जम्मू. सेना ने उन 10 सैनिकों के नामों की सूची जारी की है जो बुधवार को सियाचिन ग्लेशियर में आए हिमस्खलन की वजह से मारे गए थे. सेना की उत्तरी कमान के प्रवक्ता एस.डी.गोस्वामी ने बताया कि सैनिकों के शवों को निकालने का काम अभी जारी है.
 
शहीदों के नाम जारी
जो सैनिक शहीद हुए है, उनके नाम हैं: सूबेदार नागेश टीटी (तेजूर, जिला हासन, कर्नाटक), हवलदार इलम अलए एम (दुक्कम पाराई, जिला वेल्लोर, तमिलनाडु), लांस हवलदार एस. कुमार (कुमानन थोजू, जिला तेनी, तमिलनाडु), लांस नायक सुधीश बी(मोनोरोएथुरुत जिला कोल्लम, केरल), लांस नाइक हनमानथप्पा कोप्पड, (बेटाडुर, जिला धारवाड़, कर्नाटक), सिपाही महेश पीएन (एचडी कोटे, जिला मैसूर, कर्नाटक), सिपाही गणेशन जी (चोक्काथेवन पट्टी, जिला मदुरै, तमिलनाडु), सिपाही राम मूर्ति एन (गुडिसा टाना पल्ली, जिला कृष्णागिरी, तमिलनाडु), सिपाही मुश्ताक अहमद एस (पारनापल्लै, जिला कुर्नूल, आंध्र प्रदेश) और सिपाही नसिर्ंग असिस्टेंट सूर्यवंशी एसवी (मस्कारवाडी, जिला सतारा, महाराष्ट्र).
 
अब तक 882 शहीद हुए
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, सियाचिन में विपरीत मौसम परिस्थितियों के कारण उत्पन्न स्थिति से अब तक 882 सैन्यकर्मियों की मौत हो चुकी है. यह आंकड़ा 1984 से अब तक का है. तब से ही यहां ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत हुई है. मरने वालों में 33 अफसर, 55 जेसीओ तथा बाकी सैनिक हैं. सियाचिन में सैनिकों के लिए 55 विभिन्न किस्म के उपकरणों की जरूरत पड़ती है. इनमें 20 किस्म के उपकरण बाहर से मंगाए जाते हैं.
 
करीब 32 साल पुराना है विवाद
1972 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शिमला समझौता हुआ था. तब सियाचिन के एनजे-9842 नामक स्थान पर युद्ध विराम की सीमा तय हो गई. इस बिंदु के आगे के हिस्से के बारे में कुछ नहीं कहा गया. अगले कुछ सालों में बाकी के हिस्सों में गतिविधियां होने लगीं. पाकिस्तान ने कुछ पर्वतारोही दलों को वहां जाने की अनुमति भी दे दी. यह भी कहा जाता है कि पाकिस्तान के कुछ मानचित्र में यह भाग उनके हिस्से में दिखाया गया. इसके बाद भारत ने 1985 में ऑपरेशन मेघदूत के जरिए एनजे-9842 के उत्तरी हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. इसे सालटोरो कहते हैं. यह वॉटरशेड है. यानी इससे आगे लड़ाई नहीं होगी.
 
पांच करोड़ खर्च करता है भारत
सियाचिन ग्लेशियर हिमालय के पूर्वी काराकोरम रेंज में भारत-पाक नियंत्रण रेखा के पास स्थित है. यह काराकोरम के पांच बड़े ग्लेशियरों में सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है. यह विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र भी है. उजाड़, वीरान और बर्फ से ढंका यह ग्लेशियर सामरिक रूप से भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां सेनाएं तैनात रखना भारत और पाक दोनों के लिए महंगा साबित हो रहा है. भारत यहां सैनिकों की तैनाती पर हर साल करीब पांच करोड़ खर्च करता है.