नई दिल्ली. इच्छा मृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा है. कोर्ट में लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखे गए ऐसे लोगों का मसला उठाया गया है जिनके ठीक होने की अब कोई उम्मीद नहीं बची है.

इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने कहा है कि अगर किसी इंसान का दिमाग काम करना बंद कर दे, वो बस वेंटिलेटर के सहारे की जिंदा हो और उसके बचने की कोई उम्मीद भी न हो तो ऐसे में क्या उसे इच्छा मृत्यु दी जा सकती है या नहीं ? कोर्ट ने केंद्र को इन सवालों के जवाब देने के लिए एक फरवरी तक का समय दिया है.

मरीजो को मिले लिविंग विल बनाने का हक- प्रशांत

याचिकाकर्ता एनजीओ कॉमन कॉज़ के वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट से कहा है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल’ बनाने हक होना चाहिए. उन्होंने कहा कि ‘लिविंग विल’ के ज़रिए एक शख्स ये कह सकेगा कि जब वो ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तब उसे जबरन लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए.

प्रशांत भूषण ने साफ किया है कि वो एक्टिव यूथनेशिया की वकालत नहीं कर रहे जिसमें लाइलाज मरीज़ को इंजेक्शन दे कर मारा जाता है. बल्कि वो पैसिव यूथनेशिया की बात कर रहे हैं, जिसमें कोमा में पड़े लाइलाज मरीज़ को वेंटिलेटर जैसे लाइफ स्पोर्ट सिस्टम से निकाल कर मरने दिया जाता है.

इस पर अदालत ने सवाल किया कि आखिर ये कैसे तय होगा कि मरीज़ ठीक नहीं हो सकता ? प्रशांत भूषण ने जवाब दिया कि ऐसा डॉक्टर तय कर सकते हैं. फ़िलहाल कोई कानून न होने की वजह से मरीज़ को जबरन लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा जाता है.

भूषण ने कहा कि कोमा में पहुंचा मरीज़ खुद इस स्थिति में नहीं होता कि वो अपनी इच्छा व्यक्त कर सके, इसलिए उसे पहले ही ये लिखने का अधिकार होना चाहिये कि जब उसके ठीक होने की उम्मीद खत्म हो जाए तो उसके शरीर को यातना न दी जाए.

पटवालिया ने रखा सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पी एस पटवालिया ने कोर्ट को बताया कि सरकार पहले से ही इस तरह के मामलों पर कानून बनाने पर विचार कर रही है. अरुणा शानबॉग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और लॉ कमीशन की रिपोर्ट को देखते हुए एक कानून बनाने पर चर्चा चल रही है.

SC ने अंध्यार्जुना को नियुक्त किया अपना सलाहकार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के वकील से मसले पर केंद्र का रुख साफ़ करने को कहा है. अदालत ने वरिष्ठ वकील टी आर अंध्यार्जुना को अपना सलाहकार नियुक्त करते हुए मसले से जुड़े सभी पक्षों को अपनी बात रखने की इजाज़त दे दी है.

क्या है मामला

लगभग 42 साल से कोमा में रहीं मुंबई की नर्स अरुणा शानबॉग को इच्छा मृत्यु देने से सुप्रीम कोर्ट ने साल 2011 में मना कर दिया था. फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि डॉक्टरों के पैनल की सिफारिश, परिवार की सहमति और हाई कोर्ट की इजाज़त से कोमा में पहुंचे लाइलाज मरीज़ों को लाइफ स्पोर्ट सिस्टम से हटाया जा सकता है.

कौन थीं अरूणा शानबॉग

27 नवंबर 1973 को केईएम हॉस्पिटल के वार्ड ब्वॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने अरुणा शानबाग के साथ बलात्कार किया था. अरूणा वहां जूनियर नर्स के रूप में कार्य कर रही थी. इस क्रम में उसकी आवाज दबाने के लिए वाल्मीकि ने कुत्ते के गले में बांधी जाने वाली चेन से उसका गला जोर से लपेट दिया था, जिसके बाद वो कोमा में चली गईं थी.

18 मई 2015 को मुंबई के केईएम अस्पताल में 42 साल तक कोमा में रहने के बाद अरुणा शानबॉग का निधन हो गया था.