नई दिल्ली. भारतीय संसद का बजट सत्र 23 फरवरी से शुरू हो गया है. रेल मंत्री सुरेश प्रभु 25 फरवरी और वित्त मंत्री अरूण जेटली 29 फरवरी को आम बजट पेश करेंगे.

आम बजट की तरह रेलवे बजट  भी अपने आप में खास अहमियत रखता है. रेल बजट जहां आम बजट से अलग पेश किया जाता है. वहीं, इसको पेश करने का इतिहास भी आजादी के पहले से शुरू होता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठते हैं कि आखिर रेल बजट को आम बजट से अलग क्यों रखा गया है ? इसे आम बजट से अलग और पहले क्यों पेश किया जाता है ?

साल 1859 से पहले नहीं पेश होता था बजट

एक ही सरकार का विभाग होने के बावजूद रेल बजट अलग से क्यों पेश किया जाता है. इसको जानने के लिए भारत में बजट प्रणाली की शुरुआत को जानना जरूरी है. साल 1859 से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में बजट नाम की कोई भी चीज नहीं थी.

जेम्स विल्सन बजट प्रणाली के जन्मदाता

उसी साल ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड केनिंग ने अपनी कार्यकारिणी में जेम्स विल्सन को बतौर वित्त सदस्य नियुक्त किया. विल्सन की पहल पर 18 फरवरी 1860 को वॉयसरॉय की परिषद में पहली बार बजट पेश किया गया. इस बजट में रेलवे का लेखा-जोखा भी शामिल था. जेम्स विल्सन को ही भारत में बजट प्रणाली का जन्मदाता कहा जाता है.

1924 में रेल बजट को अलग करने का प्रस्ताव रखा

साल 1921 में ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ ने यह देखा कि पूरे रेलवे सिस्टम को एक बेहतर मैनेजमेंट की जरूरत है. साल 1924 में उन्होंने आम बजट से रेल बजट को अलग करने का प्रस्ताव रखा. इसके लिए साल1920-21 में एक दस सदस्यों वाली समिति बनाई गई. यह समिति ब्रिटिश अर्थशास्त्री विलियम एम एक्वर्थ के नेतृत्व में बनी.

एक्वर्थ कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में रेल बजट को सामान्य बजट से अलग पेश करने का सुझाव दिया. क्योंकि, अकेला रेल विभाग भारत की सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधियों का संचालन करता था.

अगर साल 1924 की बात करें, तो पूरे देश के बजट में रेल बजट की हिस्सेदारी 70 फीसदी थी. देश के बजट में रेल बजट की इतनी अधिक हिस्सेदारी देखकर रेल बजट को आम बजट से अलग करने का विलियम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया. तब से लेकर अब तक रेल बजट को आम बजट से अलग पेश किया जाता है.