नई दिल्ली. जैसे-जैसे यूपी चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे किसी ना किसी बहाने सभा पार्टियों और नेताओं का दलित प्रेम उफन-उफनकर सामने आने लगा है. हाल फिलहाल में कुछ ऐसी घटनाएं भी हुई, जिनके बहाने नेताओं को खुद को दलितों का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने का मौका भी मिला.
 
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यहां तक कि दलित प्रेम की जंग में सबसे पीछे दिखाई दे रही बीजेपी भी अब अपने सहयोगी आरपीआई के रामदास आठवले को आगे करके मायावती को चुनौती दे रही है कि दलित वोट पर अकेले उसका हक नहीं है. उधर मायावती ने दयाशंकर दांव के सहारे दलित स्वाभिमान की अलख पूरे जोर से जला रखी है. तो वहीं गुजरात में दलित युवकों की पिटाई के मुद्दे पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी बेहद सक्रिय और बीजेपी पर हमलावर हो गई हैं. राहुल गांधी और केजरीवाल ऊना में पीड़त परिवारों से मुलाकात भी कर आए हैं.
 
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यूपी और पंजाब चुनाव सामने हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नेताओं का ये दलित प्रेम, महज वोट के लिए है? यूपी में दलित वोटर 21 फीसदी के करीब हैं, और इस बार इस 21 फीसदी वोट बैंक के कई दावेदार हैं. बड़ा सवाल ये भी है कि क्या विकास और सामाजिक न्याय के जुमले वोट की सियासत के आगे छोटे पड़ जाते हैं? और इसीलिए हमारे नेता बैक टू बेसिक्स की रणनीति अपना रहे हैं?  इंडिया न्यूज के खास शो बड़ी बहस में इन्हीं सवालों पर पेश है चर्चा.

 

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