकर की तरह स्टार्ट अप इंडिया या डिजिटल इंडिया पहल के लिए धन जुटाने को लेकर नया उपकर लगाया जा सकता है. वित्त मंत्री के एजेंडा पर निवेश चक्र में सुधार भी शामिल होगा.
 
यह देखने वाली बात होगी कि जेटली अपनी जेब ढीली करते हैं या फिर मजबूती की राह पर ही कायम रहते हैं. यदि सरकार खर्च बढ़ाने का फैसला करती है, तो यह सुनिश्चित करने की चुनौती होगी कि वह कैसे धन को पूंजीगत निवेश में ला पाती है. 
 
मूडीज इन्वेस्टर सर्विस के विश्लेषकों ने कहा कि यदि बजटीय मजबूती को जारी रखा जाता है, तो भारत का राजकोषीय ढांचा निकट भविष्य में अन्य रेटिंग समकक्षों की तुलना में कमजोर रहेगा. 
 
जेटली सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या कम कर दी जाए या एक तय आमदनी से ज्यादा के लोगों के लिए सस्ते सिलेंडर पूरी तरह खत्म कर दिए जाएं. सरकार का फोकस है कि सब्सिडी का फायदा उन्हीं लोगों को मिले, जिन्हें इसकी जरूरत है. इस नीति का असर आपके रसोई गैस के बिल पर दिख सकता है.