नई दिल्ली. वसुधैव कुटुंबकम का मंत्र देने वाले भारत में सभी धर्मों और जातियों को अपनाया गया, ये सच है, लेकिन ये भी सच है कि अलग-अलग जातियों और धर्मों के बीच टकराव की वजह भी भारत की बहुलतावादी संस्कृति ही है. धर्म के नाम पर भारत का एक बार बंटवारा हो चुका है और अब इस बात पर चिंता जताई जा रही है कि कहीं जातियों के टकराव में हिंदू समाज का बंटवारा ना हो जाए.
 
फिलहाल ये चिंता दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अंदर पनप रहे आक्रोश से पैदा हुई है. हर साल देश में धर्म परिवर्तन की जो खबरें आती हैं, उनके केंद्र में ज्यादातर दलित और आदिवासी ही होते हैं. बुद्ध पूर्णिमा जैसे त्यौहार पर तो दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की खबरों की बाढ़ सी आ जाती है. इस बार गुजरात में सैकड़ों दलितों ने विजयादशमी के दिन बौद्ध धर्म अपना लिया. गुजरात में गौ हत्या के नाम पर दलितों के उत्पीड़न की घटना के बाद दलितों का आंदोलन चल रहा है, ऐसे में दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की खबर को ज्यादा गंभीर माना जा रहा है.
 
आध्यात्मिक चिंतक और मशहूर ज्योतिष गुरु पवन सिन्हा ने हिंदू समाज के सामने पेश आ रही इस गंभीर चुनौती से समाज और राजनीति को आगाह करने के लिए हाल में ही सामाजिक समता यात्रा भी निकाली है. देश में धर्म परिवर्तन पर बहस पहले भी होती रही है, लेकिन आज दलितों के आंदोलन और धर्म परिवर्तन की खबरों के बीच ये बहस बड़ी हो गई है कि क्या हिंदू समाज को बांटने की कोई बड़ी साज़िश चल रही है ? दलितों को बौद्ध बनाने के पीछे आखिर किसका हाथ है.
 
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